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    12/7/2024   Friday
कोने कोने में कौन ? एक प्राण दो देह - देह देह नहीं ले | - भाव - 60

चैत्र में चेत --
अधीर न हो प्राणी | होली , सो होली | अब चेत , चैत्र आया प्राणों में नया रंग बरसा | नया रंग जो जम गया था वासना के नसों में |
भक्ति की चेतावनी-1146

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  • कोई आँखों में बसने को कहता है , कोई दिल में समाने को . यहाँ तो सब पूर्ण होते हुए भी तुम्हारे बिना अपूर्ण | | - भाव - 1
  • बाहर की पूजा , संस्कार से मुक्त न कर सकी । - भक्ति की चेतावनी - 1
  • कैसे रिझाऊँ और दिल बहलाऊँ ? बहार ही बहार , जहाँ नहीं हार । - भक्ति - 1
  • प्रकृति के रंगों में सुख-दुःख खोजता है , प्रकृति जिसके रंग में रँगी है उसे भी खोज | - चेतावनी - 1
  • रंगीली दुनिया का रंग मन , रंगीला मन , दुनिया का रंग ही बदल डालता है | - ज्ञान की चेतावनी - 1
  • निन्दा को निद्रा कहाँ ? प्रशंसा में शंका आई | दोनों के युद्ध में जीवन समाप्त | वाह रे खेल | - चेतना - 1
  • सृष्टि सजी , किन्तु शांति न ली - न सृष्टि ने , न जीव ने - स्रष्टा मुस्कराता रहा | - ज्ञान - 1
  • दिगम्बर का स्नान कैसा ? प्रकृति का प्रेम जलवत् बह निकला दिशाएँ तृप्त - दिगम्बर तृप्त | - ज्ञान - 10
  • जब जीते जीत, मरे क्यों हार ? - भक्ति की चेतावनी - 10
  • वेतन तो ये तन | - ज्ञान की चेतावनी - 10
  • दो शब्द सुना जा | बड़े प्यारे हैं - तू मेरा | - भाव - 10
  • नवीन , नवी कहे या वीण वाली जिसकी हो वह कहे किन्तु यह भी भ्रम है | नवीन में भी वही वीण प्राचीन वीण बज रही है | - चेतना - 10
  • समता में झूलन कैसा ? विषमता झुलाती , रुलाती , हँसाती | - भक्ति - 10
  • सुप्त को छेड़ा गति दिखलाई दी | - चेतावनी - 10
  • सोये हुए निर्जीव नहीं , गति हीन नहीं | ऐसा स्पर्श करो कि गति ही गति | - चेतावनी - 11
  • भक्त को दीन क्यों बनाया ? शायद दीनबन्धु कहलाने के लिये | - भक्ति - 11
  • सजग सज , दिल लगा तो भज , नहीं तज दोनों दीन से जायगा | - ज्ञान की चेतावनी - 11
  • सत्पुरुष ने सत्य और पुरूष के भाव को एक ही जाना और माना | - चेतना - 11
  • सत आ न | सता न | - भाव - 11
  • प्राणी की प्रेम की वाणी प्राणों में मोह भी उत्पन्न करती और मोह का हनन भी करती है । - भक्ति की चेतावनी - 11
  • मुर्दा कौन ? मुद , मुदिता को जो न जानें| - ज्ञान - 11
  • उपस्थिति में अस्वीकृति क्यों ? अनुभूति जो नहीं है | - ज्ञान - 12
  • अवलम्ब चाहता है , अविलम्ब अवलम्ब चाहता है किन्तु विलम्ब क्यों हो रहीं है उस कारण की ओर कब देखता है ? - भक्ति की चेतावनी - 12
  • राधा की बात ही सुनी थी आज जब मेरे श्याम का चित्र अंकित करने बैठा तो राधा ही हो गया | चित्र अब मेरे लिए विचित्र था | - भाव - 12
  • हरियाली क्यों चाहता है ? हरि के अभाव में सब का हरण । व्यर्थ ही जीवन और व्यर्थ ही मरण | - ज्ञान की चेतावनी - 12
  • फकीर को लकीर से क्या ? - चेतना - 12
  • दीनता से परे , बन्धु का बन्धुत्व | - भक्ति - 12
  • सन्देह की दृष्टि से न देख | देह बनी रहेगी , दाह बना रहेगा | - चेतावनी - 12
  • ज्योति - आँख में हो या हृदय में , प्राण में हो या प्रणय में , ज्योति ही है - जिसके अभाव में सब नीरस | - भक्ति - 13
  • धोबी , धो भी | धोता कहाँ है ? बार बार मैल - मेल कहाँ ? - चेतावनी - 13
  • कौन कह सकता है कि बोलने वाला कौन है ? बोल कर नहीं , अनुभव कर ही जान सकेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 13
  • भाग्य कह कर भगा जाता है - भाग्य से भागना कैसा ? जब स्वयं ही उसका कारण है , कर्त्ता है | - चेतना - 13
  • तू इतना प्रिय क्यों है ? तेरे प्यार से पूछ | - भाव - 13
  • सिद्ध की सिद्धि बहुत अच्छी , सिद्धि की विधि भी जान | - भक्ति की चेतावनी - 13
  • यह कैसा स्पर्श है जिसका पता भी नहीं लगता ? सूक्ष्म का स्पर्श , सूक्ष्म गति वाला जानें | - ज्ञान - 13
  • निरादर क्यों ? इनका निरादर ही भला है | आदर में दर क्या है , यह कहाँ जान पाये | - ज्ञान - 14
  • खोज कर लिख | खो कर लिख | - भक्ति की चेतावनी - 14
  • प्राणों में बस गया | बस गया , बस गया | - भाव - 14
  • अंधड़ आया , उड़ने लगे हलके | गुरु तो गुरु ही रहे | - ज्ञान की चेतावनी - 14
  • उसका विश्वास ? जो विचारों से खेलता है | - चेतना - 14
  • बोझा , बेजा कष्टदायक | - चेतावनी - 14
  • भाव और प्राण इतने मधुर क्यों ? प्राण स्थिति भाव गति | - भक्ति - 14
  • दस ने नौमी की तो एक का अन्तर मिटा | भक्त भगवान मिटा | - भक्ति - 15
  • दबा नहीं , रो पड़ेगा | - चेतावनी - 15
  • विश्वास शरीर का भी नहीं , फिर ? उसी का जिसने विश्व बनाया , विश्वास बनाया , विचार बनाया | - चेतना - 15
  • सत्य कब चाहता है ? नाम वाले को पुकारता है | यही सत्य है ऐसा ही समझता है | - ज्ञान की चेतावनी - 15
  • ध्यान से देखा , ध्यान में देखा | प्राण देकर देखा , प्राणों में देखा , फिर ध्यान , समर्पण ? - भाव - 15
  • जल पान कर तृषा मिटे | - भक्ति की चेतावनी - 15
  • फिर भी प्यार ? यही मेरा स्वभाव | - ज्ञान - 15
  • इन्हें चेतावनी दो | नहीं , चेत करें तो चेतावनी भली | - ज्ञान - 16
  • किसी को शाप , किसी को बाप - कहना क्या ठीक है ? - भक्ति की चेतावनी - 16
  • भाव भावे , कुछ न सुहावे | - भाव - 16
  • यह बुद्धि मुझे हँसने नहीं देती , यह मन मुझे शांत कब होने देता है , ये विचार मुझे तरसाते हैं , ये साधन मेरा धन भी पहचानने नहीं देते इसीलिए परेशान और भगवान होता हुआ भी अपने को इन्सान ही समझता हूँ | - चेतना - 16
  • मैंने किसको धोखा दिया ? मैंने किसको धोखा नहीं दिया ? जब ' सोहं ' कहकर भी धोखा ही देता और खाता है फिर कहना ही क्या ? - ज्ञान की चेतावनी - 16
  • किसका आश्वासन ? जिसकी आश न हो , श्वास का पता न हो | आश्वासन उसी का जो आसन लगा कर स्थित है - प्राण जिसमें स्थित है | - चेतावनी - 16
  • उदासीन क्यों ? उदासीन से उदासीन | मैं उन्हें सीने में बैठाऊँ और वे मेरा नाम लेना भी उचित नहीं समझते | - भक्ति - 16
  • हँस मत | हँसा | नजर में आ | दिल नजर हो | - भक्ति - 17
  • जगत का आदर चाहता है | जो गत है उसका आदर ? गत का सोच कैसा ? - चेतावनी - 17
  • सम आज तेरे सभी समाज | - ज्ञान की चेतावनी - 17
  • ग्रहण का नाम कर्म , दान का नाम कर्म , करने का नाम कर्म , चुप रहने का नाम कर्म | वाह रे कर्म | क्या ही अद्भुत कर्म है जो सब अवस्था का साथी है | - चेतना - 17
  • रंग इनको हे रंगीन | - भाव - 17
  • घृणा नहीं , प्यार भी नहीं | कर सके तो प्यार कर , किन्तु इसमें भी धोखा है | - भक्ति की चेतावनी - 17
  • पाषाण में भगवान ? पा , सान , नहीं पाषाण | - ज्ञान - 17
  • तृप्त की पहचान ? तप्त न हो , संतप्त न हो , धीर , वीर , गंभीर , प्रेम का नीर बहता हो , वस्तु के वश में न हो | तू , मैं का स्थान न हो | तृप्ति सहचरी , स्वयं तो स्वयं ही है | - ज्ञान - 18
  • प्यार में धोखा ? हाँ यदि शरीर का प्यार है | - भक्ति की चेतावनी - 18
  • त्रिकालज्ञ मैं हूँ - मैं तेरा था , मैं तेरा हूँ , मैं तेरा ही रहूँगा | - भाव - 18
  • चुप रहता हूँ तो कहता है , उठ बोल | बोलता हूँ तो कहता है , बैठ चुप रह | खूब रहा , किसी करवट चैन नहीं | - चेतना - 18
  • समझ आज , अब कहाँ समाज ? - ज्ञान की चेतावनी - 18
  • शान्ति की भ्रान्ति में न फँसा | तू मेरी ही है | भ्रान्ति की क्लान्ति को दूर कर | - भक्ति - 18
  • व्यक्ति तैने क्या नहीं व्यक्त किया ? पशु की तरह गुर्राता है , पक्षी की तरह चहचहाता है , कृमि की तरह छटपटाता है , पत्थर की तरह स्थिर हो जाता है , फिर भी तेरा पता तू ही नहीं पाता कैसा आश्चर्य है | - चेतावनी - 18
  • प्रकाश पर आवरण किसने फेंका ? तू ने या तेरे विचारों ने ? - चेतावनी - 19
  • हे प्यासे की आशा | क्यों , दिखा रही तमाशा | क्यों , दिला रही दिलासा ? - भक्ति - 19
  • पथ क्यों भिन्न ? जब इष्ट एक अभिष्ट एक | एक वाले का पथ भिन्न नहीं | मन साथ दे तो पथ नीचे मन ऊपर | - ज्ञान की चेतावनी - 19
  • गूंगा अपने ही इशारों में समझता है , वाकचतुर भाषा की चातुरी में | समझना ही काम चाहे गूंगा बने चाहे जिव्हा चलाये | - चेतना - 19
  • रो कर नही कहूँगा , तुम भी रोने लगोगे | - भाव - 19
  • शरीर शरीर है बात न सुन | बहुत कुछ चाहता और बोलता है - फैलता ही जाता है | - भक्ति की चेतावनी - 19
  • पुण्य अज्ञों का | पाप पाजियों का | आप , पाप पुण्य से परे जहाँ स्वतः हो रहा हरे - हरे | - ज्ञान - 19
  • योग में भोग है | भोग में योग है | अन्तर महान | महान से योग , योग और क्षुद्र से ? भोग ही भोग | - ज्ञान - 21
  • इन अन्धों को कौन समझाये , एक के अनेक रूप प्रतिक्षण | - भक्ति की चेतावनी - 21
  • कब तक प्रतीक्षा करुँ ? प्रारंभ से प्रलय प्रतीक्षा है | - भाव - 21
  • मुझे किसने थकाया ? ममत्व ने | मुझे किसने उकसाया ? ममत्व ने | मैं से ममत्व - समझ 'स्व' तत्त्व | - चेतना - 21
  • देख कर सीख , देकर सीख | दे दिल , देख निर्गुणी का गुण | सीख हुई अब लीक | - ज्ञान की चेतावनी - 21
  • प्रीतम की सेज प्रेम | प्यार का दरबार - जहाँ हार की बहार , जीत का श्रृंगार | - भक्ति - 21
  • आया था आश्वासन देने , आसन जमा कर बैठ गया , कैसे छुटकारा ? - चेतावनी - 21
  • शरीर ही संसार | शरीर में नहीं खोजता , संसार में खोज रहा है - शरीर के निर्वाह के लिये धन | व्यर्थ है - भाव ही धन है | - चेतावनी - 31
  • सूरत देखी - तो गीता भूल गया | - भक्ति - 31
  • क्यों बातें बनाता है , साधना कर | साधना करूँ किस की ? भक्त की , भगवान की या निज की ? यह भी भ्रम है मन का | अनेक जन्म की साध पूरी हुई जब तुम मिले | - भाव - 31
  • आकाश ने कहा - अवकाश ग्रहण करना कौन चाहता है | अवकाश ले तो आकाश ही है | - चेतना - 31
  • राम ने स्थूल राक्षसों को मारा | नाम ने सूक्ष्म असुरों को और खुद ने खुदी को मार काम बनाया | - ज्ञान की चेतावनी - 31
  • बिछुड़ा कब ? जो योग हो | - भक्ति की चेतावनी - 31
  • मूल संख्या में मूल जोड़ा तो शून्य हुआ और एक रहा | एक न रहे तो संख्या का आधार कहाँ ? - ज्ञान - 31
  • देखते ही भूलता है | भूलता क्या ? दिल झूलता है | - ज्ञान - 41
  • आज के गीत प्राणों को शांति दें | प्रार्थना नहीं , प्राण चाहते हैं | - भाव - 41
  • यह वाणी - बुद्धि को भ्रमित करने के लिए | - चेतना - 41
  • वश में होता तू , यदि वस्तु में देखता है , बस तू बस तू | - ज्ञान की चेतावनी - 41
  • पूजा तो करनी ही पड़ेगी , ज्ञान की या विज्ञान की या अज्ञान की | - चेतावनी - 41
  • प्रकृति की शोभा ही मुग्ध करती है - फिर प्रभु ? देख पाता तो क्यों भटकता ? न प्रभु भटकता और न भक्त | - भक्ति की चेतावनी - 41
  • कच्चा है , अभी बच्चा है | बड़े चतुर ! पका तो कहा आपका , और हुआ आपका | - भक्ति - 41
  • हृदय है तो हृषिकेश के लिये | - भक्ति - 51
  • रिझाना ही झुकाना है | - भक्ति की चेतावनी - 51
  • अवस्था देख कल्पना न कर कि केवल कष्ट है | दुःख यों है कि न राम जाना न काम जाना | - ज्ञान की चेतावनी - 51
  • डरता है और मरता है | डर हर | - चेतावनी - 51
  • धन्य रे जगत , सत्य से उत्पन्न होकर असत्य ही भासता रहा ज्ञानियों को | - चेतना - 51
  • याद भूल में जीवन बीता | याद करूँ कब | तुम्हारी याद भूल नहीं पाता | - भाव - 51
  • ज्योति जो थी , वह अब भी है | गई कहाँ ? रही यहाँ | - ज्ञान - 51
  • दो का आकर्षण | एक का शून्य | - ज्ञान - 61
  • अब तक किसी ने अपनाया न था | समझता था कौन अपनायेगा ? क्या कहूँ - तुमने अपनाया | भय न रहा , अपने को जाना अब तो तुम्हीं मेरे | - भाव - 61
  • स्नान , बाहर संसार करता है , भीतर तो कोई कोई करता है | - चेतना - 61
  • पहचान " मैं " कौन ? - ज्ञान की चेतावनी - 61
  • काल और कल के लिये विकल | कहाँ गई अक्ल ? - चेतावनी - 61
  • रक्त मांस तो आसक्ति है , प्रेम स्पर्श भी नहीं चाहता , वह तो मिलन चाहता है जहाँ शरीर नहीं , शरीर का भाव नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 61
  • गड़ा धन बना , झगड़ा मिटे | अपने को मिटा , झगड़ा मिटे | - भक्ति - 61
  • कुछ बोलो रस घोलो | - भक्ति - 71
  • पुस्तक पूजा , स्थूल | सूक्ष्म , भाव पूजा | कारण पूजा का जहाँ विकास है | - भक्ति की चेतावनी - 71
  • तीनों लोकों में यह साढ़े तीन हाथ वाला कौन है जो चार हाथ की कल्पना में कलपता है ? - चेतावनी - 71
  • गुरु और गोविन्द में गुरु बड़ा , लेकिन क्यों ? गोविन्द को बताया | जी नहीं - गोविन्द ही बनाया | - ज्ञान की चेतावनी - 71
  • तुम्हारा जन्म ? तुम्हारा जन मैं | मेरे लिये जन्म तो जन मैं | तुम ? क्या कहूँ - कहना नही बनता | - भाव - 71
  • धर्म कर्म में बदल गया | ज्ञान ? ज्ञान ने धर्म , कर्म का मर्म समझाया | - चेतना - 71
  • सुनी तेरी वाणी | है ब्रह्म - नहीं प्राणी | - ज्ञान - 71
  • पूजा थी पूर्णता - और आज पूजा - दूजा | संज्ञा क्रिया बनी | क्रिया ही प्रधान - कर्त्ता को कौन पूछता है किन्तु यह क्रिया किसकी ? - ज्ञान - 81
  • हर्षित मम आत्मदेव , पुलकित मम गुरुदेव | रोग , शोक , दुःख , भय आज नही , स्वयं निर्भय | - भाव - 81
  • बाईं ओर मेरा हृदय और दाहिनी और मैं | हृदय के बिना मैं ? ( कुछ नहीं ) | - चेतना - 81
  • मन के राजा हैरानी ? है , रानी फिर क्यों यह परेशानी ? - चेतावनी - 81
  • पूर्ण का खंड नहीं | मान भी लो तो पूर्ण - पूर्ण ही है | चीनी में मिठास ही मिठास | - ज्ञान की चेतावनी - 81
  • जगमग ज्योति जले | जग , मग ज्योति जले | - भक्ति की चेतावनी - 81
  • ये कहते हैं मैं तेरा नहीं , इन्हें विश्वास दिला दो कि मैं तेरा हूँ | - भक्ति - 81
  • मन चार प्रकार के काम करता है | (१) गधा - केवल राख ही में खेल करता है | (२) मक्खी - मिठाई और मल पर बैठती है | (३) भ्रमर - भिन्न रस पान , एक का नहीं | (४) मेढक - अमृत सर में गोता लगाता है और किनारे पर आता है | - ज्ञान - 90
  • शिष्य चार प्रकार का , - (१) नाम का ( नाम मात्र ) ( २) काम का ( भोग ऐश्वर्य ) ( ३) आराम का ( मानसिक शान्ति ) ( ४) राम का ( रमने के लिये ) | - ज्ञान - 91
  • रज से भी कुछ न सीखा | रज बनता तो संसार को फूल देता , फल देता | - चेतावनी - 91
  • शरमाई नजरों से देखा तुम्हारी ओर , भरमाई नजरों से तुम्हारी माया की ओर | अब तुम्हीं जानो क्या था और क्या है ? - भाव - 91
  • गर्वीली दुनिया ने गर्व दिया , गर्भ दिया | गर्व में फूलती रही , गर्भ से एक अनेक होते रहे , शांति कहाँ ? - चेतना - 91
  • यह क्या प्रीति का उपहार ? सीता - असती कही गई ? राधा - पापिनी , कलंकिनी क्या यही तेरा उपहार है ? - भक्ति - 91
  • ( सीना ) तान कर कह , सीने में तू | - भक्ति की चेतावनी - 91
  • वायु ने दुर्गन्ध को इस प्रकार प्रवाहित किया कि अब उसका पता न चला | - ज्ञान की चेतावनी - 91
  • प्रिया के हृदय में प्रिय का नृत्य - रस विभोर हो गई गोपियाँ | - भक्ति की चेतावनी - 100
  • एक दिन आँख उठाकर देखा मैं न था | - भक्ति - 100
  • आवरण ? आवरण न करूँ तो शुद्ध - बुद्ध पर कौन मुग्ध हो ? - चेतना - 100
  • कमरे में बिजली जल रही थी , रहने वाले का पता न था | जलती हुई छोड़ गया | जलती रहेगी | - भाव - 100
  • खेल का ख्वाब भयानक , खेल- खेल , करले मेल | - ज्ञान की चेतावनी - 100
  • दे मन कि दामन छूटे ( दुनिया से ) | - चेतावनी - 100
  • उपासना केवल प्रकृति ही करती है - पुरूष नहीं | पुरूष तो कृपा करता है , उपासना नहीं | स्वयं पुरूष है , कार्य कारण प्रकृति है | - ज्ञान - 100
  • प्रकृति की उपासना-विज्ञान की उपासना है | ज्ञान में तो जानना मात्र है | - ज्ञान - 101
  • मूल में ही भूल | मिटे कैसे शूल | - चेतावनी - 101
  • काल और गति | क्या काल गति है या गति ही काल है ? लोग कहते हैं काल की गति | - चेतना - 101
  • शक्ति , पशुओं में भयानक , किन्तु शांति में भक्ति ही बन जाती है | - ज्ञान की चेतावनी - 101
  • मैं लुटा जाता हूँ और तुम चुप हो | घर में उपद्रव और तुम मौन ? अब तो बोलो देव - बलदेव | - भाव - 101
