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दिवाली में ( ज्ञान ) दीपक जला , होली में ( उसकी ) हो ली | चैत प्रारंभ था फाल्गुन में फाग खेली और अंत हुआ ( कामना का ) | - चेतना - 120
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फाल्गुन फिर आया | गुण , निर्गुण का खेल छोड़ | खेल फाग , हो जा बाग-बाग | - भक्ति की चेतावनी - 146
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मल गुलाल मैल न रहे | होली तो होली | - भक्ति की चेतावनी - 150
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अंधेरे में मिश्री घोली | ( आत्मा ) अब कहा मैं तेरी होली | - ज्ञान - 174
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प्रह्लाद में आह्लाद | सब में देखा | सब में पाया |
- भक्ति - 325
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जब लगी आग | भूख चली भाग | राग और वैराग | खेल रहे फाग | - चेतना - 333
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होली ? क्या होली ? किसकी हो , ली | दिल की होली | दिमाग की होली | फिर क्या होली ? - चेतावनी - 373
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प्रभु का प्यार भी गुनाह ? फिर क्यों प्रह्लाद को दण्ड ?
- भक्ति - 373
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जाग - आई आग (प्रकाश) कहाँ फाग ? यह है नाग | क्यों लेकर बैठा दिल में दाग ? खेल फाग | हो जा बाग-बाग | - चेतावनी - 397
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होली और रंग | यदि हो ली ( आत्मा ) फिर कथा क्या ? धूलि पड़ी सिर पर जब होली होली चिल्लाता ही रहा |
- ज्ञान की चेतावनी - 423
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रंग ले रंगीले | प्राणों का प्रिय रंग ले | रग रग में राग रंग ले | फाग में सुहाग यही |
- भक्ति की चेतावनी - 518
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रंग से खेलता रहा - रंगा कब ? रंगा तो चंगा | सिर गंगा , दिल भंगा , भाव व्याधि भगा |
- भक्ति की चेतावनी - 523
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खेले बहुत - समझे कम | खेल के रंग समझने वाले तो और भी अल्प | अल्प जीवन , साध अनेक |
- चेतना - 539
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जलती रहे विषयों की आग तू प्रह्लाद है | आग स्वयं जल कर भस्म हो जायेगी | तू सत्य का पुजारी है |
- भाव - 565
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भय ? मृत्यु का ? निरर्थक | होली किसी की आत्मा , अब रास रंग में मस्त हो जा | दुनिया जलती आई चिन्ता की होली में | तू तो प्रह्लाद है | आह्लाद , आनन्द तेरा रूप |
- ज्ञान की चेतावनी - 588
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रंग भी काले , पीले क्यों ? रंग तो एक , जिसमें तुम हम रंगे | प्रेम रंग , अंग अंग | - भक्ति - 609
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साथी का संग चाहिये | मन का रंग चाहिये | पीने को भंग चाहिये | लड़ने को जंग चाहिये किन्तु रह गया दंग जब स्वार्थ का खेल देखा | - चेतना - 614
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रंग ही रंग जब रंगनाथ का साथ हुआ |
- भक्ति की चेतावनी - 682
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धूलि से तो खेलता ही आया , अब रंग से खेल | कपड़ा ही रंगा , दिल रंग , कि फिर आवागमन से अवकाश मिले |
- भक्ति की चेतावनी - 684
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कितने अबीर लेकर आये कायर ही थे | वीर होते प्रेम वीर होते तो प्रभु को ही रंग डालते | जीवन रंगीन बन जाता |
- भक्ति की चेतावनी - 685
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प्यार के रंग में साड़ी रंगी - भूल गई कौन सा रंग था ? - भक्ति - 721
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हो हल्ला क्यों ? यह होली है | हो हल्ला क्यों ? यह दुःखों की झोली है | - चेतावनी - 779
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दिल के रंग ने तेरा रंग बदल दिया | नीला आकाश नीला मेरे प्रिय का रंग क्योंकि दूर है | समीप होता तो मेरा रंग , रंग डालता तुझे | - भक्ति - 863