  • एक दिन सिर झुका कर देखा मैं न था | - भक्ति - 101
  • रस बरसे , मन तरसे | क्यों न हरसे , जब बरसे | - भक्ति की चेतावनी - 101
  • गो लोक के रास की कल्पना की , क्यों न गो लोक में प्रत्यक्ष रस चक्खा ? - भक्ति की चेतावनी - 102
  • तूती बोले तेरी , थके महाजन हेरी | - भक्ति - 102
  • तुम्हें कौन सी वस्तु चाहिये ? बस , तू चाहिए | - भाव - 102
  • क्षोभ से मोक्ष पाया तो मोक्ष ही मोक्ष | मर कर मोक्ष शरीर का , मन का मोक्ष तो भाव में है | - ज्ञान की चेतावनी - 102
  • ख़ुद न हुआ राजी | जैसा हाजी वैसा पाजी | - चेतावनी - 102
  • दीन तब तक - लीन न जब तक | - ज्ञान - 102
  • कर्त्ता में ही कर्म क्रिया छिपी है | ज्ञाता ही ज्ञान ज्ञेय का स्वामी है | जरा सोच | - चेतना - 102
  • माँ का स्तन पान करने वाला शिशु माँ के स्तन पान की कभी कभी आँटी ( प्रक्रिया ) भूल जाता है | जब तक फिर पीने न लगे - तब तक रोता है | आत्मानन्द की क्षणिक भूल है | - ज्ञान - 103
  • मिठाई और नमकीन जीभ के स्वाद बने , फिर भलाई और बुराई में मन क्यों छटपटाता है ? - चेतावनी - 103
  • भूलूँ तुम्हें ? ऐसा न कर | कीमत दूँगा | ' मत ' की कीमत अदा करूँगा - भाव - 103
  • जो प्यार और ज्ञान के लिये व्याकुल था आज अभिमान क्यों अपना बैठा | प्राप्ति प्यार की , बहार है ज्ञान की , फिर अभिमान ? सन्देह है अभी शंका है | - ज्ञान की चेतावनी - 103
  • लोहा हिला , ताव किसी का कमल खिला , भाव किसी का | - भक्ति - 103
  • भाव जाने तो भावुक | नहीं , भाव में आये तो भावुक | - भक्ति की चेतावनी - 103
  • खिलने वाला खिलता ही रहता है | मुरझाता है शरीर | वह भी रस हीन | - चेतना - 103
  • आध्यात्मिकता में भी संसारिकता की पुट है | - चेतना - 104
  • 'गूंगे का गुड़ ' तो मूक अवस्था है किन्तु गूंगा कब तक ? पा कर भी शांत रहा तब तक | पाया तो पिला | नहीं व्यर्थ बातें न बना | - भक्ति की चेतावनी - 104
  • जब जाना | तब माना | - भक्ति - 104
  • खिलकर झड़ना अच्छा , बिना खिले तो जन्म ही निरर्थक | - ज्ञान की चेतावनी - 104
  • धूली - देख मैं भूली |धूली धाम, धूली विश्राम , धूली धन्य , वही अनन्य | - भाव - 104
  • अरे यह द्रव्य द्रव हो रहा है किसे स्थिर रखना चाहता है ? - चेतावनी - 104
  • सर्वभूषन सम्पन्न सुन्दर स्त्री के स्तनों में दूध न हो तो बच्चे को दूध कैसे पिला सकती है ? विद्या , धन , रूप हो किन्तु हृदय में आनन्द का भाव नहीं तो सब निरथर्क | - ज्ञान - 104
  • लगन - मगन - लगन | प्रथम लगन लगे तो मगन होता जाता है | फिर लगन अर्थात् विवाह ( आत्मा - परमात्मा का एकाकार ) हो जाता है | - ज्ञान - 105
  • श्वास है , विश्वास नहीं ? प्राण है , प्राण पति नहीं ? - चेतावनी - 105
  • पाहन रज बना | सृष्टि बदल गई | लघु - विशाल या विशाल लघु | पता ही न लगा | लगी तो ऐसे से लगी कि भूल गया क्या छोटा क्या बड़ा | - भाव - 105
  • कम्पन क्यों ? मन निर्बल , तन जर्जर | - ज्ञान की चेतावनी - 105
  • अब प्रभात , सुनो बात | तेरा किस्सा , तेरी बात | - भक्ति - 105
  • क्यों पापी | पाया तो पी , नहीं तो पी पी बोल | पिय आये और दिल की जलन मिटाये | पपीहा की पी , पी , की आवाज नहीं सुनता | - भक्ति की चेतावनी - 105
  • भव्य भवन में धन छिपा है - धन नष्ट करो तो धन नष्ट होता है | उचित व्यवहार में धन की सार्थकता है | - चेतना - 105
  • जिसे दुनिया बाहरी कारणों से बड़ा कहती है उसे बड़ा मान | कैसे मानूँ मेरी आँखों में तो कोई और ही बसा है | - चेतना - 106
  • मेरी ओर भी देख | अनेक हैं तो क्या मैं अनेक में नहीं ? - भक्ति की चेतावनी - 106
  • राम आराम क्यों न कर सका ? सभी कहते आ राम | राम को कहाँ आराम ? - भक्ति - 106
  • जल में नमक समुद्र बना | नमक कहता है नम कः ? जल ही गति , जल ही स्थिति | - ज्ञान की चेतावनी - 106
  • मेरी आहें तेरी बाहें | पकड़ पाता तो छूट जाता ( गम से ) | - भाव - 106
  • लक्ष्मी के लिये जहाँ कथा , वहाँ नारायण चुप | - चेतावनी - 106
  • सूर्य चन्द्र जब एक सीध पर आते हैं तो पूर्णिमा होती है | बुद्धि - सूर्य , चन्द्र - मन , पृथ्वी - शरीर तीनों एक सीध पर आ जायँ तो पूर्णता आती है | - ज्ञान - 106
  • मन मरा , मैं नहीं मैं रमा , तू नहीं मैं रमा , वह नहीं जग मरा , यह सही जग मरा , सही वही जग पड़ा , कौन ? कौन ? वह मैं | - ज्ञान - 107
  • शव के रूप में घूम रहा है | शिव का भाव , शव को भी शिव ही बनाता है | - चेतावनी - 107
  • याद में तू - संवाद में तू | विवाद में तू धन्यवाद में तू | - भाव - 107
  • ले और दे , ले दे के क्या करना है ? स्थिति में भी क्रिया , क्रिया ही तुझे कर्त्ता बनाती | - ज्ञान की चेतावनी - 107
  • कृष्ण खींचता था या खिंचा चला जाता था | प्रश्न क्यों ? गोपियों से पूछो - उत्तर मिलेगा | प्रश्न न रहेगा | - भक्ति - 107
  • डर तो मर - नहीं तो अभय हो विचर | - भक्ति की चेतावनी - 107
  • सत्य की पहचान भी बाहरी चिन्हों से लोग करते हैं | क्या यह सत्य है ? तुम्हीं जानो यह सत्य है या उसकी परिछाईं ? - चेतना - 107
  • समीपता प्रभाव डालती है , निसंदेह | देह तो संदेह है | - चेतना - 108
  • पत्ते पत्ते में हरियाली | आली पत्ते पत्ते में हरि | - भक्ति की चेतावनी - 108
  • चले , चले , चेले चले | गुरु भले , हिले मिले | - भक्ति - 108
  • कण ने कहा - कुछ समझे ? मन ने कहा - कुछ समझे ? मैंने मन बनाया , मैंने तन बनाया | - ज्ञान की चेतावनी - 108
  • प्रेम योग का अवतार - कृष्ण | भाव योग तो प्रभु तुम्हारी ही देन है | - भाव - 108
  • चलने की चिन्ता , रहने की चिन्ता , खाने की चिन्ता पड़ी है | चिन्ता का दरवाज़ा बंद | अब निश्चिंत हो | कहीं आना न जाना , मगन रहना | - चेतावनी - 108
  • राम ने सीता त्यागी मैं ने गीता त्यागी अब गाऊँ क्या सुनाऊँ क्या रिझाऊँ क्या कुछ न कहूँ अपने में बहूँ | - ज्ञान - 108
  • निराकार और साकार - मन , बुद्धि , अहंकार , आत्मा का कोई आकार नहीं , शरीर का आकार है | काम निराकार और साकार दोनों में होता है | साकार शरीर निराकार मन से काम होता है | - ज्ञान - 109
  • दुनिया न देख , दिल देख , दिलवर देख , देखने का आनन्द आये | - चेतावनी - 109
  • लीला के मिस तुमने प्रेम लोक बसाया | प्रेम मोह बना , तुम अन्तर्धान हो गये | - भाव - 109
  • तन मन बिका , तन मन के लिये | - ज्ञान की चेतावनी - 109
  • क्यों भाये ? क्यों हरषाये ? जो हरषाये , गुरु आये , गुरु पाये , दिल पाये , दिल हरषाये | - भक्ति - 109
  • विचाराधीन क्यों ? विचार का धनी बन | - भक्ति की चेतावनी - 109
  • गति में व्याकुलता नहीं | गति , गति है , जहाँ विकलता नहीं | परिणाम विपरीत देख छटपटाता है | परिणाम गति नहीं | परिणाम स्थिति है | - चेतना - 109
  • संशय हो तो प्रशंसा ? प्रसन्न हूँ यही प्रशंसा | - चेतना - 110
  • मुस्कुरा हँसी आये | भक्ति है , भगवान आये | - भक्ति की चेतावनी - 110
  • नन्द दुलारे , बाबा हमारे | बन बन आशा ढूँढ़े बनासा हृदय पुकारे || जीवन बीते शरण तिहारे | - भक्ति - 110
  • जन जन का बना , तन मन के लिये | - ज्ञान की चेतावनी - 110
  • युग बीते , योग बदलते गए| तुम्हारा प्यार आज भी नवीन रूप में स्थित है| धन्य तुम्हारा प्रेम | - भाव - 110
  • भूखी - प्यासी दुनिया - वासना की | प्यार का रास्ता ही रस बरसाता , रस में मिलाता , रसमय बनाता | - चेतावनी - 110
  • अर्थ खिलोना - ज्ञानी और भक्त को नहीं दिया | - ज्ञान - 110
  • प्रकृति की साम्यावस्था की स्थिति वाले का जन्म नहीं | अधिक हुआ तो अवतारी | कम हुआ तो अभाव ग्रसित जीव बन आया | है तो वह पुरूष किन्तु अपनी शक्ति से , चेतन की शक्ति से अनजान | प्रकृति की भक्ति का अभिमान लेकर आया | - ज्ञान - 111
  • दु:खी क्यों ? प्रिय को देखा नहीं ? तब तो दु:खी होना स्वाभाविक है | - चेतावनी - 111
  • देर सबेर | मन का फेर | - ज्ञान की चेतावनी - 111
  • नर रूप धारण कर मैने माता - पिता सभी को संदेह में डाल दिया | समझ न सके | - भाव - 111
  • तेरी मेहरबानी ये बानी तेरी कदर दानी ये बानी नहीं परेशानी ये बानी | - भक्ति - 111
  • विश्वास दिला कर घात | फिर न रहे मूल न रहे पात | - भक्ति की चेतावनी - 111
  • दिल की बातें जब दिमाग से कही गईं तो बातों का रस ही न रहा | दिल तो ऐसा दिल चाहता है , जहाँ दिमाग की एक न चले | - चेतना - 111
  • स्मरण शक्ति को भक्ति और साधुता समझना , अनुभव का अभाव है | - चेतना - 112
  • मनमोहन में भी मन नहीं लगता ? कैसे मानूँ ? - भक्ति की चेतावनी - 112
  • मेरे बाबा ने मेरी बात मान ली | मेरे दिल की सही बात जान ली | - भक्ति - 112
  • ग्रहण ने रूप ही बदल दिया | - भाव - 112
  • घट ही घूँघट | घट का घूँघट | - ज्ञान की चेतावनी - 112
  • सूखा पत्ता भी काम का | तू चेतन किस काम का ? जब चेत न हुआ , सचेत न हुआ | - चेतावनी - 112
  • प्रकृति के भजन का अवलोकन करनेवाले को जैसे भजन से फुरसत मिल जाती है । शरीर जो प्रकृति का उद्यान है , उसकी प्रकृति को समझ कर व्यवहार में लाने से रोग से मुक्त हो जाता है तथा पुरूष प्रकृति के नृत्य अवलोकन करने वाले को रोग , शोक , मुक्ति से भी मुक्ति मिल जाती है | प्रकृति का खेल देखो - भूल कर भी खेलोगे तो भूल भी बनी रहेगी और खेल भी बना रहेगा | - ज्ञान - 112
  • रोग से मुक्त वही - जो प्रकृति को शरीर , मन , बुद्धि अहंकार का रोग दे डाले | दवा हवा हो जाती है , सौ की दवा , दया से ऊपर उठकर निज पुरूषत्व को स्वीकार करो | - ज्ञान - 113
  • भ्रम की दवा ? रम | राम में | - चेतावनी - 113
  • विचारों का प्रलेप कर , क्यों प्रलाप करता है ? - ज्ञान की चेतावनी - 113
  • प्रकृति ने गुण दिये किन्तु तुमने गुणातीत बनाया | - भाव - 113
  • आराम भवन , आराम भवन शत शत प्रणाम आराम भवन जुग जुग जीओ आराम भवन हम सुखियों का आराम भवन संत का प्यारा राम भवन आराम भवन , आराम भवन गुरु दरश कराया राम भवन निज रूप लखाया राम भवन आराम भवन , आराम भवन ।| - भक्ति - 113
  • पंथ देखा , ग्रंथ देखा , शांति कहाँ ? संत ने ग्रंथ की ग्रंथी का अन्त किया दर्शन मात्र से | - भक्ति की चेतावनी - 113
  • गुण की पूजा तो ठीक किन्तु गुण ग्राहकता ही पूजा है | - चेतना - 113
  • मिट्टी में सोना चाँदी को छिपाया और सुख शांति को | - चेतना - 114
  • खोये दिल की बात न सुन , कहीं तेरा दिल भी न खो जाय | - भक्ति की चेतावनी - 114
  • चोर नहीं चित्त चोर , ( तोड़ ) तोर नहीं , मन मोर लगी प्राणों की होड़ तोड़ी क्यों ? अब जोड़ , मेरे दिल की कोर , रात नहीं अब भोर - भक्ति - 114
  • कहकर सन्तोष करुँ , यह कैसे हो ? बोलते बोलते शब्दहीन और फिर ? लींन हो गया , तल्लीन हो गया | | - भाव - 114
  • यहाँ की बातें वहाँ ? नहीं यहाँ की बातें यहाँ | कुछ कहते हैं यहाँ वहाँ कहाँ ? है या नहीं जानों तो कहो | - ज्ञान की चेतावनी - 114
  • समय मिला , फिर तू क्यों न मिला ? - चेतावनी - 114
  • लोग कहते हैं कि प्रकृति के खेल का पता नहीं लगता - बात ऐसी नहीं है , खोजी को पता लग जाता है | रोग का निदान हो जायगा , दवा यहीं पीनी पड़ेगी | - ज्ञान - 114
  • दास तो कुछ समय के लिए सेवा करता है और चाहता है सब कुछ | चाहे बोले या न बोले | किन्तु स्वयं को तो दिन - रात काम पर ध्यान रखना पड़ता है जाये कहाँ ? - ज्ञान - 115
  • नेकी के गीत गाये | न एक की तो कैसी नेकी ? - चेतावनी - 115
  • अबोध की बातें अबोध | बातों में बातें , आगे गति नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 115
  • मैं कूड़ा साफ करता रहा - दुनिया फैलाती रही | तेरी ओर देखा तो कूड़े का पता नहीं | - भाव - 115
  • मैंने तो गीत गाये हैं , सुनाये नहीं | - भक्ति - 115
  • भूल शूल | याद शाद | - भक्ति की चेतावनी - 115
  • किताबें पढ़ीं , प्रेम के दीवानों का दिल न पढ़ा , विद्या अधूरी ही रही | - चेतना - 115
  • किसको किस पर न्योछावर करूँ , कुछ हो भी ? था तब भ्रम था | है , तब है ही नहीं | - चेतना - 116
  • " श्वास में वास " कहते सुना किन्तु भीतर बाहर का सम्पर्क आज भी अनजान | - भक्ति की चेतावनी - 116
  • जर जर को तू तर तर कर दे । - भक्ति - 116
  • आज मैं क्या कहूँ किसे कहूँ कि तुम क्या हो , किसके हो ? - भाव - 116
  • " मैं " पसन्द आई , हाँ पसन्द , ना पसन्द , मैं पसन्द आई , जग में मैं पसन्द आई | - ज्ञान की चेतावनी - 116
  • मुँह बनाने वाला यदि मुख देख पाता अपने प्रभु का तो अवस्था ही बदल जाती | - चेतावनी - 116
  • बलहीन , बल भी खो बैठा , हीनता स्वीकार की | किन्तु बलदेव ने बल दिया , देव बना , वेद स्वरुप दिखलाया | है न बलदेव | - ज्ञान - 116
  • ताल तो लता कुंजवाला जानता है | मैं तो अपने ही में गाता हूँ , समाता हूँ | - ज्ञान - 117
  • यह बेचैनी कल्पित | कल्पित के लिये बेचैनी क्यों ? - चेतावनी - 117
  • जरा बैठने दे | जरा जरा करते जरा आया , अब संभाल | - ज्ञान की चेतावनी - 117
  • हँस कर कहूँ या रो कर कि अब तुम मेरे हो | विश्वास मुझे है , जग की बात जग जाने | - भाव - 117
  • बरसत धारा हरषत हृदय हमारा | - भक्ति - 117
  • स्वर्ग , नरक ने हलचल मचा दी - प्यार वाला शांत | - भक्ति की चेतावनी - 117
  • लगा तार तो लगातार , नहीं कैसा लगातार | - चेतना - 117
  • अधिक तो धिक | कम तो नहीं गम | - चेतना - 118
  • सरल से कपट व्यवहार ? गरलवत् सिद्ध होगा | - भक्ति की चेतावनी - 118
  • पीसते पीसते पिस गया | - भक्ति - 118
  • दिखलाऊँ किसे - मेरा दिल तो तुम्हीं में रमा है | - भाव - 118
  • कौन सत्संगी ? मन या तन | मन सत् में समाया , और तन ? तन नत हो गया , और संगी ? संगी असंगी का | - ज्ञान की चेतावनी - 118
  • व्यक्त का वक्त आता है किन्तु अव्यक्त है अतः है ही नहीं , ऐसा क्यों मान बैठा ? - चेतावनी - 118
  • दो में दुनिया , दो से दुनिया | दोनों एक - कर्त्ता , क्रिया , कर्म , एक | - ज्ञान - 118
  • जान दे | जान ले | - चेतावनी - 119
  • सोया सो खोया | किन्तु अब जागा तो पाप भागा , पुण्य जागा | - ज्ञान - 119
  • हड़बड़ाने वाला - हरि बड़ा हर बड़ा कब कहता है | - ज्ञान की चेतावनी - 119
  • युगों की साधना सफल , दर्शन तो हुआ | - भाव - 119
  • गोपी - पीले श्याम - नीले रस पी रास रस में रास - भक्ति - 119
  • गोता लगाता तो गाता न रहता , रिझाता न रहता | - भक्ति की चेतावनी - 119
  • स्वीकृति ने , कृति प्रकृति के बन्धन से मुक्त किया | - चेतना - 119
  • दिवाली में ( ज्ञान ) दीपक जला , होली में ( उसकी ) हो ली | चैत प्रारंभ था फाल्गुन में फाग खेली और अंत हुआ ( कामना का ) | - चेतना - 120
  • ये अधिक बातें अपने को भुलाने के लिये या रिझाने के लिये ? - भक्ति की चेतावनी - 120
  • एक बार तुम मुझे पुकारो , एक बार तुम मुझे पुकारो | - भक्ति - 120
  • दम है तेरे कदमों के लिए | हरदम यह ध्यान बना रहे | - भाव - 120
  • पाप की भावना को पुण्य की भावना से बदल | राशिवाला , राशि वाले को बदलता है | ( कंस को कृष्ण , रावण को राम बदलता है ) - ज्ञान की चेतावनी - 120
  • दिल की शोध हुआ बोध | अब मोद ही मोद | - ज्ञान - 120
  • खुदा ने खुदा ही बनाया | जिनके दिल में खुदा , खुदा ही रहा - खुदा ही रहा | खुदा ही हुआ | - चेतावनी - 120
  • बस , सब मैंने जाना | मैं न जाना | तो आना भी है जाना | - चेतावनी - 121
  • जिसने गले में ग्रन्थ को , अंटी में धन को लगा रखा है उसी को तू धनी समझता है | व्यवहार उत्तम नहीं तो हार है जीवन की | - ज्ञान की चेतावनी - 121
  • प्यार किसने घोला प्राणों में ? तुमने या तुम्हारे प्यार ने | - भाव - 121
  • सुने बैन , खुले नैन | - ज्ञान - 121
  • मोहन , मोह नहीं , तुम कैसे मोहन ? मोह न लो , जादू डार कर , मोह लो , तो सब मोह दूर हो जाय , झगड़ा मिट जाय | - भक्ति - 121
  • ग्रंथों की पूजा की , पाठ भी किया किन्तु लाभ क्या उठाया ? - भक्ति की चेतावनी - 121
  • आकाश की छाया और जगत की माया | दोनों ही दूर | - चेतना - 121
  • छूटा वही त्याग | आया वही भोग | - चेतना - 122
  • प्रेमी की राह न देखी , गुण देखा , अवगुण देखा | प्रेम न अनुभव किया , न राह देखी , भूला कि भूलता ही रहा | - भक्ति की चेतावनी - 122
  • ठाकुर , मत ठुकराओ , दिल के साज सजाओ | ठाकुर कहता है मत ठुकराओ , दिल के साज सजाओ | - भक्ति - 122
  • लौ लगी , युक्त हुआ , मुक्त हुआ | - ज्ञान - 122
  • आली हरि आये - हरियाली छाई | सदा बहार - सदा बहार | - भाव - 122
  • दो पक्ष को एक ( मन ) पर ला , तो गति , स्थिति बनें | - ज्ञान की चेतावनी - 122
  • धर गिरधर या हरिहर | भार न रहे , चार न रहे | - चेतावनी - 122
  • ताना बाना में क्यों बँधा ? तू स्रष्टा , द्रष्टा , तुष्टा फिर कर्म उपासना किसकी ? - चेतावनी - 123
  • दे , ख , फिर देख , यति की ज्योति , सती का सत्य , अलख का लखना | - ज्ञान की चेतावनी - 123
  • देव बनाये , देवी बनाई | जब अपनी बन आई तब ... तब .... कहना क्या ? - भाव - 123
  • शिव जीव से कहता था सब मेरी विभूति - विभूति को विभूति समझ , तू ही शिव है | - ज्ञान - 123
  • उदासी तो तुम्हारी दासी है , उदास बने उदासी के दास बने , प्रभु दास सदा प्रसन्न , चूक नहीं , हूक नहीं | - भक्ति - 123
  • साध लीन - साधना पूर्ण | - भक्ति की चेतावनी - 123
  • विपरीत क्लिष्ट | अनुकूल इष्ट | - चेतना - 123
  • क्षुद्र खेल | क्षुद्र मेल | - चेतना - 124
  • कहता था भक्त बड़ा या भगवान ? न भगवान बना न भक्त | एक बनता तो जानता कि दोनों एक ही है | - भक्ति की चेतावनी - 124
  • एक लहर , एक नजर , एक ही नजर | - भक्ति - 124
  • मृत्यु यौं थी कि मैं तू में मन खेल रहा था | तू अमर है | " है तू है " यही अमर | - ज्ञान - 124
  • जल में मल कमल |जल देख ,कमल देख ,मल का गीत क्यों ? - चेतावनी - 124
  • वाणी बाँसुरी बनी | भक्त की भावना राधा , संत की भावना कृष्ण | दोनों विभोर वाणी में आत्मा परमात्मा का युगल मिलन | - भाव - 124
  • सुरंग में सुरंग खोज | - ज्ञान की चेतावनी - 124
  • रंग बिरंगे फल काम क्रोध लोभ हैं | इनका व्यवहार सीख | काम को प्रिय के काम में लगा | क्रोध से क्रोध कर , लोभ प्रिय दर्शन का | - ज्ञान की चेतावनी - 125
  • क्यों दुनिया बसाई , जब पर्दा ही रखना था ? प्रिय से पर्दा, तुझे शोभा देता है ? - भाव - 125
  • ध्यानी ध्यान में पाता है | क्यों नहीं ,चोर चोरी में पाता है धन | ध्यानी , चोर ? ध्यानी चित्त चोर का ध्यान करता है और चोर का चित्त तो केवल ध्यान ही में , वह भी कहलाने वाले में | - चेतावनी - 125
  • भविष्य अंधकार पूर्ण | गलत है , पूर्ण का भविष्य भी पूर्ण - भूत , वर्तमान का फिर कहना ही क्या ? - ज्ञान - 125
  • जाहिर हो , जहर न बन , तेरी मेहर , कहाँ जहर फिर तो महर ही महर | - भक्ति - 125
  • मेरा दिल देख , मेरा दिमाग देख | झगड़ते क्यों हो ? दोनों में प्रियतम को देखो कि देखने से भी फुरसत मिले | - भक्ति की चेतावनी - 125
  • मानसिक रोग | शारीरिक भोग | - चेतना - 125
  • तर अंग और प्रत्यंग यह तरंग | - चेतना - 126
  • मनन कर मन न रहेगा | भाव ही मन पर न्योछावर होगा | - भक्ति की चेतावनी - 126
  • बाबा ! बच्चों का स्वभाव , तेरा स्वभाव है तेरा नाम प्रिय क्यों है ? दे बल , ले बल , हे बालकों के बलदेव | यह तेरी पुकार | - भक्ति - 126
  • क्या कभी सोचा कि क्या हो रहा है ? सोचने का समय ही कहाँ ? यहाँ तो कर्म ही कर्म| धर्म में भी कर्म, धन में भी कर्म , ध्यान में भी कर्म | कर्म सरिता में मर्म आहत हो रहा है | - चेतावनी - 126
  • देखते देखते क्या डाल दिया आँखों में एक ही दीख पड़ता है | - भाव - 126
  • प्राचीन ऋषि मुनि क्या कहते नहीं आये कि इनको तजो , और तुम कहते हो इनको भजो | नहीं भजना कैसा ? भागना कैसा , इन्हें देखो या उपयोग में लाओ | - ज्ञान की चेतावनी - 126
  • दो को एक कर न सका तो कैसा ज्ञान ? 'ज्ञ ' भी तो दो अक्षरों के संयोग से बना है | - ज्ञान - 126
  • योग्य के लिये योग भी है , भोग भी | विराट के लिये विराट भाव - यही योग्य है | - ज्ञान - 127
  • क्रम ही विकास | ना ह्रास ना प्रकाश | - ज्ञान की चेतावनी - 127
  • कितना प्यासा है तू प्यार का ? पास रह कर भी प्यास नहीं बुझती तेरी और मेरी | - भाव - 127
  • क्या कभी गीता पढ़ी ? गीता पढने की है या गीत गाने की ? नहीं , नहीं गीता न पढ़ी और न गायी | आप ही रोम समाई जब मन भाई | - चेतावनी - 127
  • क्यों कथा ? मैं थका | - भक्ति - 127
  • मोदक का मोद बच्चों के लिये | मोद ही बड़ा मोदक है | - भक्ति की चेतावनी - 127
  • वख्त कहाँ कि भक्त बनूँ | कम बख्त - यदि कमबख्त कहे तो बुरा क्यों मानूँ ? - चेतना - 127
  • प्रण ही प्राण | प्राण ही प्रणव | - चेतना - 128
  • याद कर फरियाद कैसी ? - भक्ति की चेतावनी - 128
  • खता बता , मत सता | - भक्ति - 128
  • चोरी भी सतर्कता से की जाती है , फिर ध्यान लापरवाही से क्यों ? ऊपरी आँख बन्द फिर भीतरी गति , भीतरी ही दिखलाने लगी | क्या यही ध्यान है जिसका अभिमान है ? - चेतावनी - 128
  • बोल अनमोल थे जब हृदय से द्रवीभूत हो रहे थे | आँखों में तरी आई तो लोग कहने लगे - आँसू हैं | - भाव - 128
  • खिलने के स्थान पर रुठना , यह कैसी प्रकृति ? - ज्ञान की चेतावनी - 128
  • परिवर्तन जीवन | गति जीवन | सत्य स्थिति है | - ज्ञान - 128
  • अशरीरी से प्यार क्यों ? आत्मा अशरीरी , प्यार अशरीरी , परमात्मा अशरीरी | समान धर्मी में प्यार स्वाभाविक होता है | - ज्ञान की चेतावनी - 129
  • मुस्कराया तो इधर आया | - चेतावनी - 129
  • युग बदले , योग बदले किन्तु युगल न बदला | आज भी योग से पूर्ण है | अनुभूति है | - ज्ञान - 129
  • प्रेम तो हेम है , आलू नहीं सेम है | प्रेम क्या आग है ? रोटी के लिये शाक है | - भक्ति - 129
  • एक मिनट | नहीं एक मिन्नत | - भक्ति की चेतावनी - 129
  • श्रम विश्राम चाहता है | अनुराग प्राण चाहता है , जहाँ श्रम नहीं , गति में विश्राम है | - चेतना - 129
  • छोटे बच्चे आज तेरी बातें कहते _ कहते तेरे ही रूप में लीन हो गये | कृपा है कृपा | - भाव - 129
  • बाजे बज रहे हैं , लोग पूजा कहते हैं | ध्वनी में तू नृत्य कर रहा है , लोग अनजान हैं | - भाव - 130
  • तेरा नाम पवित्र | नहीं तेरी भावना पवित्र | - चेतना - 130
  • विश्वास पूर्ण न हुआ तो ? फिर भी विश्वास रख पूर्ण होगा | - भक्ति की चेतावनी - 130
  • बिहारी , मैं हारी | तू जीता , मैं वारी | - भक्ति - 130
  • एक ने फैलाया | एक ने बढ़ाया , एक ने मिलाया | एक में मिला - शांत | - ज्ञान - 130
  • शिव के वक्षस्थल पर काली खड़ी है , जब जान जायेगी तो जिव्हा आप ही निकल पड़ेगी | कल्याण पर भयंकर चंचलता का नृत्य हो रहा है | जब जाना कि शान्त हुआ | - चेतावनी - 130
  • फिर अव्यक्त कब व्यक्त ? वख्त आता है जब व्यक्त अव्यक्त का पता लगता है | - ज्ञान की चेतावनी - 130
  • बिन्दु में सिन्धु की कथा प्राचीन है | - ज्ञान की चेतावनी - 131
  • स्वर में स्वर मिलाने की चेष्टा | स्वर रहित कब होगा ? - चेतावनी - 131
  • संहार नही , संग आहार संग विहार , इसे मृत्यु कहूँ ? - ज्ञान - 131
  • हरि , अब क्या रही ? साधना , आराधना कामना , भावना | - भक्ति - 131
  • रागात्मक वृत्तीयाँ क्यूँ बेचैन ? वृत्ति तो वह घेरा है जिसे जाननेवाला ही जाने | - भक्ति की चेतावनी - 131
  • प्यार मर गया | नहीं , प्यार अमर है , आनंद अमर है , आत्मानन्द अमर है | - चेतना - 131
  • अनेक जन्मों की साध आज पूर्ण , जब पूर्ण को देखा , उसकी आँखों से | - भाव - 131
  • आज किससे कहूँ , कि जलता हूँ या प्रकाश देता हूँ ? जानने वाला ही जानता है | - भाव - 132
  • चिथड़ों को चुनने वाला पागल था किन्तु उल्टे सीधे विचारों को चुनने वाला शायद महा पंडित था | - चेतना - 132
  • खेल प्यार से | खेल से ही समाधी | - भक्ति की चेतावनी - 132
  • पिया रे पुकारे , आ रा ध ना | ( प्यारे पुकारे आ राधे ना ) | - भक्ति - 132
  • मैं तू की मृत्यु में , न मैं रहा न तू - ज्ञान - 132
  • विवश की विवशता पर न हँस , शायद विवशता ही न रहे | - चेतावनी - 132
  • अंश में वंश है | ना समझे ध्वंश ( डिग्री का अंतर ) लोम में प्रेम विलोम में घृणा | सरलता - वक्रता | सहानुभूति - जलन | दया - आवेश | करूणा - क्रोध | मुदिता - नापसंदगी | भक्ति - ईर्ष्या | प्रेम - घृणा | ज्ञान - अज्ञान | - ज्ञान की चेतावनी - 132
  • दिल की तरंगो का नाम काम क्रोध लोभ आदि है | तरंगों में बहेगा या उठती हुई को देख , देखने का आनन्द लेगा ? - ज्ञान की चेतावनी - 133
  • क्षणिक आराम भी जीवन की गति विधि बदलता है | - चेतावनी - 133
  • कर्म मकड़ी का जाल है | ज्ञान ने जाल से मुक्त किया किन्तु भक्ति तो डुबा देती है वृत्तियों को | - ज्ञान - 133
  • बाधा थी , राधा न थी | राधा होती तो मय हो जाती | वियोग सहती कैसे ? - भक्ति - 133
  • कदम उठाया उत्थान और रखा उसी को पतन समझ बैठा | यह तो गति है उत्थान पतन कैसा ? - भक्ति की चेतावनी - 133
  • तुम उघाड़ने में लगे हो और मैं ढकने में तुम्हीं बताओ कौन अच्छा ? - चेतना - 133
  • युगों से वर्षण हो रहा था अमृत | आज तुम दिखलाई दिये | - भाव - 133
  • देख कर भूलूँ या फूलूँ ? भूलूँ अभाव , फूलूँ कमलवत् | आज तुम दिखलाई दिये | - भाव - 134
  • स्थूल को छूकर क्या पाया ? छूआ छूत | - चेतना - 134
  • यह वासना , यह अंहकार | तुम इसे भक्ति ज्ञान कहते हो | भाव गिरा , भाव में आओ | - भक्ति की चेतावनी - 134
  • भक्त के हृदय तख्त पर भगवान शोभा पाते हैं | - भक्ति - 134
  • शून्य में भ्रमण करनेवाला ग्रन्थ रचता , फूला नहीं समाता | - ज्ञान - 134
  • गति वाले की गति कैसी ? - चेतावनी - 134
  • विचारों के दलों ने आच्छादित कर रखा है आत्म प्रकाश को , किन्तु कब तक ऐसी स्थिति रहेगी ? हृदय की विकलता ही विलीन कर देगी आच्छादन को | - ज्ञान की चेतावनी - 134
  • बुद्धि की विकलता , मन की चंचलता , तन की अस्थिरता में शांत , अनंत प्रज्ञान का आनन्द देख न सका तो व्याकुल ही रहेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 135
  • बदलता ही है तो दू को सु में बदल फिर बदलने की इच्छा ही न रहे | - चेतावनी - 135
  • निन्यानवे में एक मिला , सौ में सो जा | एक को लख | फिर शून्य तो शून्य है | एक नहीं तो सभी शून्य है | - ज्ञान - 135
  • गुरु प्रसाद बिन काज न होई | - भक्ति - 135
  • प्यार सन्तोष में स्नान कर , देख सम्मुख देव खड़ा , बलदेव खड़ा | - भक्ति की चेतावनी - 135
  • सजी प्रकृति से तू ने क्या लिया ? क्या लेता , देखा और चलता बना | - चेतना - 135
  • बेचा है तन , मन नहीं | मन मेरा तेरा | तन से चाहे अनेक काम क्यों न हों ? - भाव - 135
  • मन मिला , दिल खिला | प्राणों में जा बसा , अब जन्म कैसा ? - भाव - 136
  • प्रकृति मेरे प्यार को क्यों छीनती है ? वह तेरे प्यार के लिए तरस रही थी | - चेतना - 136
  • प्रकृति नर्तकी नृत्य करे तो करे | नर्तकी नर तकी ( नर तक ही ) नर को ताकती है तू तो पुरुषोत्तम है | तू क्यों सौंपता है धन ? हाव भाव में भूल गया कि तू कौन है ? तू वही है | - ज्ञान की चेतावनी - 136
  • इस प्राणमय लोक में भी मृत्यु ? है , जिनके प्राण प्राणपति के लिये व्याकुल न हों | - भक्ति की चेतावनी - 136
  • सर दे कर रस पाया | - भक्ति - 136
  • नयन दे वह दृष्टि पाई , सब जला नव सृष्टि पाई , आत्म ज्योति जगमगाई - अलख वीणा को बजाई | - ज्ञान - 136
  • गठबन्धन पार्थिव है अतः दोनों ही बन्धन | - चेतावनी - 136
  • कातर , कब तर | - चेतावनी - 137
  • तरी तरी ( जीवन नौका तरी ) तरी तरी ( आनन्द में आनन्द ) हरी हरी ( आनन्दित भाव ) भरी भरी ( पूर्णानन्द ) - ज्ञान - 137
  • बलबलाने वाला बल को क्या जाने ? बलदेव को क्या माने | - भक्ति - 137
  • मोह का हवन हो , प्रेम की सुगन्ध हो , फिर न जीवन हो , न जीव हो | - भक्ति की चेतावनी - 137
  • स्थूल का पुजारी तो प्रकृति पर बलिहारी | सूक्ष्म का पुजारी तो प्रकृति सदा हारी | कारण का रण खोज तो महाकारण में लीन हो | - ज्ञान की चेतावनी - 137
  • जहाँ रस नहीं वहीं बालू , किन्तु बालू में भी रस है , तभी तो खजूर जैसा मीठा फल होता है | - चेतना - 137
  • कैसा यौवन ? यौवन के प्रभात में कितने ही भिक्षुक आये | जीवन की संध्या में तुम्हीं ने अपनाया | कृतज्ञता ने मूक बनाया | - भाव - 137
  • वरण किया है वर्णन नहीं| वर्ण मेरा नहीं तेरा नहीं | फिर आवरण ? यह छल है या परीक्षा ? तुम्हीं जानो | - भाव - 138
  • समान है फिर भी अंतर रखा , समानान्तर है | - चेतना - 138
  • मैं आया | तुम्हे बुलाया | - भक्ति - 138
  • सीमित राग , असीम बैराग | - भक्ति की चेतावनी - 138
  • चंद्र मेरा मन , सूर्य मेरी आँखें | वेद यों भाखे | - ज्ञान - 138
  • वक्ता , यदि नहीं चखता , तो क्या चखायेगा ? यों तो बात बनायेगा -- समय बितायेगा | - चेतावनी - 138
  • स्थूल सूर्य एक ही दीख पड़ता है किन्तु सूक्ष्म आत्म सूर्य शून्य आकाश में अनन्त है | - ज्ञान की चेतावनी - 138
  • मन मानेगा , तब जानेगा | - चेतावनी - 139
  • कल्प कल्पान्त से संकल्प , विकल्प खेलते आये | खेल का अंत कब ? मन ने मना न किया और न माना | - ज्ञान - 139
  • हँसना चाहते हो या आनन्द | रोना चाहते हो या प्रेमाश्रु | - भक्ति की चेतावनी - 139
  • घर में प्रियतम पाये | अब बाहर क्यों मन भाये ? - भक्ति - 139
  • गुण पर मुग्ध , निर्गुण को कौन पूछे ? - ज्ञान की चेतावनी - 139
  • फूल तेरे काँटे तीखे हैं , चुभते हैं और याद दिलाते हैं कि फूल है | - चेतना - 139
  • कहने लगा , बहने लगा | न होश रहा न जोश | दूध में मिश्री - प्राणों में मिठास | अब क्या बात ? - भाव - 139
  • भिक्षुक सम्राट पद पर आसीन | अरे छलिया तेरी वाणी ने मुझे कहीं का न रखा | - भाव - 140
  • मिलती जुलती चीजों ने भ्रम पैदा किया | पहचानने लगा और भ्रम अब मर्म बतलाने लगा | - चेतना - 140
  • अरी , सुन तो | ना , री मेरा प्रियतम आया | न सुनूँ न सुनाऊँ | कैसे प्रियतम के मन भाऊँ , या वाही में समाऊँ ? - भक्ति - 140
  • धर्माचार्यों ने झाड़ू ली तू जल ले | जो काम झाड़ू से न हुआ वह जल से होगा | कर और देख | - भक्ति की चेतावनी - 140
  • माया - जान गई शान गई ब्रह्म - तो जान गया तो जान गया , मान गई जान गया , तो जान गया पहचान गया | - ज्ञान - 140
  • मन मानी , कब जानी ? - चेतावनी - 140
  • गुणातित ही निर्गुण , फिर यह कहना न बन पड़ेगा " प्रभुजी मेरे अवगुण चित्त न धरो " - ज्ञान की चेतावनी - 140
  • सम्बन्ध - ही बन्ध , भावना में - अन्ध , क्यों बिन्दु ? क्यों सिन्धु ? हे बन्धू ? - ज्ञान - 141
  • मन - मनमोहन सोहं सोहं | - चेतावनी - 141
  • स्पर्श कर चरण हृदय से , रोम रोम पुलकित हो | - भक्ति की चेतावनी - 141
  • बाबा ! लोग साधना की कहते हैं | मुझे तो तेरा सा धन मिला | - भक्ति - 141
  • शरीर रहते निर्गुण कैसे हो ? शरीर तो साधन है | गुण और निर्गुण तो भाव है | भाव से ऊपर | - ज्ञान की चेतावनी - 141
  • अब किसकी निन्दा किसकी स्तुति जब समझा की विपरीत और अनुकूल का झूला चक्कर में है | - चेतना - 141
  • भुलावे में न डाल | देख दुनिया ने मेरी शांति छीन ली | तू तो मेरे प्राणों का ग्राहक है | - भाव - 141
  • चुप रह कर सब पाया | भक्त पाये , आनंद पाया | - भाव - 142
  • कर्म को प्रधानता दूँ या धर्म को या मर्म को या प्रणय को ? - चेतना - 142
  • अतीत कैसे हो ? बिता सो अतीत | बीत-राग , अहा भाग्य | - ज्ञान की चेतावनी - 142
  • मैं क्या चाहता हूँ ? एक का होना | तुम क्या चाहते हो ? मैं में समाना । - भक्ति - 142
  • माला में दाने देखे , फूल देखे , एकता न देखी जिसने सब का हृदय एक कर दिया | - भक्ति की चेतावनी - 142
  • समुद्र का नमकीन जल मीठा जल बन गया , कैसा चमत्कार है ? किन्तु तू न बदल पाया मन को , प्रकृति को | - चेतावनी - 142
  • बनना नहीं , होना | तुम हो न , यही वेद का मर्म है | - ज्ञान - 142
  • लागी रे , अब लागी रे , भागी रे , दुर्मति भागी रे , जागी रे , ज्योति जागी रे | - ज्ञान - 143
  • ये प्रकृति के खेल हैं -- खेल कह कर , खेल न कर | - चेतावनी - 143
  • प्यार बलि चाहता है अहं की | बलि दे या बलिहार जा | - भक्ति की चेतावनी - 143