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फाग तो अनुराग बढ़ाता है फिर विराग क्यों ? विराग फाग से नहीं , अनुराग से नहीं , विराग है व्यवहार से जहाँ दिखावा ही दिखावा है | - ज्ञान की चेतावनी - 869
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बसन्त ने रंग दिखलाया | बस , अंत होने के पूर्व एक बार अंग-अंग में तेरा रंग समाये | तभी बसन्त आया |
- भक्ति - 1081
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अधीर न हो प्राणी | होली , सो होली | अब चेत , चैत्र आया प्राणों में नया रंग बरसा | नया रंग जो जम गया था वासना के नसों में |
- भक्ति की चेतावनी - 1146
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इन रंगीनियों का रंग न रहा और न रहेगा | फिर मनुष्य क्यों सुध बुध भूल बैठता है ? कुछ ऐसा ही करता आया है और कुछ ऐसा ही करता रहेगा | परिवर्त्तन देखे किन्तु इसकी प्रकृति न बदली |
- चेतना - 1235
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है अनुराग जो खेलेगा फाग ? कादा , कीचड़ ही उछाला धर्म , कर्म के नाम पर | अंग अंग में प्रेम तरंग , तब जमे रंग |
- भक्ति की चेतावनी - 1262
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प्रकृति के पुजारियों ने रंग बरसाया काला , पीला , नीला | प्रभु के प्यारों ने प्रिय के प्राणों में रँग डाला अपने प्राणों को , यही उनकी साधना थी | - भक्ति - 1263
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तेरा रंग देखकर घबड़ाता था जब तक तेरा न था | आज रँगीली दुनिया है क्योंकि तू मेरा है | - भक्ति - 1265
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अंग अंग में वह रंग भर दे कि जान न पाये तू संग है | नहीं तो क्यों दुनिया बसाई जब तुझी को न जान पाई |
- भक्ति - 1277
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झोली की जिस दिन होली हुई , मन ने कहा - अब ? बुद्धि ने कहा - होली सो होली अब कैसी झोली ?
- भक्ति - 1348
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यह गाना है या रोना है वासना का ? यह हँसना है या फँसना है जगत का | जाग , प्रिय के संग खेल फाग , सुन अंतरात्मा का राग , खिल उठे जीवन बाग़ , नाच रहा मन नाग | सुख दुःख है विचारों के झाग , अब खेल फाग , सुन राग , राग अब बना अनुराग |
- भक्ति की चेतावनी - 1357
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होली खेली नहीं जाती कुछ दिल में हो तो रंग जाता है दिल , फिर कुछ भी हो दिल दिलदार में ही समा जाता है |
- भक्ति - 1397
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एक रंग जब दुसरे में मिला तो रंग ही बदल गया | फिर तुम्हारा रंग कैसा है , जो रंग बदलने ही नहीं देता ? यह वह रंग है , जब चढ़ता है तो दूसरा रंग चढ़ने ही नहीं देता |
- भक्ति - 1493
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गौर कर यह गौरी है शिव की गौरी , जीव के लिये भोरी
( भोली ) है - भोले की भोली है , उसी की होली है |
- भक्ति - 1497
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मैं रंगरेज नहीं , अंगरेज हूँ | वस्त्र का रंग ना ? बस तर होना है | भीतर बाहर तो एक ही रंग है , रग रग में वही रंग है जो मिटता नहीं , मिटाता है राग-द्वेष |
- भक्ति - 1585
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अंतरंग कौन ? अंत तक रँगता रहे हृदय की कलियों को | रंग पक्का अंतरंग पक्का | कच्चा कब हुआ सच्चा ?
- भक्ति - 1599
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रंग का भी अपूर्व सम्मलेन है अंग-अंग में , रोम-रोम में | ओम शब्द ने रोम रोम में ऐसी तरंग उत्पन्न की कि अंग तर हो गया और रंग ऐसा छा गया हृदय पर कि अब कहना क्या , सुनना क्या ?
- भक्ति - 1677
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देखे कपड़े ? क्या देखूँ रंगे हुए हैं | अरे देख दिल भक्त का रंगा हुआ नहीं , रंग में मिलकर अभंग हो गया है , असंग हो गया है |
- भक्ति - 1698
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आगामी उत्सव ( 3 महीना )
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आगामी उत्सव हिंदी तिथि के अनुसार दिये गयें है कृपया अंतिम जानकारी सबंधित सदनों से लें |(Year-2022-2023.)
(Email :- info@bhavnirjharini.com)
भाव निर्झरिणी (Help File-Click Download PDF)
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