  • खेलते खेलते , कहाँ चले गये ? गया कहाँ ? तुम खेलते चलो , मैं हूँ न | - भक्ति - 143
  • पुराना - पुराण पुराना , वेद पुराना | फिर नया ? न या , यह नहीं - कुछ नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 143
  • सरल को समझदारों ने गरल सा बनाया पुस्तकों के आधार पर | - चेतना - 143
  • शरीर में हृदय है यह सुना और देखा तस्वीर में | यदि तस्वीर हृदय में खिंच जाय तो क्या हो ? होना कैसा - कहेगा तुम हो न अब मैं क्या कहूँ ? - भाव - 143
  • कान्त! क्यों आग लगाई दिल में ? एकान्त चाहता हूँ | नहीं तो दिल का राज जान पायेगी दुनिया | - भाव - 144
  • एक सोता है और एक जागता है , कैसे जानूँ कि दोनों एक ही हैं | एक भक्त बनता है और एक भगवान , कैसे जानूँ की दोनों एक ही हैं | - चेतना - 144
  • और की ओर फिर अपनी ओर कब देखेगा ? - ज्ञान की चेतावनी - 144
  • शंख किसने फूंका ? बाबा ने | बच्चे नाच उठे | हरि हर बोल | - भक्ति - 144
  • फूल चंदन में ही भक्ति बह गई तो , हृदय का स्थान कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 144
  • आगे बढे तो प्रकृति अनुसरण करे , अनुकरण करे | - चेतावनी - 144
  • क्यों हैं न मेरा रूप ? धूप जला अब धूप | - ज्ञान - 144
  • अब घर पाया | या अब घर आया | भरम मिटाया | हाथ में हाथ मिलाया | - ज्ञान - 145
  • प्रकृति प्रधान तो पीछा करता - करता थक जाएगा | - चेतावनी - 145
  • मैंने सूर्य की किरणों के रूप में तुम्हें स्पर्श किया | तुम भी भाव की भाप बन ऊपर उठो और बरसाओ प्रेम जल को प्यासी दुनिया तृप्त हो | - चेतना - 145
  • और का कब ओर छोर ? - ज्ञान की चेतावनी - 145
  • किससे कहें किस्से , कहानी अपने दिल की | - भाव - 145
  • दास क्यों उदास ? प्रभु दर्शन बिना | - भक्ति - 145
  • मम बन , मर्म जानें , धर्म जानें , कर्म जानें | - भक्ति की चेतावनी - 145
  • फाल्गुन फिर आया | गुण , निर्गुण का खेल छोड़ | खेल फाग , हो जा बाग-बाग | - भक्ति की चेतावनी - 146
  • लिखना उनके लिए जो खिलना जाने | - भक्ति - 146
  • प्राणों में पाया , जब तुमने दिखाया , तुम्हारी बातों ने रिझाया | - भाव - 146
  • मैं की ओर ' मोर ' | मन मोर नाचा , शोक भय भागा | - ज्ञान की चेतावनी - 146
  • बह कर जायगा कहाँ ? समुद्र में | तो बहने दे भाव , बदलने दे भावना | - चेतना - 146
  • देखता नहीं तू कहाँ स्थित है | सूर्य पीछे , चन्द्र आगे | - चेतावनी - 146
  • वाह रे , हरे हरे भरे भरे | - ज्ञान - 146
  • व्यक्त होते होते व्यक्ति , व्यक्ति ही समष्टि , यह दृष्टि ही वह दृष्टि , इसकी पुष्टि ही संतुष्टि | - ज्ञान - 147
  • चन्द्र तेरी परिछाँई , सूर्य का प्रकाश तुझे स्पर्श न कर सका | - चेतावनी - 147
  • कर्म का क्रम रहा , कम न हुआ , जब तक भोगेच्छा है | - चेतना - 147
  • याद आँसुओं में बदल गई | गई कहाँ? बदल गई कहाँ? याद बनी रही तरो ताजा | तुम्हारी याद थी , मेरे स्वामी| | - भाव - 147
  • उत्साह में भी आह खोजता है ? तो फिर शरीर भंग , मन भंग | - ज्ञान की चेतावनी - 147
  • सदा एक रस प्रतीत क्यों नहीं होता ? अपनी दशा देखो , समझ सकोगे | - भक्ति - 147
  • बच्चे ही सच्चे | और ? मिथ्या गाल बजाते | - भक्ति की चेतावनी - 147
  • मित्र को निमित्त बनाता , महाभारत रचाता , वह कौन है ? तुम्हारा सखा , श्याम | - भक्ति की चेतावनी - 148
  • अगाध क्या है ? आनन्द सागर | - भक्ति - 148
  • चंचल मन चल , जहाँ गति शांत हो | - ज्ञान की चेतावनी - 148
  • सब पर आवरण देखा । आवरण को बताने वाले पर भी आवरण । आवरण हटा , जब आई निर्मल की छटा । दिल तेरे चरणों में सटा , अब हटा , अब हटा । जब आई निर्मल की छटा । - भाव - 148
  • बुलबुला देखा , वायु का खेल देखा | अभी खिलाती , अभी मिटाती | - चेतना - 148
  • ध्यान देगा तो ध्यान आयेगा | - चेतावनी - 148
  • तुम्हारे स्वप्न कब प्रत्यक्ष ? वह रूप कब समक्ष ? जीवन का अब वही लक्ष्य | आवे समक्ष होकर प्रत्यक्ष | - ज्ञान - 148
  • ये पुकार , क्यों बेकार ? लक्ष्मीपति तू ही | - ज्ञान - 149
  • मन के पीछे बुद्धि या बुद्धि के पीछे मन | - चेतावनी - 149
  • कह बाबा की बात | माँ सब जानती है | बाबा मेरा मैं बाबा का , कहूँ क्या ? यह भी क्या कहने की बात है ? - भाव - 149
  • वाणी गुँजी , घट झंकृत | जड़ में चेतन गूँज रहा है | - चेतना - 149
  • तुम सुनते भी हो ? मुझे पुकारता ही कौन है ? - भक्ति - 149
  • चंचल तो चलता ही है | नहीं , चलता नहीं , चक्कर काटता है , छटपटाता है | चाल निश्चित लक्ष्य की ओर , और तो चाल नहीं , बेहाल | - ज्ञान की चेतावनी - 149
  • गुलाब ने कहा गुलाल ले | अबीर ने कहा - अब देर न कर | प्राण गुलाल , दिल अबीर | - भक्ति की चेतावनी - 149
  • हाथ पैरों से तैर कर पार करना चाहता है , जानता नहीं , ये तो यहीं पड़े रह गये | अरे मन से तैर कि दोनों किनारे एक हो जायें | - ज्ञान की चेतावनी - 150
  • बलहीन , बल भी खो बैठा , हीनता स्वीकार की | - भक्ति - 150
  • मुझे कपडा़ न दिखा , गहने न दिखा | दिखा मुख , जिसके बिना कहाँ सुख | सुख से आनंद में समाऊँगा , तब दुनिया भूल जाऊँगा | ऐसा सुना था - अब देखा है| - भाव - 150
  • मन मलीन तो बुद्धि प्रधान | मन निर्मल तो बुद्धि समाधान | - चेतावनी - 150
  • पंचम तल्ला - परमात्मा चौथा तल्ला - आत्मा तीसरा तल्ला - अहंकार दूसरा तल्ला - बुद्धि प्रथम तल्ला - मन आँगन - स्थूल सड़क - खेल | - ज्ञान - 150
  • तरंग में ' तू ' रंग , तरंग में तुरंग , तरंग में मैं रंग | तरंग व्याकुल नहीं - कूल किनारा पाती है और लौट आती है | - चेतना - 150
  • मल गुलाल मैल न रहे | होली तो होली | - भक्ति की चेतावनी - 150
  • ग्रहण न किया - कहता रहा चन्द्र ग्रहण , सूर्य ग्रहण | स्नान से ही फुरसत | ग्रहण से क्या ग्रहण करता | - भक्ति की चेतावनी - 151
  • कथन में भी क्रिया है किन्तु कथन मात्र | - चेतना - 151
  • दल बाँध कर बादल आये | सिर पर घिर आये | किन्तु चली पवन , हुआ ( उनका ) हवन | मँडराने वाले घबड़ा उठे | अच्छा प्रकृति का खेल है | ( विपत्ति के भाव ) - ज्ञान - 151
  • घाव में चीनी भी घाव पैदा करती है | - चेतावनी - 151
  • तुम्हे पाने के लिये मैंने आज हृदय दीप जलाया , श्वास की सुगंध फैलाई! मेरे रोम रोम के स्वामी मैं विवश हूँ अब तो मेरा कहने को कुछ भी न रहा | - भाव - 151
  • किन्तु बलदेव ने बल दिया , देव बना , वेद स्वरुप दिखलाया | है न बलदेव | - भक्ति - 151
  • हाथ पैर पर विश्वास , अपने पर विश्वास नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 151
  • ग्रन्थ ग्रन्थी खोलेंगे , पागल है | खोलने बाँधने वाला तो तू है | - ज्ञान की चेतावनी - 152
  • बलहीन आत्म प्रसाद खो बैठा , बलदेव ने आत्म परिचय दिया और प्रसाद भी खिलाया , प्रस्फुटित किया , है न , बलदेव | - भक्ति - 152
  • गति के गीत | कहाँ प्रेम कहाँ मीत ? - चेतना - 152
  • दीप ( शरीर ) जले निर्वाण के लिये | अमर दीप (आत्मा ) जला , अमर संदेश और प्रकाश के लिये | बुझना मुक्त होना कब हुआ ? लय हो रहा है अमर में | प्रकाश स्वयं फ़ैल रहा है | यह अमर ज्योति है | - भाव - 152
  • वाणी का वाण , प्राणों में विकलता , चंचलता , स्थिरता का भाव पैदा करता है , फिर प्रयोग सीख , योग सीख | - चेतावनी - 152
  • भाड़ में चना नाचता है , क्योंकि यह उसका अन्तिम नाच है | - ज्ञान - 152
  • गीत से रिझेगा कौन ? अर्पण कर , शांत हो | - भक्ति की चेतावनी - 152
  • पाप पुण्य भय से | प्रेम तेरा धन है | - भक्ति की चेतावनी - 153
  • नटी और नट ने नाचते नाचते नचा डाला दर्शकों को , इनका तन नाचता था और उनका मन | - ज्ञान - 153
  • ऊँचा वही , जो पहुँचा | ऊँचा प्रथम अक्षर ही अक्षर बनाता है | - चेतावनी - 153
  • आँसुओं का अर्ध्य अर्पित करूँ ? और क्या चाहते हो ? - भाव - 153
  • बातों की दुनिया से परे , और भी है | - चेतना - 153
  • तू कौन याद कर , दया क्यों चाहता है ? याद भुलाई , दया का पात्र बना | - भक्ति - 153
  • खुश होता है पढ़ कर , खुश होता है दे कर | वाह क्या खूब ? खुशी किसकी है जरा देख | - ज्ञान की चेतावनी - 153
  • भोग शरीर , तो योग आत्मा | शरीर का भोग रोग | आत्मा का योग योग | - ज्ञान की चेतावनी - 154
  • दरशन दे , अभी तरसन दे | अब तो दरशन दे , मन हरषन दे | दे , दे , दिल दे , अरमान दे , अभिमान दे , प्राणों का भान दे | - भक्ति - 154
  • बात का चक्र चला , चलता ही रहा | स्थिति , गति बातों में नहीं | - चेतना - 154
  • स्वामी ! ऐसी बात न कहो - मेरे प्राण व्याकुल हो रहे हैं | - भाव - 154
  • वह कौन सी बिजली जली जिसने रोम रोम को प्रकाशित कर दिया | वह बीज की बिजली थी जिसमें चर अचर व्याप्त थे | - ज्ञान - 154
  • पत्र रिक्त नहीं - भय क्रोध से पूरित कर रखा है | उढ़ेल आसुओं से | - भक्ति की चेतावनी - 154
  • प्रशंसक भी यदि शंका रखता है तो दुःख है | शंका की निवृत्ति कैसे हो ? - चेतावनी - 154
  • शोक कोसों दूर , यदि राग अनुराग को समझे | - चेतावनी - 155
  • ना उड़ना है न छिपना | प्रकाशित कर अपनी प्रेम सत्ता को | - भक्ति की चेतावनी - 155
  • शब्द से संसार , शब्दमय संसार , शब्द की झंकार , यह इस पार यह उस पार | - ज्ञान - 155
  • मन कहाँ लीन जो " मैं " का पता नहीं | - चेतना - 155
  • ये गालियाँ , ये गलियाँ याद रहेंगी - अलविदा | ये समुद्र की लहरें, ये लोरियाँ याद रहेंगी - अलविदा | - भाव - 155
  • तू है तो राधा भी है , श्याम भी सीता है राम भी - तू न होता तो कुछ न होता , कौन गाता ? कौन रिझाता ? - भक्ति - 155
  • बादल बदला - हवा हवा हुई | आकाश शाबाश | - ज्ञान की चेतावनी - 155
  • बादल टकराये | बिजली चमकी - तूफान उठे | आकाश शाबाश | - ज्ञान की चेतावनी - 156
  • आराम ही आराम | काम का क्या काम , न चाम और न दाम , न श्याम और न राम , आराम ही आराम | - भक्ति - 156
  • कुछ निराकार कुछ साकार के गीत गाते हैं | और तू ? क्या कहूँ वह दोनों से परे समाया हुआ है | वह ज्ञानी कैसा जो अभिमानी हो ? वह भक्त कैसा जो व्यक्त करने के लिये बेचैन? - भाव - 156
  • चींटी का क्या मत ? मीठा चाटना | - चेतना - 156
  • हास , उपहास का इतिहास ? जिस दिन से जीव ने खास को अपनाया कि शिव के नृत्य को समझा | - ज्ञान - 156
  • मन - वर्त्तमान | भूल - भूत | निश्चित - भविष्य | - भक्ति की चेतावनी - 156
  • उदाहरण , उधार ही है | - चेतावनी - 156
  • उदार का काम कब उधार | - चेतावनी - 157
  • प्रेम की पगडण्डी पर न घूम , पागल हो जायेगा | - भक्ति की चेतावनी - 157
  • भरा तो झरा सूखा तो मरा सुना तो जरा हिला सो बहा | - ज्ञान - 157
  • उपदेशक का क्या मत ? रिझाना ( सत्य ? क्यों बक ? ) - चेतना - 157
  • श्याम कहाँ , श्यामा कहाँ ? श्यामा परवाना बन गई , श्याम शम्मा बन गया | प्रेम के दीवाने ऐसे ही जलते जलाते हैं | - भाव - 157
  • मेरे मीत आ , मेरे गीत आ , तू मुझमें समा , तू मुझी में समा , मेरे गीत गा , मेरे मीत आ | - भक्ति - 157
  • आकाश - नहीं तलाश | सब नीचे - सब सींचे । | - ज्ञान की चेतावनी - 157
  • यह विराट शून्य | जहाँ सूर्य चंद्र भी शून्य | सुन , उस सम्राट की सुन | - ज्ञान की चेतावनी - 158
  • बारस को वा रस बरस रहा - जो रस रास में नहीं , हुलास में नही - विलास में नहीं - आस पास में नहीं | - भक्ति - 158
  • रो कर , पद धोकर , पूजा करूँगा तुम्हारी | क्यों स्वीकार है न ? - भाव - 158
  • वाचक का क्या मत ? वचन बनाना , बातों में लुभाना | - चेतना - 158
  • आया प्रीतम लाया प्रीत , गाओ गाओ अनहद गीत | - ज्ञान - 158
  • देख दिल से | मान मन से | - भक्ति की चेतावनी - 158
  • उदार अधीर है , जब तक लाभ नहीं पहुँचाता | - चेतावनी - 158
  • लाभ में भला है जरा सोचो | - चेतावनी - 159
  • खुशामद कैसी ? प्रिय के प्यार ने वेद बनाये , शास्त्र रचे | प्यार के शब्द स्त्रोत के रूप में बहने लगे | - भक्ति की चेतावनी - 159
  • और न कोई , अब तक सोई . - ज्ञान - 159
  • श्रोता का क्या मत ? इधर उधर की सुनना | - चेतना - 159
  • गोपनीय कुंज में गोपिन के कुंज में कृष्ण _ कृष्ण हो रहा | कृष्ण राधा हो रहा | अद्भुत | - भाव - 159
  • जिसको गुरु सजाये | वही भक्तों को भाये | जिसको आप सजाये | वही बाबा को भाये | - भक्ति - 159
  • शून्य में आवाज गूँजती है | आवाज ही आवाज है | जीव , प्रयोग कर योग में समाते | - ज्ञान की चेतावनी - 159
  • भय का भूत | भाव का भगवान | भय भी भाव है | भगवान से भयभीत क्यों ? भाव रखो | - ज्ञान की चेतावनी - 160
  • प्रियतम की बातें प्रेम भरी | प्रेम भरी आनन्द झरी | प्रेम भरी अँसुवन की लरी | कायिक मानसिक चिन्ता जरी | - भक्ति - 160
  • नूपुर की मधुर ध्वनि ने पुर को पुरूष को प्रकृति को ध्वनित किया | बजता है ,हृदय सजता है , मन ही मन भजता है तजता है | एक ध्वनि , अपूर्व आनन्द | - भाव - 160
  • फिर काम और राम ? काम बनाना , राम भुलाना | - चेतना - 160
  • ज्योति कैसे ? तू जो है | - ज्ञान - 160
  • प्राण स्पर्शी ध्वनि धुन में समाई , क्रिया भीतर बाहर | यही लाभ | - भक्ति की चेतावनी - 160
  • जरा - जरा में राज ( रहस्य ) छिपा है , जरा देखो | - चेतावनी - 160
  • खो दे तो , खो दे , क्या ? सुख - दुःख , जरा देखो | - चेतावनी - 161
  • भक्ति को तुच्छ समझना , समझ की तुच्छता है | भक्त तो बह जाता है , फिर स्थिरता ? बुद्धि की बातें , क्या मूल्य रखती है ? - भक्ति की चेतावनी - 161
  • निरख , परख तू , अलख निरंजन | - ज्ञान - 161
  • फिर बने कैसे ? ये बनते हैं पंडित बनाते हैं मूर्ख | स्थूल में बार- बार चक्कर खिलाते हैं | - चेतना - 161
  • धन्य वह घड़ी , जब तेरी नजर पड़ी | क्या था ? क्या हो गया ? तू ही जाने मेरे श्याम | - भाव - 161
  • हद अनहद का भेद मिटाया , ऐसा सदगुरु पाया | - भक्ति - 161
  • जय हरिहर बोल | जहर क्यों उगलता है ? निन्दा स्तुति की तूती बोलती है | यहाँ आवाज है , इस आवाज से बाज आ | - ज्ञान की चेतावनी - 161
  • वाही से ब्याही और वाही में समाई , ऐसी थी मीरा बाई | - भक्ति - 162
  • क्या यों ही वियोग में लुट जाऊँगा ? उड़ते पंछी संदेश लेता जा | क्यों प्राणों की सृष्टि की जब वियोग में ही घुल _ घुल कर तुम में मिलना है ? - भाव - 162
  • इनकी बातें क्यों मोहक ? मोह की कहते हैं मोहन की नहीं | मोहन की कहें तो मोह हन हो जाय | - चेतना - 162
  • घट को घटा , सौदा पटा | - ज्ञान - 162
  • रूप ने पागल बनाया | नाम ने क्या - क्या दिखाया ? - भक्ति की चेतावनी - 162
  • आनन्द के नगीने न गिने | भूल की धूलि में खोये | मति होती तो कीमत समझता | - ज्ञान की चेतावनी - 162
  • लाभ समझ कर ही उल्टा तो भी भला ही है | - चेतावनी - 162
  • मोह का होम हो , तो महोत्सव है | - चेतावनी - 163
  • सम्पर्क ने रुलाया | सम्पर्क ने हँसाया | रोना धोना निरर्थक | - ज्ञान की चेतावनी - 163
  • नत क्यों होता है ? क्या उन्नत के लिये ? - भक्ति की चेतावनी - 163
  • शिव को काम से क्या काम ? काम को भस्म नहीं किया , भस्मी लगाई शरीर पर कि शरीर का भाव भी भस्म हो गया | काम , देव न रहा , काम न रहा , भस्म हो गया , भस्म | - ज्ञान - 163
  • आखिर सभी झूठे ? कहते तो हैं कि आखिर सभी झूठे | - चेतना - 163
  • सृष्टि संयोग से ही बनी और एक दिन संयोग होकर ही रहेगा | व्याकुलता प्रिय का आह्वान है , निराशा नहीं | - भाव - 163
  • राधा - प्रेम में धारा बन गई और मीरा ? मीरा - रामी या राम ही में रम गई | प्रेम अहं को नहीं चाहता | वह मिश्री बन कर पिघल जाता है | नमक जलमय हो जाता है | - भक्ति - 163
  • गुरु कहता है - मेरी आँखों में देख , मेरी आँखों से देख , मुझे देख | बिना आईने के तस्बीर , गुरु ही दिखलाते हैं | - भक्ति - 164
  • कदम चूम कर दम लूँगा | तू चल कदम - कदम , मैं हूँ तेरा हरदम | - भाव - 164
  • फिर सत्य ? सत्य में फिर नहीं , हेर फेर नहीं | - चेतना - 164
  • ब्रह्मा - वेद गाते | वेद बताते - ब्रह्म जताते | - ज्ञान - 164
  • पीपल में देव देखे , भूत देखे | पी , पल ( भर ) के लिये रस कि देव , भूत रस में लीन हो जायँ | - भक्ति की चेतावनी - 164
  • जागती थी परम के लिये | सोती थी शर्म के लिये | - ज्ञान की चेतावनी - 164
  • हाथ ने साथ न दिया | मलता ही रह गया | - चेतावनी - 164
  • घर बनाया था | धरने के लिये या उजाड़ने के लिये ? - चेतावनी - 165
  • बचाते ? क्या चाहते ? बच - सच ? - ज्ञान की चेतावनी - 165
  • चिन्ह प्यार के , पदचिन्ह भगवान के | - भक्ति की चेतावनी - 165
  • सरस्वती - सरस वती - भीतर बाहर सरस वती | - ज्ञान - 165
  • तो क्या यों ही होता आया ? क्या होता आया ? कुछ हो भी , जो होता आया | - चेतना - 165
  • रानी ने वाणी और राजा ने बाजा बजाया | फिर क्या था ऐसा समा बँधा कि बँधा न रहा कोई जिसने सुना और समा गया स्वर में , जहाँ सुर असुर सभी समाये | - भाव - 165
  • संत चाह पीते , राह दिखाते | - भक्ति - 165
  • भक्त और भगवान प्यार | - भक्ति - 166
  • श्वास के झूलन में झुलाऊँ मेरे श्याम | आज यह श्वास की डोरी भी टूटना चाहती है | - भाव - 166
  • ये बातें क्यों काटते हैं ? काटने कुत्ते का , दो रोटियों के लिये | - चेतना - 166
  • कहते कहते कह गये - तू कौन ? अब रह गये मौन | - ज्ञान - 166
  • दर - दर भटका ? क्यों नही पटका ( भावों का बोझ ) ? - चेतावनी - 166
  • शंख फूँका , ढपोरशंख की तरह प्रार्थना की | क्या , आया ? क्या पाया ? - भक्ति की चेतावनी - 166
  • उठी कहाँ से ? लीन - तल्लीन - बज उठी वह वीण | - ज्ञान की चेतावनी - 166
  • नियम बनाकर फँस गई ? चातुरी ? यही बात री | - ज्ञान की चेतावनी - 167
  • नाच , बिना साज | नाच ? बिना साज ? हाँ , नाच बिना साज | ताज झुकेगा , राज मिलेगा | - भक्ति की चेतावनी - 167
  • मत में मस्ती | सत्य की हस्ती | - चेतावनी - 167
  • मेरी मौत कहाँ ? मैं मौज हूँ - मौत क्यों ? शरीर - शरीर है । नाचता है , छटपटाता है | - ज्ञान - 167
  • ये विद्वान हैं | ये कहाँ विद्यमान हैं , जरा पूछ | - चेतना - 167
  • प्रिय की बाँसुरी अधरों पर आई अधर कम्पित | अधर ही नहीं श्रोता भी विमुग्ध | वाह री बाँसुरी | - भाव - 167
  • जड़ का जीवन प्यार | - भक्ति - 167
  • प्राणी का प्राण प्यार | - भक्ति - 168
  • शब्द , ब्रह्म - दो ही बातें | जब तक शब्द , प्रकृति अभिनय , शब्दातीत - फिर क्या कहना ? - ज्ञान - 168
  • जमाते - जमाते जमाना आया | जमाना आया , बहाना आया | - चेतावनी - 168
  • वाणी ही बाँसुरी बनी , हृदय स्पन्दन ने प्रेम घोला | अब स्वर ईश्वरमय | अद्भुत बाँसुरी | - भाव - 168
  • प्रभु के गीत गाते | इनका प्रभु अहंकार है | सोऽहं नही | - चेतना - 168
  • तन मन अब तन्मय हो | - भक्ति की चेतावनी - 168
  • बनाता बनाता बन गया | झूठा बन गया , सच्चा बन गया | - ज्ञान की चेतावनी - 168
  • लंका जली | शंका कब जली ? - ज्ञान की चेतावनी - 169
  • मन्मना भव , उन्मना क्यों ? - भक्ति की चेतावनी - 169
  • कैसे जाना ? भाव देख , भंगी देख , खुद जान जायगा | - चेतना - 169
  • बध स्वीकार , बद्ध न कर | बार बार मिलन के लिये बेचैन होंगे ये प्राण | - भाव - 169
  • कवि हुआ | कभी हुआ | आज तेरा राज -- बज उठे सब साज | - चेतावनी - 169
  • शरीर जला कपूर की तरह | मन फैला सुगंध की तरह | बुद्धि का निर्णय ? निर्णायक के साथ | अहंकार अब बेकार | - ज्ञान - 169
  • सबका चुम्बक प्यार | - भक्ति - 169
  • रो कर क्या खोया क्या पाया ? खोया दुःख पाया सुख | - भक्ति - 170
  • प्रथम युक्त फिर मुक्त | उक्ति और मुक्ति की कथा अनन्त । - ज्ञान - 170
  • तेरी तन्त्री -- तू ही बजा | निज को रिझा | कवि भाये | क्या काम आये ? - चेतावनी - 170
  • आज कण कण अभिव्याप्त था , पूर्ण का सम्पूर्ण रूप हँस रहा था कण में | क्या कहता मन ? आनंदित हो लीन हो गया महान में | - भाव - 170
  • निन्दा करता है | किसकी ? अबोध की | अबोध की निन्दा कैसी ? - चेतना - 170
  • श्याम सलोने , कोने - कोने | - भक्ति की चेतावनी - 170
  • रोटी रुलाती भाव घटाती , निरर्थक सताती | कहीं , न आती न जाती | - ज्ञान की चेतावनी - 170
  • ऐसा नचा ऐसा नचा | फिर न चाह | फिर न चाह | - ज्ञान की चेतावनी - 171
  • भाव की दुनिया बनी है , भाव का भगवान है | भाव में तू आप ही है , भाव और सब भाव है | - भक्ति की चेतावनी - 171
  • इन्हें अबोध कहते हो ? नहीं - बातें तो बोध वालों की सी है किन्तु बातें ही हैं | - चेतना - 171
  • अमर दीप का नाम आत्मा है तो अमर गीत का नाम प्रेम है | - भाव - 171
  • उत्थान - पतन तराजू - समानता के लिए | - चेतावनी - 171
  • भय संसार का , जन्म मरण का | अभय कब ? जब जाना कि न आना है न जाना | - ज्ञान - 171
  • क्रिया क्यों प्रिय ? प्रिय के लिये क्रिया | - भक्ति - 171
  • कर्म में कौन रमा है ? कर्त्ता का प्राण | - भक्ति - 172
  • रस सूखा तो पत्थर बना , रस बहा तो समुद्र | पत्थर से बालू या बालू से पत्थर यह समझ का फेर है | - ज्ञान - 172
  • उत्थान-पतन झूला- आनन्द के लिये क्रम में विक्रम कैसा ? - चेतावनी - 172
  • एक वाणी हृदय की गीता कहलायी | एक वाणी मस्तिष्क की वेद कहलाई | एक वाणी - वाणी नहीं उद्गार थे संत के , प्राणी को मोहित कर गए | - भाव - 172
  • ये बड़े-बड़े ग्रंथ | ये बड़ी-बड़ी ग्रंथी | - चेतना - 172
  • अचरज को रज में मिला | - भक्ति की चेतावनी - 172
  • ( माया ) ऐंठती , इठलाती | क्या पाती ? लजाती | साधती - सधाती | क्या पाती ? समाती | - ज्ञान की चेतावनी - 172
  • मुँह मीठा क्यों नहीं करते ? मधु वर्षा - अब भी तृषा , मुख में मोम - मधु कहाँ ? - ज्ञान की चेतावनी - 173
  • सन्त उपदेश नहीं देता , देश दिखलाता जो अपना है | - भक्ति की चेतावनी - 173
  • ग्रंथ को ग्रन्थी कहना उचित ? उचित अनुचित तुम्हीं जानों | - चेतना - 173
  • मुँह लगी मुरली अधरों को छोड़ती ही नहीं , बावरी हो गई | प्रिय का मधुर भाव पाकर कौन मतवाला न हो जाय ? - भाव - 173
  • आलस्य को आराम न मान | - चेतावनी - 173
  • दूर ( पृथ्वी , आकाश ) मिलता दिखलाई देता है | समीप पहुँचा , फिर भी दूर | यह दूरी कैसी दूर हो ? दृष्टि भ्रम - मन भ्रम , दूरी ही दूरी | विराट का प्रत्येक कण हृदय | देख , स्पर्श कर , सभी स्पष्ट | - ज्ञान - 173
  • प्रिय का प्यार पा निहाल | व्यर्थ ही बेहाल | - भक्ति - 173
  • उदय , अस्त में कितने ही अस्त हुए किन्तु तुम्हारे प्रेमोदय में अस्त कहाँ ? न अस्त न अस्त व्यस्त | - भक्ति - 174
  • अंधेरे में मिश्री घोली | ( आत्मा ) अब कहा मैं तेरी होली | - ज्ञान - 174
  • अणु - अणु में अनुभूति | परमाणु में प्रेम प्रकाश | फिर क्यों उदास | - चेतावनी - 174
  • मत नहीं जानता , तुम्हें जानता हूँ अनेक युगों के पश्चात् तुम्हारे दर्शन तो हुए | - भाव - 174
  • आज तक गीत गाता था , अब मन को रिझाऊँगा , गीत न गाऊँगा | - चेतना - 174
  • संत ने क्या दिया ? संत ने क्या नहीं दिया ? पहचान चाहिये | - भक्ति की चेतावनी - 174
  • अरे नादान , अरे नादान | यह दाना है - यह दाना है | ( तू नादान और यह दाना ) - ज्ञान की चेतावनी - 174
  • दल पर दल | नहीं दल दल | - ज्ञान की चेतावनी - 175
  • विचारों का भी घेरा ? घेरा है तो दम घुटेगा | - भक्ति की चेतावनी - 175
  • पूजा पहाड़ , माला निराधार , और जंजाल , मन बेहाल , अब ? मन को रिझाऊँगा , गीत नहीं गाऊँगा | - चेतना - 175
  • हे शून्य महल के प्रियतम ! बरसा प्रेम रस कि भीतर बाहर की जलन शांत हो | - भाव - 175
  • मति बिगड़ी | गति बिगड़ी | - चेतावनी - 175
  • हरिद्वार , गुरुद्वारा , ग्रन्थसाहब | द्वार द्वार हरिद्वार | मुखद्वार , गुरुद्वारा | साहब का ग्रंथ , ग्रन्थ साहब | फिर भी शब्दों के फेर में पड़ा | - ज्ञान - 175
  • तेरी मर्जी - मैं राजी | - भक्ति - 175
  • तुम्हारे नाम में नशा है | यह मादक , मोदक , मोहक है | - भक्ति - 176
  • समझाता था , मन दौड़ पड़ता था | मन माना , अब कहीं आना न जाना | - ज्ञान - 176
  • परमाणु में ( ज्ञान की ) आग लगानेवाली सदगुण की वाणी | - चेतावनी - 176
  • धूम्र और कुहासा प्रकाश पाकर बदल गया प्रकाश में | महान की शक्ति महान | क्षुद्र पर दया रखता है वह महान है | - भाव - 176
  • पृथ्वी तपती है तो तर भी होती है | - चेतना - 176
  • शान्त कब बैठा ? जब कल्पना न रही | नकल तो विकल बनाती | - भक्ति की चेतावनी - 176
  • कौन बुलाता ? दिल का नाता | कौन भुलाता ? दिल को भाता | - ज्ञान की चेतावनी - 176
  • किस्मत को , किश्त मात दे | काम से क्यों विश्राम ? भाग्य की भावना भागी , जब तू जागा | - ज्ञान की चेतावनी - 177
  • किसका आधार ? जरा सोच तो सही किसका आधार | खुद का आधार खुद , जिसे लोग कहते खुदा | - भक्ति की चेतावनी - 177
  • पेड़ कटता है तो बढ़ता भी है | - चेतना - 177
  • महा हानि है कि महान को न जाना , न पूछा कि कौन महान है ? प्रथम तू नही , प्रथम तू | - भाव - 177
  • दिल मिला | पंचांग क्या मिलाता है ? - चेतावनी - 177
  • झीनी चदरिया ज्यों की त्यों धर दीनी | क्यों ? मैली हो जाती व्यवहार से | दी उसी ने ली ( मैं ने ली तू ने दी ) मैं में लीन होती तो मैली होती | - ज्ञान - 177
  • दूसरी दुनिया बसा दे | प्यार में मुझको सुला दे | लुभा ले | - भक्ति - 177
  • करूँ ? ना | तुम्हारी करुणा | - भक्ति - 178
  • रूप का ध्यान - साकार | गुण का ध्यान - निराकार | बातें ? बेकार | - ज्ञान - 178
  • हृदय पर दया कर खिल उठे | - चेतावनी - 178
  • संतोष और शांति दो प्रबल अस्त्र है | प्रयोग अचूक , जप तप तो साधन मात्र है | - भाव - 178
  • कवि की लेखनी और मिलन का वर्णन ? असम्भव है । - चेतना - 178
  • हड़बड़ानेवाला - हरी बड़ा हर बड़ा कब कहता है | - भक्ति की चेतावनी - 178
  • कर से कर | मन से मनन | तन से न तन | - ज्ञान की चेतावनी - 178
  • धन की धुन | तब सिर धुन | ध्वनि की धुन , तब धन धन | - ज्ञान की चेतावनी - 179
  • कौन और क्यों ? कौन और क्यों में ही सब राज है ? राज चाहे तो राज पहिचान | - भक्ति की चेतावनी - 179
  • अलख लखा जाता है , अलख आँखों से | - चेतना - 179
  • आनंद स्पर्श के भाव से जीव का जड़त्व भाव कहाँ रहा ? रोम रोम पुलकित हो उठा | - भाव - 179
  • मैं ब्रह्म हूँ तो भ्रम भी हूँ । भ्रम हूँ बुद्धि के लिए और ब्रह्म हूँ आत्मा के लिए | - ज्ञान - 179
  • प्यार भी यदि आता तो पागल हो जाता | - भक्ति - 179
  • आकाश की तरह भावों को आच्छादित कर | वायुवत् प्राणों को स्पर्श कर नव प्राण दे | अग्नि का ओज तेरी वाणी करे | जलवत् बह निकले प्रेम करुणा | पृथ्वी धन्य हो तेरी लीला देख | - चेतावनी - 179
  • वाह की हवा में बहते अनेक | राह पर कर निगाह | - चेतावनी - 180
  • मेरा भी हक है , कह न ? - भक्ति - 180
  • अज्ञेय कौन ? मैं ? सब मिथ्या | न मैं अज्ञेय और न मैं अज्ञात | - ज्ञान - 180
  • मेरे छटपटाते हुए पँखो को देख , मेरी गर्दन को देख , दम घुट रहा है , प्राण छूट रहे हैं | क्या अब भी दर्शन न देगा ? तो क्या तेरी याद , मेरी फरियाद वृथा होगी ? - भाव - 180
  • खुद ही गर्म होती है और खुद ही बरसाती है कैसी पगली है | ( प्रकृति ) । - चेतना - 180
  • मत मति - अब ? कब गति ? - भक्ति की चेतावनी - 180
  • वस्त्र कोई अस्त्र नहीं | शास्त्र कोई शस्त्र नहीं | और है कुछ और | - ज्ञान की चेतावनी - 180
  • वह मत क्या जो हिम्मत न दे | वह कर्म क्या जो कम न करे ( अशांति - अज्ञान ) - ज्ञान की चेतावनी - 181
  • सर की पगड़ी पैरों पर रगड़ी , अब भी अभिमान ? - भक्ति की चेतावनी - 181
  • पगली नहीं , पागल बनाती है उसे जो इसे देखने लगता है | - चेतना - 181
  • आनन्द मय विश्व की निन्दा करूँ ,क्यों ? सुख , दुःख तन मन के खेल , चिन्तित क्यों? - भाव - 181
  • आनन्द के लिए पंचमकार की पूजा की , राधा कृष्ण की आराधना की , सन्यास लिया , वैरागी बने , किन्तु वाह रे आनन्द | वासना , कामना का पुजारी बना कर छोड़ा | आनन्द तो अपना रूप है | पहचाने तो त्याग भोग समान हो जाय | - ज्ञान - 181
  • हक नहीं स्वत्व है | स्व राज्य है | स्व राजा , स्व दास , स्वदेश | नहीं वेश , न क्लेश , सब शेष | - भक्ति - 181
  • लहर -- मेहर पर | - चेतावनी - 181
  • जो तुझसे छिपा , वाही रहस्य बना | वह तेरे लिये -- तू उसके लिये | - चेतावनी - 182
  • क्यों जलते है ? जल लेते तो न जलते | - भक्ति - 182
  • प्रति मुहूर्त प्रकृति बदलती , पट परिवर्तन करती , मैं शांत । प्रकृति बदले , पुरूष तो पुरूष है , बदलना नहीं जानता | - ज्ञान - 182
  • तुमने मुझे दिल दिया , दिमाग दिया , प्रेम दिया , भाव दिया , दिया दिया | इतना दिया की भूल गया , क्या क्या दिया | - भाव - 182
  • पुरुषार्थ और प्रारब्ध बीज और वृक्ष हैं | पहले कौन हुआ ? प्रश्न ही क्यों ? दोनों ही ओत प्रोत हैं | - चेतना - 182
  • अब न झुकूँ - न रुकूँ | - भक्ति की चेतावनी - 182
  • सुन यदि सुनना चाहे | ऐसा सुन कि संसार स्वतः शून्यवत् प्रतीत हो | कहना न पड़े - जगन्मिथ्या | - ज्ञान की चेतावनी - 182
  • वही शब्द जो प्रारम्भ में था - वही शब्द जो मध्य में है | वही , शब्द जो कल्पान्त में सुन पड़ेगा | अभी क्यों नहीं सुन लेता ? - ज्ञान की चेतावनी - 183
  • दश का रक्षक एक , दश का भक्षक एक ( मन ) | - भक्ति की चेतावनी - 183
  • सफेद पर रंग ही रंग , क्यों ? रंगों को दिल में रखता है , दिखलाता नहीं | - चेतना - 183
  • फूला न समाया जब तल्लीन अवस्था में कुछ पाया | सब कुछ तो सर्वव्यापी का है | तू भी कुछ दे कि तुझे शांति मिले | - भाव - 183
  • पता नहीं कौन पत्नी है , आत्मा कि - परमात्मा | मत है , अपना अपना मत है | पत्नी , पति में "प " है आदि में | आदि में जहाँ प्रेम था तो अब अन्त में भी बना रहे - तभी बनी | नहीं तो कैसी बनी ? पति पत्नी का झगड़ा तो दुनिया हँसेगी | - ज्ञान - 183
  • सुस्ती कब मस्ती बने ? जब तू दिखलाई दे | - भक्ति - 183
  • द्रव्य चुना - उपद्रव बढा़ | चिन्ता आई - जलती चिन्ता लाई | - चेतावनी - 183
  • गर्व खर्व , जब तू सर्वत्र | - भक्ति - 184
  • सोता _ झर - झर बहता | जगती - जगती | तू जगता न सोता - क्या करता ? - चेतावनी - 184
  • आ मा तम दूर हो - आत्मा अमर में लीन हो | आ मा आत्मा - आत्म स्वरुप | - ज्ञान - 184
  • प्रेम को किसी ने देखा है , मूर्तिमान ? प्रेम मूर्ति बन जाता है उपासक के लिये , आशिक के लिये | - भाव - 184
  • दास , आस पास और सब उदास | - चेतना - 184
  • विधि , निषेध का चक्कर खाये , प्यार की विधि तब कौन बताये ? - भक्ति की चेतावनी - 184
  • सुनाते कान में | ठीक है कान ? पवित्र है कान ? तभी तो होगा कल्याण | नहीं तो कान पकड़ा | - ज्ञान की चेतावनी - 184
  • तुम से कहना है - अहंकार से नहीं | जरा मेरी भी सुनो | अहंकार को न जगाओ | सुनना बेकार होगा | - ज्ञान की चेतावनी - 185
  • उदास है या उदासीन ? - चेतना - 185
  • यदि उस ध्वनी को सुन पाता जिसे सुन राधा प्रेम विभोर हो गई , कृष्ण बेसुध तो आज निर्द्वंद विचरण करता | प्रेम लीला गाता और गाते गाते स्वयं में लीन हो जाता | - भाव - 185
  • मौन मन मुनी - ध्वनी रहित धुनी | - भक्ति की चेतावनी - 185
  • मां रंग में तू | मां रग रग में तू , अब मार्ग पूछूँ पुस्तकों से ? अनादर है , अज्ञान है , मन का भ्रम , पूर्ण खेल है | - ज्ञान - 185
  • शब्द यज्ञ में कल्याणमय शब्दों की आहुति दो | - चेतावनी - 185
  • प्यार का दीपक जला | न दीपक जला न प्यार | - भक्ति - 185
  • गुण क्या देखूँ , तुम तो गुणातीत हो | - भक्ति - 186
  • हित और हेतु निरर्थक | - चेतावनी - 186
  • संयोग से योग हुआ प्रकृति पुरूष का | अब क्या कहना , सृष्टि अपूर्व थी | - ज्ञान - 186
  • कारण का रण क्यों ? मरण का रण क्यों ? शरण का रण कहाँ ? वरण का रण कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 186
  • प्रणव प्रणय में परिवर्तित हुआ , प्राणी उन्मत्त हो गए | प्राणों में प्रणय की झंकार , अब बेडा़ पार | - भाव - 186
  • सड़ी का सदुपयोग ? तत्व में मिलने दे | - चेतना - 186
  • जगा सको तो उन वृत्तियों को जगाओ | जो सोती हुई जागने का नाम नहीं लेतीं | दैत्य जागे , उपद्रव आगे | देव जागे , शांति आगे | - ज्ञान की चेतावनी - 186
  • बिजली भी जली | न जली - न जली वह कौन ? ( आत्मा ) - ज्ञान की चेतावनी - 187
  • वियोग ने इसे सड़ाया | संयोग से रूप ही बदल जाय | - चेतना - 187
  • माँगा न था , दिया | किसने ? जिसके पास था , जो पास था प्रेम , विश्वास | - भाव - 187
  • सन्त विद्वान ? यदि , नहीं अच्छा है | भाषा अलंकार से सत्य सजाया तो व्यर्थ ही आया | - भक्ति की चेतावनी - 187
  • नभ न अब , मही मैं ही | सूक्ष्म स्थूल तो खेल मात्र है | - ज्ञान - 187
  • आवेश -- कब शेष ? कर प्रवेश -- हो शेष | - चेतावनी - 187
  • तुम्हारे प्यार में ' मैं ' जला | - भक्ति - 187
  • यन्त्रणा में निमन्त्रण दूँ ? कष्ट तो दूर होगा - फिर प्यार कब ? - भक्ति - 188
  • गुण क्या ? अवगुण -- निर्गुण या सगुण ? - चेतावनी - 188
  • हीन नहीं मैं वह वीण हूँ , जिसे सुन मन सर्प भी क्षणिक शांत हो जाता है | - ज्ञान - 188
  • जीवन दीपक जलता रहा प्रतीक्षा में | किसकी ? अपने की , अपनी | इसे जलना कहा जाये या प्रकाश फैलाना ? - भाव - 188
  • मन को न मार , मन रो पड़ेगा | मनाना होगा , रिझाना होगा , तुम्हारा ही हो जायगा | - भक्ति की चेतावनी - 188
  • सड़ी बातें ? प्रफुल्लता कहाँ ? - चेतना - 188
  • क्यों प्रकाश - क्यों विकास ? क्यों विनाश ? क्यों विहास ? था वही | है वही | है सही - है यही | - ज्ञान की चेतावनी - 188
  • ब्रह्म , भ्रम का भ्रम दूर कर | फिर ? फिर कुछ नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 189
  • काया का भाव कायर | प्रेम का भाव शायर बन बैठा | - भक्ति की चेतावनी - 189
  • प्रयोग कर नहीं तो सड़ जायेगा शरीर | - चेतना - 189
  • मेरे प्रियतम ! आज मैं अकेला हूँ , बात कर मेरा दिल घबडा रहा है | दुनिया की कथा सुनते सुनते मैं ऊब गया | - भाव - 189
  • अनुभूति कैसी ? मन की एक झंकार जो बार - बार बजी और नवीन सृष्टि सजी ? - ज्ञान - 189
  • विनायक को माना , किंतु बिना एक के क्या ? - चेतावनी - 189
  • सत्कार करूँ - सत कार्य करूँ | यही सत्कार | - भक्ति - 189
  • आगमन - आ , गमन तो है ही | - भक्ति - 190
  • पाकर , पाखण्ड क्यों ? पा कर खण्ड- खण्ड कर पाखण्ड का | - चेतावनी - 190
  • झंकार में संस्कार और संसार डूबे . तल्लीन था - धर्म और अधर्म कैसा . - ज्ञान - 190
  • तू अपने में मुझको खोज , अकेला रहता हुआ भी अकेला न रहेगा | दुनिया तेरी सूक्ष्म हो चली है | किसी की कृपा का फल है | - भाव - 190
  • सड़ और झड़ में कौन अच्छा ? - चेतना - 190
  • आरत - आ रत | अर्थ यही है | कैसी जिज्ञासा ? जब अति पासा | देख , जान , अब ज्ञान यही है | - भक्ति की चेतावनी - 190
  • कहता ही है , देखा नहीं - सुख , दुःख देखा नहीं | कर्म देखा | - ज्ञान की चेतावनी - 190
  • अहंकार ने ही रुलाया , जलाया | - ज्ञान की चेतावनी - 191
  • झड़ा वही - सड़ा गिरा | - चेतना - 191
  • प्रभो ! बसंत आया , प्रकृति ने स्वागत किया नये पत्तों से | मेरे पास तो आज भी जीर्ण शीर्ण विचार है , कैसे तुम्हारा स्वागत करूँ ? अरे ! स्व का आगमन पहचान सदा बहार रहेगी तेरे चमन में , मन में | - भाव - 191
  • उठ न सका तो कैसा भाव | जग न सका तो कैसा चाव ? - भक्ति की चेतावनी - 191
  • नरक से घबराता नहीं ? पण्डित घबड़ाये , जिनकी सृष्टि है | स्वर्ग की इच्छा नहीं करता ? यह इच्छा ही तो तंग कर रही है सब को | स्वर्ग नहीं , स्व वर्ग ही मेरा स्वर्ग है - जहाँ वर्ग नहीं , जाति नहीं | - ज्ञान - 191
  • घमण्ड में बोलना , अण्ड -बण्ड समझ | मण्डप में मण्डित कर वाणी को | घमण्ड शोभनीय नहीं | - चेतावनी - 191
  • आज स्व गत ही स्वागत | - भक्ति - 191
  • मुझे गरीब नहीं , धनी बना | तेरे धन का धनी बना | निर्धनता दूर हो - तन की , मन की , धन की , जन की | - भक्ति - 192
  • क्यों चमत्कार को नमस्कार ? हैं जब विकार तो चमत्कार | कर अविकारी को नमस्कार | - चेतावनी - 192
  • आमन्त्रित हूँ अनाहुत नहीं | भावना खींच लाई भव मे | कहती थी स्वर्ग के देवता पृथ्वी पर चल , प्रेम मिलेगा | प्रेम की पिपासा ने मृत्यु लोक दिखलाया | प्रेम न मिला तो मैं चला | खेल बहुत देखे लोक में , दिव्य लोक में | - ज्ञान - 192
  • मिल न सका तो कैसा नाम | हँस न सका तो कैसा धाम | - भक्ति की चेतावनी - 192
  • मेरे प्रियतम ! आँसू विफल मनोरथ हो रहे है | क्यों संदेश भेजा संत के द्वारा , जब योंही विकलता के हाथ सौंपना था ? विकलता प्रेम लता को पल्लवित करेगी प्रेमाश्रुओं से सौंपा नही किसी को , तू तो मेरा ही है | - भाव - 192
  • गिरा सड़ा ? तो उपयोग ? क्षण भी बर्बाद नहीं , फिर न गिरा न सड़ा | - चेतना - 192
  • कम्पित क्यों ? कर्म तो देखने ही पड़ते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 192
  • बहलाता रहा - किन्तु बहाया कब ? - ज्ञान की चेतावनी - 193
  • स्वर्ग - नरक की कथा पुरानी | छोड़ आज , कर तू मनमानी | - भक्ति की चेतावनी - 193
  • विचार शरीर पर सवार | - चेतना - 193
  • तेरी मेरी जोड़ी सृष्टि के पूर्व थी और पश्चात् भी रहेगी | दुनिया के लोग भक्त और भगवान के नाम से याद करते रहेंगे | - भाव - 193
  • शून्य मे स्थित सूर्य को पृथ्वी पर कौन लाया ? निर्मल जलवत् अंतःकरण | - ज्ञान - 193
  • पड़ी परिछाई | भूल बैठा स्वरुप | - चेतावनी - 193
  • गीता गा कर भी भूल न सके गीत को तो क्या जाने कि भूलना ही मिलना है | - भक्ति - 193
  • रुलाता क्यों है ? मिलता क्यों नहीं ? मैं थका चला जा रहा हूँ | - भक्ति - 194
  • विचार विकार बना | विकार फैला - -संसार फैला | अब विकार का कर विचार | विचार पर आये | - चेतावनी - 194
  • ज्ञानेन्द्रियों का प्रभाव जब कर्मेन्द्रियों पर पड़ा तो कर्म का रूप बदल गया | आरोह अवरोह का कार्य पूर्ण हुआ | - ज्ञान - 194
  • मैं जलता हूँ तेरे नाम पर |मैं चलता हूँ तेरे नाम पर | दुनिया जलती है और चलती है तेरे प्यारों के नाम पर | - भाव - 194
  • सवार निर्बल तो शरीर ही सवार | - चेतना - 194
  • बाँह डाले तो वाह निकले | दूर तो अज्ञान के नशे में चूर | - भक्ति की चेतावनी - 194
  • अज्ञात ? क्यों साथ | - ज्ञान की चेतावनी - 194
  • प्यार अज्ञात का | जो यार से मिलाता - बहार लाता | - ज्ञान की चेतावनी - 195
  • सूक्ष्म और स्थूल के अभाव में खेल कहाँ ? - चेतना - 195
  • शब्द मुझे बाँध न सके | प्रेम ने मुझे पाश में बाँध लिया | बिक गया किससे कहूँ ? - भाव - 195
  • सब मिले तुम्हें सताने को - सत्य मिला तुम्हें रिझाने को | - भक्ति की चेतावनी - 195
  • अनिर्वचनीय का वर्णन कौन कर सका ? अपूर्व अनुभूति ने झंकार उत्पन्न की , शब्दमय ब्रह्म मुखरित हो उठा | - ज्ञान - 195
  • दुर्बलता की लता न लगा | बल की बेल का खेल देख | बल ही बल | दू:सु को न पकड़ | - चेतावनी - 195
  • वासना - कामना तुम जानो , किसी ने प्रेम से पुकारा तो भूल गया अपने को खिंचा चला आया | सुख , दुख मेरे साथी बने | - भक्ति - 195
  • कहाँ स्नान करूँ कि सागर में गंगावत् मिलन हो ? - भक्ति - 196
  • सत्य के तीन पद | संत - साधक - स्वयं | - ज्ञान - 196
  • अ से ज्ञ तक पढा़ | अज्ञ ही बना | अ उ म अंकित होता हृदय पर | ज्ञ का ज्ञान होता | अज्ञ न रहता | - चेतावनी - 196
  • सत्य भी एक नहीं ? तो फिर एकता कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 196
  • मैं मांगता हूँ अपने लिए , अपनों के लिए |मैं भी चाहता हूँ अपने लिए , अपनों के लिए | क्या ? प्रेम | - भाव - 196
  • स्थूल में गति कैसे आई ? परिचालक ने पता न दिया , गति दी | - चेतना - 196
  • दुःखी दिखलाई दिये | दुःख छोड़ना नहीं चाहते | भूत दुःख , भविष्य दुःख , कहाँ सुख ? - ज्ञान की चेतावनी - 196
  • धूप आई ( प्रकाश ) - धूप जली ( आनन्द ) | - ज्ञान की चेतावनी - 197
  • गति स्वतः भी देखी जाती है । तो यह दृष्टा का सम्पर्क है । - चेतना - 197
  • अब कैसे रहूँ , कैसे सहूँ , कैसे कहूँ जिसका आधार था आज वही छिप कर बैठ गया कण कण में , नीले आकाश में | न इतना सूक्ष्म बन पाता हूँ और न इतना महान | न सही , उसका तो है इतना ही यथेष्ट है | - भाव - 197
  • अज्ञ , कृतज्ञ कब हुआ | - भक्ति की चेतावनी - 197
  • प्रमाद , कर बाद | सुन नाद , कर याद | - चेतावनी - 197
  • ॐ तुम्हारा संकेत है | अक्षर में कहाँ गति कि तुम अक्षर तक पहुँचे | - ज्ञान - 197
  • मिलन मन का जहाँ मैल नहीं ? - भक्ति - 197
  • तेरा मिलन तन , मन का | तन नत हुआ , मन नम हुआ , अहं लीन | - भक्ति - 198
  • संकेत में भी भ्रम मान बैठा | आगे आग पीछे विचारों का नाग | - ज्ञान - 198
  • वृत्ति शान्त नहीं क्लान्त | नहीं भ्रान्त , न वृत्तान्त | - चेतावनी - 198
  • सजाने आया - फिर सजा क्यों न पाया ? सजा पा रहा है , मजा पा रहा है | - भक्ति की चेतावनी - 198
  • तेरा मिलन न शरीर से हो सकता है और न मन बुद्धि से | फिर कैसे मिलूँ ? अपने को भूल जा फिर तू मेरा ही है , मेरा ही है , मेरा ही है | - भाव - 198
  • चेतन प्रत्येक जड़ पदार्थ में गति पैदा क्यों नहीं कर देता ? जो जड़ चेतन के अति समीप आया गति ही गति है | - चेतना - 198
  • भोग की इच्छा की , भोक्ता बना | कर्त्ता बना , भोक्ता बना | भोग भागे | भाग्य जागे | भाग्य जागे - भाव जागे | भाव जागे - भगवान आगे | - ज्ञान की चेतावनी - 198
  • पथ बना | पथिक बना | पाथेय बना | क्या - क्या न बना ? - ज्ञान की चेतावनी - 199
  • कल्पना की उड़ान में बुद्धि कहाँ ? बुद्धि पीछे चलती है , प्रथम कल्पना है | - चेतना - 199
  • मिलन सह न सकी दुनिया | ऐसा प्रकाश फैला की अँधेरा सा प्रतीत हुआ संसार के लोगों को | - भाव - 199
  • मिट्टी को पकड़नेवाला भी मजबूत , फिर सत्य के रूप को कौन हिला सकता है ? विचारों की हवा से व्यर्थ ही भयभीत | - भक्ति की चेतावनी - 199
  • मिला कान्त | हुआ शान्त | - चेतावनी - 199
  • आत्मा , शरीर को चेतन कर , अमर है | प्रेम मन को बेहाल कर अमर है | - ज्ञान - 199
  • कहूँ या सहूँ या बहूँ या यों ही रहूँ ? - भक्ति - 199
  • हे कुम्भकार ! कुम्भ फोड़ | मिट्टी में मिट्टी और प्रकाश में प्रकाश मिले | - भक्ति - 201
  • एक तेरा रूप | भीतर देख , बाहर देख | कहाँ विधान , कहाँ लेख | - चेतावनी - 201
  • आज्ञा दाता अनेक | त्राता कौन ? स्वयं , यदि समझे | - ज्ञान - 201
  • प्यार को प्यार में खोज | - भक्ति की चेतावनी - 201
  • भामिनी - कामिनी - सौदामिनी की तरह चमकी | आँखें चकाचौंध | पथ भुला | - ज्ञान की चेतावनी - 201
  • दुःखी दुनिया को कुछ ऐसा दिखा कि दुःख भूल जाये | लोक दिया , आलोक दिया किन्तु फिर भी सुख स्वरुप को न देखे न पहचाने तो क्या किया जाये | - भाव - 201
  • गा , गाकर रिझाना चाहता है , पूछूँ किसको ? स्वयं प्रसन्न , फिर गाना रोना कैसा ? - चेतना - 201
  • आनंद की लहर | जय हरिहर | - चेतना - 210
  • मेरा अपमान ? तू माने तो मान भी है , अपमान भी है | नहीं तो कैसा मानपमान ? - भक्ति की चेतावनी - 210
  • एक था दो बना , फिर एक ? एक ही आदि अन्त है | - ज्ञान - 210
  • शिव यह तुम्हारी शक्ति है कि शक्ति की शक्ति है कि तुम शिव हो | माँ की अद्भुत शक्ति दिगंबर रूप में | तुम्हारी महिमा धन्य है , तुम ने आवरण ही रहने दिया | - भाव - 210
  • त्यागी ने ऐसा त्यागा कि पूर्व पश्चात् का झगड़ा न रहा | - ज्ञान की चेतावनी - 210
  • भूल हुई शूल | - चेतावनी - 210
  • तुझे लोग भूत ( बीता काल , लिखे ग्रन्थ ) में खोजते और कहते हैं तू कहाँ - तू कहाँ ? वर्त्तमान में देखते तो जान पाते | - भक्ति - 210
  • देखा ? अब दे या ले | - भक्ति - 211
  • अवस्था बढ़ी -- सुधरी कब ? व्यवस्था किसी और की | - चेतावनी - 211
  • अभिमान छोड़ा कि प्रकृति के अभिमान का विषय बना | रास्ता और भी है | - ज्ञान की चेतावनी - 211
  • जो साथ ही रहे दिल से दिमाग से वही साथी | यों तो आंशिक भाव वाले आये और गये | मीरा का भी एक साथी था जो जन्म और मरण का साथी था | - भाव - 211
  • सभी मिथ्या , सभी सत्य | मिथ्या कहकर त्याग करने की चेष्टा करता है और सत्य तो भगवान है ही | - ज्ञान - 211
  • दिल में व्याकुलता क्यों ? शान्त नहीं हो पाया | - भक्ति की चेतावनी - 211
  • आँखे कहाँ ? साख कहाँ ? लक्ष्य चूके | - चेतना - 211
  • ये मारने वाले - राम में क्यों नहीं रमते ? काम बने । मारने वाला भी कभी फलता , सफलता पाता है ? - चेतना - 212
  • प्रिय के वियोग की तड़पन कब निरर्थक | - भक्ति की चेतावनी - 212
  • गुण गाऊँ या दिल बहलाऊँ , एक ही बात है | गुण में समाऊँ या गुणातीत हो जाऊँ ? कहना नहीं बनता - होना है जहाँ शब्द नहीं | - ज्ञान - 212
  • जो तुम्हारे प्राणों को स्पर्श करता और तुम्हें अनुभव भी नहीं होने देता वह कौन है ? अज्ञात प्रेमी | - भाव - 212
  • दिल में लगी आज आग | अब तो जाग | - ज्ञान की चेतावनी - 212
  • हाथ पर हाथ धरे बैठा है | हाथ पर हाथ मार | - चेतावनी - 212
  • पिया तुमने पिया , मुझे भी पिला | पी , कहाँ ? पिया कहाँ ? ( हिया हिला , पिया मिला ) - भक्ति - 212
  • मैं कहने गया , अंहकार आया | तू तू मैं मैं होने लगी | - भक्ति - 213
  • मौन का रहस्य आज भी मौन | मौन कौन ? मुख या मन | - चेतावनी - 213
  • यह वह हवन कुण्ड है जिसकी आग प्रज्वलित ही रहेगी यदि सन्तोष का जल सींचन न किया | - ज्ञान की चेतावनी - 213
  • तुम मुझे प्रकाश में ला रहे हो या दूर पहुँचा रहे हो ? मैं ज्ञान विज्ञान कुछ नहीं जानता | - भाव - 213
  • प्रकाश और छाया की जगत में क्या चमत्कार देखा ? यों कुछ नहीं , यों सब कुछ | - ज्ञान - 213
  • आज की माला कल बन्धन मुक्त हो जाती है | माला भंग | माला - माल लाती है | - भक्ति की चेतावनी - 213
  • मारने वाले रमते राम को जानते तो भूलकर मार का नाम न लेते | - चेतना - 213
  • सोने जागने में , ज्ञान अज्ञान देखा गया | - चेतना - 214
  • गाने में भी रोना ? - भक्ति की चेतावनी - 214
  • दुनिया की ताल पर नाचने वाला बेहाल | किन्तु स्रष्टा का आदेश भी ताल ही था | नाचने वाला जगत को नचा रहा था | न चाह , न नाच , न वाह वाह | - ज्ञान - 214
  • किसी ने कहा श्याम कह | किसी ने कहा राम | ख़ुद ने कहा - खुदा बन , सब चले आयेंगे तेरे द्वार पर | - भाव - 214
  • स्तर तर | जय हरि हर | - ज्ञान की चेतावनी - 214
  • सज आओ , मुरझाओ क्यों ? कब तक व्याकुल ? आया अन्त अब तो शान्त | - चेतावनी - 214
  • तेरे करुण गीत ,हृदय स्पर्श करते | - भक्ति - 214
  • वर्ष पर वर्ष बीता | बरषा मेघ , बरसी प्रकृति | प्रकृति वर और तुम वधु ? तरसते रहो | - भक्ति - 215
  • क्या गाता ? रोना मिटा - भाव समेट , भाषा लपेट | देख काल का चपेट | - चेतावनी - 215
  • विकार का प्रसार | ' स्व ' का कब विचार | - ज्ञान की चेतावनी - 215
  • कहता हूँ तो बुरा लगता है दुनिया को | न कहूँ तो दिल को बुरा लगता है | अब तू ही बता क्या करूँ ? - भाव - 215
  • वस्त्र तुझे कब सजा पाये ? तू तो स्वयं ही प्रकाशमय है | ये वस्तुएँ कब सत्यं शिवं सुन्दरम् को सजा पाई | - ज्ञान - 215
  • रोना ही जानता है , गाना क्या जाने ? - भक्ति की चेतावनी - 215
  • पल प्रलय - कब अभय ? - चेतना - 215
  • मिथ्या की शिक्षा दी गई जगत के लिये | शिक्षा का प्रतिकूल प्रभाव क्यों ? जगत मिथ्या - आज भी कल्पना का विषय बना | मिथ्या , स्वप्नवत् कहने पर भी विश्वास कहाँ ? - चेतना - 216
  • चमक अन्धकार में थी . चमक में अन्धकार का पता कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 216
  • नस नस में वह रस है जिसे काल कवलित न कर सका | अमर का पुत्र अमर , वस्त्र फटा नवीन आया | - ज्ञान - 216
  • छिपा न सका दिल का राज ( रहस्य ) | चाहता था किसी से न कहूँ कि मैं भी किसी का हूँ किन्तु उसके प्यार ने राज को ऐसा प्रकाशित किया कि छिपाये न छिपा | - भाव - 216
  • क्षुब्ध क्यों , शुद्ध ? शुद्ध शान्त | क्षुब्ध भ्रान्त | - ज्ञान की चेतावनी - 216
  • बुद्धि खो दी , समझने में - समझा कब ? - चेतावनी - 216
  • आनन्द कहते ही हो | आ नन्द दुलारे | स्वप्न हमारे | - भक्ति - 216
  • तुम राम भी कृष्ण भी - राम कृष्ण भी | विवेक और आनन्द तो तुम्हारे शिष्य हैं | - भक्ति - 217
  • प्रकृति में तो सभी रमते हैं | कुछ और भी है | - चेतावनी - 217
  • क्यों ललचावे , फिर शरमावे ? नाचे गावे , ताल बजावे , फिर भी शान्ति नहीं क्यों पावे ? - ज्ञान की चेतावनी - 217
  • भूलता तो हूँ मैं किन्तु तू मुझे भुला नहीं पाता | शायद यही बेचैनी का कारण है | - भाव - 217
  • भोग के तार इतने तीव्र क्यों ? योग के लिये | शारीरिक योग यंत्रणा | आत्मिक योग आनन्द | - ज्ञान - 217
  • प्राणों में गति नहीं तो शरीर का नाश | भावो में प्रेम नहीं , फिर निरर्थक आश | - भक्ति की चेतावनी - 217
  • मिथ्या क्या है ? जग या जगन्नाथ ? जग कहाँ माना , नाथ ही नाथ हिला रहा है | जगत की जय हो रही है | नाथ तो न था न है | ऐसा ही कहा सुना जाता है | - चेतना - 217
  • बात की क्या औकात ? यदि धरातल सत्य न हो | - चेतना - 218
  • जीर्ण शीर्ण बदलेगा , पहले ही काम बना | - भक्ति की चेतावनी - 218
  • किसके लिये बेचैनी ? खुद को भूला हुआ हूँ , क्या बताऊँ ? - ज्ञान - 218
  • मुझे किनके हाथों सौंप दिया बेरहम जो मेरा खून पीकर भी शांत नहीं हो पाते | वाणी सुनाते सुनाते मैं थक गया किन्तु ये न थके खून पीने से | - भाव - 218
  • क्या ? समझा ? जो समझाते हो | - ज्ञान की चेतावनी - 218
  • जहाँ उबासी , वहाँ हवा सी | - चेतावनी - 218
  • प्रतिज्ञा या प्रति आज्ञा | प्रतिज्ञा तुम्हारी प्रति आज्ञा हमारी | - भक्ति - 218
  • कौन तुमको जानता है ? को न तुमको जानता है ? - भक्ति - 219
  • चटनी चट कर | मोदक पाये | - चेतावनी - 219
  • जान पर जान दे | ज्ञान क्या , जो अभिमान दे ? - ज्ञान की चेतावनी - 219
  • तेरा शयन मेरा आगमन | यह प्रतीक्षा थी या उपेक्षा | सोई दुनिया को जगाने वाला आया तो सोती दुनिया को बुरा लगा | - भाव - 219
  • जीवन स्थिरता है या चंचलता ? हिलता है पत्ता , मूल तो रसमय है , समझता क्यों नहीं ? - ज्ञान - 219
  • काम में भ्रम पैदा न कर बुद्धि रोयेगी , तन सूखेगा | काम में आराम | - भक्ति की चेतावनी - 219
  • सुनाने का बहाना है | कहना - कह ना - फिर क्यों सुनाता , क्यों कहता ? - चेतना - 219
  • विश्वास भी किया तो मिथ्या का ? - चेतना - 221
  • चुप रह कर देख | चुप्पी में मजा है , बोले तो सजा है | - भक्ति की चेतावनी - 221
  • रिझाऊँ तुम को या अपने को ? परिचय न था , पूछता फिरता था सत्य को , प्यार को किन्तु संत ने संदेह का अंत किया प्रथम दर्शन से | अब मन शांत , तन शांत | - ज्ञान - 221
  • रोने वालों को हँसा दे मेरे प्रभो ! यही मेरी अंतिम प्रार्थना है | हँसना छोडा़ रोना आया ,मैं क्या करूँ ? - भाव - 221
  • थका मन , थका तन | - ज्ञान की चेतावनी - 221
  • ख़ुद को न जाना | दुःख मोल लिया - सुख देकर | - चेतावनी - 221
  • प्यार आये , प्यार जाये , किन्तु तुम नजरों में रहो | - भक्ति - 221
  • जब बज उठता है तार | तो भूल गया संसार | - भक्ति - 231
  • विराट मंदिर के पुजारी , उसकी पूजा कब ? - ज्ञान की चेतावनी - 231
  • देव ! मैं बोल नहीं पाता जो कुछ तेरा है | देख नहीं पाता जो कुछ मेरा है | क्या इसी का नाम माया है ? - भाव - 231
  • कुत्ते की भों भों से चोर डरे । साह चलता ही रहेगा , भोंकना बंद होगा ही | - ज्ञान - 231
  • सतगुरु ने तुझे सत् की जानकारी दी | अब ? तू जान दे , जानकारी में जान दे | - भक्ति की चेतावनी - 231
  • विद्या - विदा हुई , जिस दिन से तुच्छ की पुच्छ लगाई | - चेतना - 231
  • शोक का शौक है | हर्ष के लिये तरसता है | - चेतावनी - 231
  • क्या भक्ति में यह शक्ति ? शक्ति , भक्ति दो बहनें | तरल हुई वह भक्ति , सख्त हुई वह शक्ति | - चेतना - 241
  • शरीर आज छूटे या कल मुझे गम नहीं | किन्तु तू पछतायेगा क्यों ? तुझे याद करते करते ही तेरे .... मरते हैं क्या यही तेरी भक्ति है ? - भाव - 241
  • रस लिया , थूका , तू कैसा रस लेता है ? थूकता भी नहीं | यह थूकने वाला रस नहीं | - ज्ञान - 241
  • ( वेद ने ) कहा है | लेकिन कहाँ है ? खोज | - भक्ति की चेतावनी - 241
  • ये दिल पर दाग ? मनुष्यता के | बड़े मीठे हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 241
  • काँपता था भय से प्रेम में नहीं | नाचता था अभाव में , भाव में नहीं | - चेतावनी - 241
  • कानों से जूठा न सुन , मुझे अनहद सुनने दे | - भक्ति - 241
  • जलाया ( ज्योति ) | जल आया ( प्रेम ) | - भक्ति - 251
  • तुझे जब देखना आया , तू उसको देख न पाया | क्यों ? ( तत्त्वमसि ) - ज्ञान की चेतावनी - 251
  • पूजा करते न मिला ? जप करते न झुका | वन्दना करते बन्द न हुआ | तो क्या पूजा क्या बन्दना ? - भक्ति की चेतावनी - 251
  • स्थूल में संज्ञा एक | सूक्ष्म का संसार असीम | न बन्धन , न वन्दन , न क्रन्दन , न मन्थन | केवल तृप्ति | त्रास नहीं , ह्रास नहीं , प्यास नहीं , वास नहीं | - ज्ञान - 251
  • तू माँ भी , माली भी , मालिक भी | मैं क्या कहूँ ? कुछ पता नहीं | - भाव - 251
  • आज काम होता है | मन को विराम दे , तन को विश्राम दे | - चेतना - 251
  • बुद्धि ने भय भगाया - मन ने न माना | भय की दुनिया भय की गाती | अभय की कब सुनाती | - चेतावनी - 251
  • कह न, सह । - चेतावनी - 261
  • एक बार भी तेरा नाम गूँजने लगता इन प्राणियों के कानों में तो निंदा स्तुति भूल जाते | - भाव - 261
  • किरण - जड़ चेतन से बात करती , हँसाती और मिलाती | सूर्य , किरणों का समूह | - चेतना - 261
  • प्रेम को किसने जाना ? कोई वासना समझ बैठा कोई भक्ति | आज भी प्रेमी कहलाने के लिये व्याकुल | प्रेम सरल भी , गरल भी | - ज्ञान - 261
  • फूलों की माला पहनाई | वरमाला हाथ में ही रही | दिल किसी को - माला किसी को | यह उपहास ? कहते उपहार | - भक्ति की चेतावनी - 261
  • जब तू आप से अनजान , कैसा ज्ञान का अभिमान ? - ज्ञान की चेतावनी - 261
  • शब्द की व्यापकता है , किन्तु तुम्हारी व्यापकता शब्दातीत है ? - भक्ति - 261
  • शब्द बड़े कि तुम ? तुम | तो शब्दों में क्यों रमा रखा है ? - भक्ति - 271
  • निरोध में प्रबोध ? शोध - प्रतिशोध और विरोध | - ज्ञान की चेतावनी - 271
  • रास लीला ? लीला आनन्दमयी - जब लाल पीला न हो | नस नस में रस तभी रास | - भक्ति की चेतावनी - 271
  • प्रेम किसी की हस्ती बरदाश्त नहीं कर सकता | - ज्ञान - 271
  • रूप का प्यासा , स्वरुप को क्या जाने ? रूप बाहर स्वरुप भीतर | - चेतना - 271
  • क्या विचार , क्या विकार , जिसने देखा प्रेम संसार | - भाव - 271
  • आ, दर कर, भाव में ले, सौदा पटे। - चेतावनी - 271
  • प्रकाश पर आवरण और कितने दिन ? एक दिन प्रकृति पराजित होगी | स्वयं प्रकाश से प्रकाशमय हो जायेगी प्रकृति | - भाव - 281
  • काम ने किया परेशान | इन्सान से हैवान | - चेतना - 281
  • नेक और वद | दो अक्षर और दो शब्द | अक्षर का नाश नहीं | शब्द गूँजते हैं विश्व ब्रह्माण्ड में | वाणी यदि मधुर तो मुग्ध करती रहेगी अनादि काल तक , यदि बद तो बद दुआ देगी प्राणी को | - ज्ञान - 281
  • संकेत तो केतु है , मन का , तन का , धन का | - ज्ञान की चेतावनी - 281
  • सदा दास , कब उल्लास ? - भक्ति की चेतावनी - 281
  • मन कहता है - जब मैं न , तब त , न , तें , न .( तू नहीं ) - चेतावनी - 281
  • नयन नहीं , आपका अयन है | - भक्ति - 281
  • धन दे |साधन ले | - भक्ति - 291
  • जब तक हार, कैसा आहार ? कैसा विहार ? - चेतावनी - 291
  • प्रेम का मर्म ? न धर्म और न कर्म | - चेतना - 291
  • अमर को स्मर | अमर नाम , अमर काम | मर , यदि नहीं जाने कौन अमर ? - भक्ति की चेतावनी - 291
  • नाम तेरा या उसका ? तेरा नाम मना , उसका नाम जमा | - ज्ञान की चेतावनी - 291
  • यह ' मैं ' कौन है ? जो शरीर त्याग के पश्चात् भी बना रहता है | यह " मैं " स्वयं है , जो अविनाशी है , कालातीत है | - ज्ञान - 291
  • वर्णन ने कहा वर्ण उसका क्या वर्णन करेंगे ? वर्ण वह रहने नहीं देता , न शरीर का और न जाति का | उसके खेल ही ऐसे हैं | - भाव - 291
  • चिन्ता दबाती है , सुख उठाता है , आनन्द मिलाता है | चिन्ता सूक्ष्म होते हुए भी घनीभूत करती है रक्त को | सुख तरंग उठाता मन में | आनन्द - सूक्ष्म , स्थूल के भाव के परे की अवस्था | - चेतना - 301
  • दूज की सूझ अनोखी दूज का चाँद , दर्शन मात्र से , हृदय कली खिलाता | - भाव - 301
  • खोल दरवाजा , दर - दर न भटक | - भक्ति की चेतावनी - 301
  • भगवान को भग, न कहो भगाओ मत | - चेतावनी - 301
  • क्यों गाऊँ ? दुःख के गीत | वियोग तो योग का सोपान | - भक्ति - 301
  • दुःख का भाव धुआँ है और बुद्धि का भाव कुहासा । दोनों ही अवरोधक हैं प्रकाश के | धुआँ दम घुटाता है और कुहासा अति समीप को भी नहीं देखने देता - प्रकाश क्या करे ? - ज्ञान की चेतावनी - 301
  • कब जाना , कहाँ जाना आज भी रहस्य बना हुआ है | कब जाना यह सब ने कब जाना ? कहाँ जाना ? जहाँ-जहाँ न हो | यहाँ वहाँ न हो | हाँ ना , न हो ? - ज्ञान - 301
  • लज्जा के जाल में बेहाल न हो | मान का नाम न ले | भय कैसा ? क्या अभय को भी भय ? मान , लज्जा , भय - इन तीनों से परे कौन है ? उसे जान , पहिचान | - ज्ञान की चेतावनी - 310
  • तू कर्ता भी अकर्ता भी ? सन्तान को कार्य देकर निश्चिन्त दर्शक बन बैठा | - भाव - 310
  • मृत्यु क्या है ? कष्ट दायक प्रसव | मृत्यु क्या है ? दीपक निर्वाण | मृत्यु क्या है ? रूपान्तर | मृत्यु क्या है ? कयामत | मृत्यु क्या है ? स्थूल सूक्ष्म का वियोग | मृत्यु क्या है ? महा प्रस्थान , महा मिलन | - ज्ञान - 310
  • कब तक ? बक मत - अभी, अब | - चेतावनी - 310
  • तेरा तरा - नहीं मरा | यों जीता मरा , मरा मरा | नहीं रमा , नहीं रमा | - भक्ति - 310
  • पवन पावन | मनन श्रावण | - चेतना - 310
  • फाटक तक फटकने न पायेगा यदि यों ही गला बाजी करता रहा | - भक्ति की चेतावनी - 310
  • अर्जुन सरल था , ज्ञान का अधिकारी हुआ | और राधा ? राधा तो वह आधा अंग था कृष्ण का , जिसके अभाव में कृष्ण आकर्षण न कर पाते | - भक्ति की चेतावनी - 311
  • यश क्या गाना , रस पी जाना | - चेतना - 311
  • सती और संत की समाधी सत्य में स्थित है | सत्य में खिले हुए दो सुमन हैं , जो सदा खिले रहते हैं | ( कभी मुरझाते नहीं ) - ज्ञान की चेतावनी - 311
  • सरलता, क्यों विफलता ? इतनी सरल कि आँखों में आती नहीं | - भक्ति - 311
  • आगे को आग लगा । पीछे को गर्भ में छिपा , अभी तो किये जा । - चेतावनी - 311
  • शिक्षा ज्ञानियों के लिए , दीक्षा मतावलंबियो के लिए , भिक्षा मानसिक भिखारियों के लिए | मेरे लिए तो प्रेम पथ है जहाँ विधि निषेध नहीं | - भाव - 311
  • मैं सिद्ध नहीं , मेरा अंत नहीं क्या इसी को सिद्धान्त कहना उचित जान पड़ता है ? यदि हाँ तो यह बुद्धि की बात हुई | मन कहता है सिद्ध का अंत है , सिद्धांत का अन्त है , किन्तु मैं अनन्त | - ज्ञान - 311
  • हवा में तैरता हुआ प्राणी एक दिन हवा में ही विलीन हो जाता है | हवा प्राण हवा मृत्यु | वाह री हवा तैने सबको हवा में उड़ा दिया | - ज्ञान - 312
  • विधि ने कहा-विधि , निषेध संतो के लिए नहीं | संत संतान तो सत्य के लिए और अंत भी होता है शरीर का सत्य के लिए | - भाव - 312
  • घटा नहीं -- छटा देख । - चेतावनी - 312
  • इधर टप टप बूँदे - उधर पट न था - पट बन्द न था | - भक्ति - 312
  • एकम को कोई झगडा़ न था | द्वितीया को दो हुए , महाभारत हुआ | तृतीया को - तीनों गुणों के खेल ने खेल दिखलाया | चतुर्थी को चारों पदार्थों की इच्छा हुई | एक में रहता तो इन तिथियों का तथा वारों का वार न होता | इस पार उस पार को पार करता , मझधार न होता | - ज्ञान की चेतावनी - 312
  • तेज , भेज | भाव सेज | - चेतना - 312
  • लोग कहते हैं राधा कल्पना थी | भई कल्पना ही तो राधा की तरह प्रिय है | - भक्ति की चेतावनी - 312
  • कृष्ण की कल्पना , राधा बन कर करो | कल्पना साकार हो | अपनी कल्पना निराकार हो | - भक्ति की चेतावनी - 313
  • ये बेचैनी क्यों ? तार किधर लगा है ? - चेतना - 313
  • शब्द सुना और बेंध दिया त्रिलोक को | उसी का सुनना सार्थक | आकाश के पार की बातों से क्या ? यदि भेद न जाना , बेंधना न जाना | - ज्ञान की चेतावनी - 313
  • क्या खाऊँ ? जो तुझ में समाऊँ | गम खाऊँ या रम जाऊँ ? - भक्ति - 313
  • मिर्चा का बघार नाक जलाता | कपाट बन्द कर, पड़ोसी प्रभावित न कर दे | - चेतावनी - 313
  • मुझे चुप रहने दे | झूठा राग मुझसे गाया न जायेगा | सत्य मेरा प्रभु | व्यवहार संसार के लिए । मुझे शांत रहने दे | - भाव - 313
  • सृजन और विसर्जन , जन-जन को हर्षित और आकुल करता है | संत जन इसका रहस्य जान , ज्ञान ध्यान में जीवन सफल करते हैं | - ज्ञान - 313
  • स्वछन्द = ' स्व ' का छन्द असीम , पर का कष्ट दायक | है तो छन्द किन्तु ' स्व ' का है अतः आनन्द दायक | - ज्ञान - 314
  • गुण गा गा कर मैं थक गया | मुझे तो निर्गुणी बना कि तेरे जैसा मजा पाऊँ | - भाव - 314
  • धोखा--धो कर खा, धोखा न रहे | - चेतावनी - 314
  • मन्दिर - मन देर न कर | मस्जिद - मत जिद्द कर | गिर्जा - गिर चरणों में जा | विहार - हार न मान , विहार कर | - भक्ति - 314
  • मेरी गुड्डी कहीं अटक गई है | सूता मेरे हाथ में है , मैं टानूँ ? - ज्ञान की चेतावनी - 314
  • प्रतिक्रिया नहीं , यह परिछाई मात्र है | आईने में क्रिया नहीं , यह छाया मात्र है | - चेतना - 314
  • आज वचन सुनता है , कल बच न सकेगा | सावधान | - भक्ति की चेतावनी - 314
  • प्यार , कोई खेल नहीं , यद्यपि खेल के लिये प्यार करता है | - भक्ति की चेतावनी - 315
  • इस पार , उस पार , यही व्यापार | - चेतना - 315
  • स्वर में ईश्वर है | बेसुरी माया है | - ज्ञान की चेतावनी - 315
  • साजन ! सत् जन मिले | तुम ही मिले | - भक्ति - 315
  • तू अपने में खेल, आनन्द पायेगा, जग सपने में खेल, मजा पायेगा | दिल भरमायेगा, तू लजाएगा | न हाथ आयेगा, समय बीत जायेगा | - चेतावनी - 315
  • जीवन का एक दिन भी महान जब प्राणी महान के प्रकाश से प्रकाशित हो | - भाव - 315
  • यह शरीर दीपक , रक्त स्नेह (तेल) आयु वर्तिका , वायु प्राण प्रज्वलनकर्त्तृ | - ज्ञान - 315
  • नेति-नेति कह कर यदि वेद न पुकारते तो लेखक लिखता क्या , पाठक पढ़ता क्या ? कवि की कल्पना निरर्थक न होती | - ज्ञान - 316
  • साथ का आनंद अंतरंग साथी से पूछो | प्रत्येक पद और क्षण आनन्द दायक | - भाव - 316
  • क्या नहाया ? क्या धोया ? क्या यों ही थूक बिलोया ? मन नहाया , दिल धोया , नहीं , यों ही जनम बिताया | - चेतावनी - 316
  • खल कौन ? लख | सभी मखमल बन जाते हैं , जब लखना , खेलना आ जाता है | - ज्ञान की चेतावनी - 316
  • शरीर में सुगंध ? संत के लिये - असम्भव क्या ? - चेतना - 316
  • पुकारने के स्थान से तुम्हें कब पुकारा ? क्या आर्त स्वर तुम्हें अति प्रिय है ? - भक्ति - 316
  • यह कैसा ध्यान है जो लगाना पड़ता है | ध्यान कैसा होता है यह मां से पूछो , बच्चे से पूछो | ध्यान सहज है | - भक्ति की चेतावनी - 316
  • बसाना या बसना - पूछ दिल से | - भक्ति की चेतावनी - 317
  • गीत गाते , दिल लुभाते | जाग जाते , प्यार पाते | - चेतना - 317
  • सप्त स्वर में संगीत है | राग-रागिणी | सप्त भूमिका में भूमि और आकाश के सभी भावों पर विजय है | - ज्ञान की चेतावनी - 317
  • क्या सुन रहा है बैठा तराना जिन्दगी का , आया है छलकने पर पैमाना जिन्दगी का | इस दम का क्या भरोसा दम पर न छोड़ नादां , अभी से ख्याल कर ले मस्ताना जिन्दगी का | हालाँ , अजल से ताकत चलती नहीं किसी की , क्यो मौत ही से करता याराना जिन्दगी का | - चेतावनी - 317
  • आनंद का जन्मदिवस कब ? आनंद के लिए ही जन जन उत्सव मनाता है , भाव की थाली सजाता , प्रेमाश्रु की माला पहनाता | - भाव - 317
  • बदहोशी हुई दोषी - होश ने दोष दोषी दोनों से मुक्त किया | - ज्ञान - 317
  • वाणी सत्य - स्थान विशेष की | वाणी - वाणवत् चली | - भक्ति - 317
  • मौनी ने मौन धारण की | क्यों ? मोह नहीं है बोलने का , सुनने का | - ज्ञान - 318
  • संसार का सार तेरा नाम | यदि इसी से वंचित रहूँ तो मेरा आगमन वृथा तेरा अवतार किस काम आया ? - भाव - 318
  • अरे बातें करते - करते तबाह हो रहा है | कुछ ध्यान भी है , क्या कहता था और क्या कर रह है ? - चेतावनी - 318
  • फेर - माला फेर - निनानबे का फेर . - ज्ञान की चेतावनी - 318
  • नकली सोना , पीतल से भी बदतर | - चेतना - 318
  • प्रकाश में प्रकाश | प्रकाश में उल्लास | - भक्ति - 318
  • हवा कहती है - है | फिर क्यों तवाह ? - भक्ति की चेतावनी - 318
  • क्यों चिल्लाता है ? क्यों ? चित् लाता है , या यों ही चिल्लाता है ? - भक्ति की चेतावनी - 319
  • क्यों वृथा गाल बजाऊँ जब तुम ही प्रसन्न नहीं ? ऐसा न कहो तुम मेरे प्रकट रूप हो | छिपा छिपा रमण करता हूँ योगियों के हृदय में , भोगी भोग में मस्त | - भाव - 319
  • इशारे पर सारे | ( जब ) बाबा हमारे | वाह वाह हमारे | इशारे पर सारे | - भक्ति - 319
  • प्यार की दीवार है , तोड़े तो बेड़ा पार है | - चेतना - 319
  • काल का ख़याल है , उस कालोऽस्मि का नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 319
  • विश्वास नहीं तो विश्व को क्या जानें , विश्वेश्वर की आशा क्यों करने लगे ? आश को विश्व के लिये छोड़ , तू विश्वास से काम ले | विश्व तेरे पाने की आशा करे , यदि विश्वासमय हो जा | - चेतावनी - 319
  • पागल , बकवास क्यों करता है ? मैं पागल यह तो तुम कहते हो तुम्हें अधिकार है कहने का | बक (वगुला) नहीं , वास मेरा नहीं यहाँ फिर बकवास कहना क्या उचित होगा ? - ज्ञान - 319
  • " मैं " और " तू " ने दुनिया को चक्कर में डाल दिया अन्यथा व्यथा न होती , कथा न होती | - ज्ञान - 321
  • पद चाहता है , प्रभु पादुका नहीं , पद नहीं प्रभु पद , मद नहीं हरि मद , हद नहीं , अनहद , वद नहीं , कर , मर । - चेतावनी - 321
  • किसी की चाह ने मुझे यह राह दिखलाई | आज वह तो अन्तर्धान हो गया किन्तु अन्तर्दाह कैसे मिटे जब तक कि उसके दर्शन न हों | - भाव - 321
  • भाषा की सीढ़ियाँ तुम्हें भाव तक पहुँचा न सकेंगी | भाव की तरंगोंवाला भगवान भाव में ही लीन किन्तु भावातीत तो कोई और है | - ज्ञान की चेतावनी - 321
  • गति शरीर में , गति मति में , फिर ? फिर नहीं , स्थिर | स्थिर में गति , अगति दोनों ही | - चेतना - 321
  • बोलती बन्द , अब आनन्द | - भक्ति की चेतावनी - 321
  • स्थूलता क्यों खींचती है ? सूक्ष्म तो उसमें समाये , जान जाये , भेद पाये | - भक्ति - 321
  • मीत , गाते गीत | मीत ही है प्रीत | - चेतना - 331
  • जीवन , जीव न , शिव | - ज्ञान की चेतावनी - 331
  • जीवन की प्रथम रश्मि ने नवीन प्रभात का स्वागत किया |यह दिव्य जीवन है जहाँ जीव नहीं - शिव ही शिव है | - भाव - 331
  • सम - समीप | और ? भीत | - भक्ति की चेतावनी - 331
  • हार कर हरि आया | उसकी हार ही जीत है | - चेतावनी - 331
  • " हूँ " क्यों कहता है ? " मैं " क्यों कहता है ? स्वयं को जताने के लिए " मैं हूँ " शब्द मात्र है | - ज्ञान - 331
  • मीरा के नैनन वाण पड़ी , इधर वाणी को वाण पड़ी | देखा जाय किसका वाण किस पर चलता है | - भक्ति - 331
  • सात (लोक) यदि साथ दें तो मजा ही मजा | नहीं , सत्य यदि साथ दे तो आनन्द ही आनन्द | - ज्ञान - 341
  • रातें और बातें बीती | वह दिन कब आया जब दीनता न रही,वह दिन सुदिन | - चेतावनी - 341
  • आँख की बंद | यही हुआ फंद | - भक्ति की चेतावनी - 341
  • पान कर , पान करा | - ज्ञान की चेतावनी - 341
  • प्रथम दर्शन-अंतिम भेंट | प्राणों की जगत की | - भाव - 341
  • दशरथ आज राम खोज रहा है | मन राम तो तन आराम | - चेतना - 341
  • देवता | दे बता - बता दे - देवता | - भक्ति - 341
  • द्रष्टा - स्रष्टा बना | न देखने की इच्छा होती और न सृष्टि होती | - चेतना - 351
  • चमक कम , चमत्कार कम , धमक कम , धर्म का अभिमान कम | - ज्ञान की चेतावनी - 351
  • फँसना नहीं , हँसना है ( झंझटो में ) | - भाव - 351
  • विश्व खो | विश्वास न खो | - भक्ति की चेतावनी - 351
  • मोहब्बत नहीं - मोह का व्रत मोह वत| - चेतावनी - 351
  • सर्वव्यापी की हृदय में ही स्थापना क्यों ? पहले भीतर देखना तो जानें । समय आने पर बाहर भी देख सकेगा । बाहर से ( मूर्तियाँ ) भीतर , फिर भीतर से बाहर । - ज्ञान - 351
  • बेकली ही कली को खिलायेगी | - भक्ति - 351
  • मिलन में वियोग कहाँ ? यदि है तो शरीर का | - भक्ति - 361
  • मतलबी तो अनेक देखे , मतवाला एक देखा जिसने अपने प्यार से मतवाला बना दिया | - ज्ञान - 361
  • समय -- स मय हो | - चेतावनी - 361
  • घर भीतर भी, बाहर भी | बाहर का घर हरण करता रहा शांति का | हरि का नाम लेना भी कठिन किन्तु जिस दिन संत ने भीतर वाले घर का रास्ता बताया तो आनन्द आया | - भाव - 361
  • क्यों नींद ? लय में लय हो रहा है | जागृत जाग , रत हो जा , तल्लीन हो जा | - भक्ति की चेतावनी - 361
  • पर से पक्षी उड़ते हैं | बे पर भाव | पक्षी ससीम , भाव असीम | कुछ भाव एसे भी आते हैं जो बे सर पैर के होते हैं | किन्तु बेचैन क्यों ? ऐसे भाव भी आयेंगे जब किसी का अभाव न रहेगा , न खटकेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 361
  • शिव - वशीभूत - भूत , भूत न रहा | - चेतना - 361
  • साह को उत्साह | चोर करे शोर | - चेतना - 371
  • कहानी में क्या हानि ? कहा नहीं कि हानि ही हानि , कहा - यह कहा , वह कहा किन्तु किया भी या कहते ही रहे | - ज्ञान की चेतावनी - 371
  • आज - आ , जा | कल काल की चिन्ता न रहे | - भक्ति की चेतावनी - 371
  • प्रसार तो प्रचार नहीं , प्रचार चारों दिशाओं में उत्तेजना फैलाता है | प्रसार स्वयं फैल जाता है , उसे फैलाना नहीं होता | - भाव - 371
  • तू मेरा तो जग मेरा - नहीं तो सब झूठा सब मिथ्या | - भक्ति - 371
  • ये खटमल तो शरीर मन दोनों को काटते हैं -शांति की दवा छिड़के तो फुरसत मिले | - चेतावनी - 371
  • किस-किस की सुने प्राणी - दुनिया की या नवीन प्राचीन मतों की | तंग आकर उसने निराला मार्ग अपनाया भोग का | तंग ही आना है तो भोग का ही , क्षणिक सुख का ही इच्छुक क्यों न बनें | वाह रे मनुष्य | - ज्ञान - 371
  • मौन की प्रेरणा कहाँ से मिली ? अज्ञात से | अज्ञात ने कहा - सब कुछ करता हुआ भी मैं मौन हूँ , तू भी मौन रह कर देख कि मजा है या कजा है | - ज्ञान - 381
  • मित्र कौन ? जो कहे अत्र , तत्र , क्या सर्वत्र मेरा प्रेम राज्य है | - भक्ति - 381
  • यह सृष्टि कैसे बनी , तन-मन कैसे बना ? यह ग्रन्थों से पूछ , विद्धानों से पूछ | कौन कैसे बना इसका उत्तर कौन दे | यह तू ही जानता है | मैं तो यही जानता हूँ कि तेरे सिवा मेरा कोई नहीं | - भाव - 381
  • अक्षत चढ़ाते चढ़ाते अक्षत न हो सका तो क्या अक्षत चढ़ाये ? - भक्ति की चेतावनी - 381
  • चाँदनी आई - चाँद कहाँ छिपा रह सकता है | - ज्ञान की चेतावनी - 381
  • ऋषि मुनियों की असम्भव बातें करते किन्तु अपना पता नहीं | यह न पुण्य है न पाप | - चेतावनी - 381
  • आ , लागी रे , या लागी रे | आला गिला में आग लागी रे | आ लागी रे | - चेतना - 381
  • नचा रही तुम कौन ? मैं भगती , भक्ति , भक्त + ई | नाच रही तुम कौन ? मैं भगती , नहीं भगती भक्ति , भक्त + ही | और तू ? जान मुझे पहिचान | मैं ज्ञान - नहीं अभिमान , मैं जान , तेरी जान , मुझे पहिचान | - चेतना - 391
  • मैं में लीन - मलीन | तुम में लीन - तल्लीन | - चेतावनी - 391
  • श्रीतल , शीतल | - भक्ति - 391
  • धर्म का नाश | धर्म का नाश , ह्रास , उपहास कभी होता नहीं , मान्यता बदलती है , अविनाशी का धर्म भी अविनाशी है | - भाव - 391
  • मुझे सोने दे , किसी का होने दे | दे कहने से कुछ न बनेगा | ले , यदि ले सके | - ज्ञान - 391
  • छिपा , प्रकाश में आया , उसी दिन प्रकाश मय | - ज्ञान की चेतावनी - 391
  • रक्षा उसी की जो क्षार हो जाये | क्षार बना आँखों का सुरमा बना | बन्धन की क्षार , विचारों के बन्धन की क्षार तो गुरु ही करते हैं | आज रक्षा का बन्धन गुरु के चरणों में अर्पण करो | - भक्ति की चेतावनी - 391
  • ताव में न आओ | भाव में आओ | ताव स्वयं बेताब हो जायेगा , झल्ला कर रह जायेगा , भाव में आओ | - भक्ति की चेतावनी - 401
  • किसी पागल ने कहा - पूजा कर | ना बाबा , कहीं मैं भी पागल न हो जाऊँ | पागल की पूजा भगवान को भी पागल बना देती है | - ज्ञान - 401
  • तुम मन में हो तो यह मन क्यों दौड़ रहा है | मन खेल खेलता रहता है और मैं खेल देख रहा हूँ मन का | मन थकेगा मैं नहीं थकता | - भाव - 401
  • उपवास कर कहाँ वास करूँगा ? अब तो वास करूँगा , उपवास उसी में वास करे | - भक्ति - 401
  • क्या जग में जगते हुए देखे ? या कर्त्तव्य पथ से भागते हुए ? - चेतना - 401
  • अज्ञेय कह कर , रहस्य की सृष्टि मानी | दृष्टि पाता , रहस्य छिन्न - भिन्न हो जाता | - ज्ञान की चेतावनी - 401
  • मवाद पर बैठी मक्खियाँ मनुष्य की घ्रुणा का कारण बनीं | मक्खियों ने कहा -- यह तो मानव कार्य है | - चेतावनी - 401
  • मिट्टी से खेला | मिट्टी में खेला | न आनन्द से खेला , न आनन्द में खेला | अंत मिट्टी या अंत आनन्द ? सोच | - चेतावनी - 410
  • तप किया तन के लिये कि मन के लिये ? यदि तन के लिये तो अपूर्ण है | - ज्ञान की चेतावनी - 410
  • जो माँ से अधिक प्यार करे , पिता से अधिक स्नेह रखे , वह कौन है ? वह तू है | ऐसा व्याप्त कि त्रिविध ताप क्षण में हरण कर , शरण में ले मानसिक रण से मुक्त करता है फिर भी जन तुझे न जाने तो भ्रान्ति ही मिलेगी , शान्ति तो तेरे नाम में है | - भाव - 410
  • किसी को माना भी तो चमत्कार के कारण | राम यदि रावण का वध न कर पाते तो शायद राम की भी पूजा न होती | ज्ञान भक्ति भी तभी पूजित जब चमत्कारपूर्ण हो | - ज्ञान - 410
  • कल जो मस्तक पर थी आज चरणों में | इसे तपस्या कहा जाय या समर्पण ? ( गंगा ) - भक्ति - 410
  • आप को पा , कहाँ पाप ? आप ही आप फिर कहाँ शाप ? कहाँ ताप ? कहाँ जाप ? - भक्ति की चेतावनी - 410
  • जान (ज्ञान ) के लिए प्राण | - चेतना - 410
  • गुरु के लिए प्राण | - चेतना - 411
  • क्यों न वारी ? यों ही हारी | - भक्ति की चेतावनी - 411
  • कुछ के लिये तो रहस्य बना है और कुछ के लिये रस , अधिक तो तेरी परवाह भी नहीं करते | तू सुखी वे दुःखी | - भक्ति - 411
  • न शांति चाहिये और न भक्ति | चाहिये चमत्कार | प्रत्येक क्षण प्रकृति अपने खेल दिखला रही है | क्या यह चमत्कार नहीं ? इसे चमत्कार कौन मानता है ? सर पर हाथ रखे और रोग दूर हो जाये | सिंह को गाय बनता देख कर दुनिया नमस्कार करती है | वाह रे दुनिया | - ज्ञान - 411
  • कौन आया , जिसने अंतरात्मा को जगाया ? विषय वासना कहाँ जब तेरा वरद हस्त मस्तक पर है | - भाव - 411
  • लोग तप देख कर चकित किन्तु स्वयं तो खेल ही देखता रहा | - ज्ञान की चेतावनी - 411
  • दिल चाही हाथों हाथ न हुई , तो लगा गालियाँ देने , निज को , भगवान को , भाग्य को | किन्तु अपराधी कौन ? - चेतावनी - 411
  • उत्सुकता उपस्थित करती , उपेक्षा दूर करती | इसमें आश्चर्य क्या ? - चेतावनी - 412
  • पूजा कर पवित्र बना | अभी पूजा अपूर्ण | पवित्र तू है | पूजा भी तेरी है | - ज्ञान की चेतावनी - 412
  • सरल को क्यों बनाया , जब दुनिया टेढ़ी ? घबडाता क्यों है ? विजय सरल की ही है | - भक्ति - 412
  • राही ने राह पूछी , कौन बताता , सभी तो गुमराही थे | तेरी प्रिय सन्तान सन्त आया , राह ही नहीं , शाह से मिलाया | यह तेरी कृपा या तेरी सन्तान की , तूही जानें | - भाव - 412
  • चतुर्भुज भगवान न होता तो कौन नमस्कार करता किन्तु दो हाथ वाले ने तो चार भुजा वाले को प्रेम , भक्ति से अपना प्रेमी , सखा , दास तक बना दिया | यह क्या कम चमत्कार है ? - ज्ञान - 412
  • पुकार सुन | हुँकार न भर | - भक्ति की चेतावनी - 412
  • रूह के लिए प्राण | - चेतना - 412
  • अनन्त ही अनन्त है | शांत है अनंत है | भ्रांत कब अनन्त है , क्लान्त कब अनन्त है ? - चेतना - 413
  • यदि भूखा , तो क्यों रुका ? - भक्ति की चेतावनी - 413
  • जो मैं में लीन उसका हृदय मलिन होगा ही , इसमें आश्चर्य क्या ? - ज्ञान - 413
  • पुस्तकें नहीं , तुम्हें देखता हूँ | खता तो नहीं , खफा तो नहीं | तेरा वियोग असह्य | - भाव - 413
  • एक को अनेक में देख न सका तो कैसी भक्ति ? - भक्ति - 413
  • जब द्रष्टा ही स्रष्टा है तो भ्रम क्यों ? जाने तो पहचाने | - ज्ञान की चेतावनी - 413
  • अल्प को ही कल्प समझना मन बुद्धि का धोखा है | - चेतावनी - 413
  • शिव का विष पान सरल , वासना का अधर पान विष से भी भयानक | बार-बार जन्म बार-बार यातना | - चेतावनी - 414
  • लय में गा | लय हो जा | पल पल प्रलय | - ज्ञान की चेतावनी - 414
  • तेरा नाम क्या कुनाइन है जो मुख में कड़वी पर जब गले के नीचे उतरी कि चीनी सी मधुर हो गई ? - भक्ति - 414
  • जो प्रणय को नहीं जानता , प्रणव को नहीं मानता और प्रवीण बन बैठा उसकी अवस्था क्या होगी ? शोचनीय कह कर भी संतोष नहीं होता | - ज्ञान - 414
  • प्यार को कभी देखा है ? प्यार को देखा नहीं , प्यार के दिवानों को देखा है जिन्हें भले बुरे की पहचान नहीं । अन्त अनन्त का घ्यान नहीं । - भाव - 414
  • बातें न बनाओ | सीधी राह पर आओ | - भक्ति की चेतावनी - 414
  • लेखनी क्यों ? कथनी क्यों ? करनी क्यों ? छोड़ गाथा , तोड़ नाता | न कोई आता , न कोई जाता | स्वयं दिखाता , स्वयं लखाता | - चेतना - 414
  • लाल भाल पर बाल बाल पर हाल बेहाल किया | - चेतना - 415
  • हाय यहाँ , तो बाँह कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 415
  • खता मुआफ हो , सर्वव्यापी की तौहिनी क्यों ? हीन ही दीन | तेरा दीन धर्म तो मैं हूँ | ये धर्म कर्म वाले इसी में लगे रहेंगे | तू तो मेरा है , न दीन न हीन | - भाव - 415
  • अन्तर्यामी | बाहर क्यों चक्कर खिलाता है ? तुझे भी भय है कहीं अन्तर वाले के दिल में न बैठ जाऊँ ? - भक्ति - 415
  • कहो कथाकारों से कि वे बुद्धि , बल तथा तर्क के द्वारा ईश्वरीय लीला को समझा न सकेंगे | उनका प्रयास बौने का आकाश छूना जैसा है | - ज्ञान - 415
  • ( वेद व्यास ) वेद ( जान ) और वास कर | भारत में ही महान नहीं , विश्व में तू महान है | - ज्ञान की चेतावनी - 415
  • गर्भ से प्रकाश में आकर भी न प्रकाश जान सका और न देख सका | फिर मृत्यु अनिवार्य - गर्भ तैयार | हाय विधाता , कैसा खेल ? - चेतावनी - 415
  • माँ के स्तन में रस , प्रकृति के अणु अणु में , फिर नीरस जीवन वाहन करता है , यह अज्ञान है | - चेतावनी - 416
  • आँखों में जादू है | किसी आँख वाले से पूछो | - ज्ञान की चेतावनी - 416
  • प्यार का द्वार केवल तेरे लिये तू मुझे चाहता जो है | - भक्ति - 416
  • अहं को अहंकारी कब समझ पाया ? अहं नम्र हो जाता है जब शरणागत हो जाता है महाशक्ति से | - ज्ञान - 416
  • आज तेरी तस्वीर देखी , पेड़ों में , पत्तों में , लताओं में , पहाडों में , पत्थरों में , देखता ही रह गया | बला का आकर्षण है , फिर भी ये पण्डित , ये विद्धान , निराकार , साकार के झगडे़ में लगे हुए हैं क्या बात है ? बात कुछ नहीं , विवाद ही इनकी जीविका है | - भाव - 416
  • क्यों फूला ? क्यों भूला ? जग भुला | दे धूला | - भक्ति की चेतावनी - 416
  • पथ देख , पथ पाया | पथ से इस राह आया | - चेतना - 416
  • क्षण क्षण क्षय क्षय रण का क्यों भय तू है निर्भय , तू है निर्भय | - भक्ति की चेतावनी - 417
  • सूझ उसकी , जिसने सूझ दी | बूझ भी उसी का प्रसाद है | - भाव - 417
  • खिलौने न दे , प्यार दे | तुझे जानूँ अपना मानूँ | - भक्ति - 417
  • भोग मानसिक रोग है , इसे अति अल्प व्यक्ति ही जानते है | भोग से रोग उत्पन्न होता है यदि अति मात्रा हो | सर्व विदित है | - ज्ञान - 417
  • देखते - देखते मोह बढ़ाया | मोह बढ़ाया , यह जीवन पाया | - चेतना - 417
  • अणु ने कहा - मैं आज महान से मिलूँगा | महान ने कहा - पागल ‘ मैं ‘ छोड़ तू ही महान है | - ज्ञान की चेतावनी - 417
  • राह-गुमराह - फिर राहत कहाँ ? - चेतावनी - 417
  • पुरुष है तो पुर में रह | और में रत तो औरत | - चेतावनी - 418
  • ऐसा मिल कि खिल जाये दिल | - ज्ञान की चेतावनी - 418
  • त्याग भी सूक्ष्म अहंकार पूर्ण है | प्रेम में भी सूक्ष्म वासना है | सूक्ष्म का त्याग और प्रेम भी अति सूक्ष्म है किन्तु इस सूक्ष्म की व्याख्या तो अति सूक्ष्म है | जहाँ स्थूल प्रधान वहाँ सूक्ष्म की बातें अर्थहीन | - ज्ञान - 418
  • क्या बताया ? क्या दिखाया ? कुछ भेद भी पाया ? हाँ पाया , खोया धन घर ही में | - चेतना - 418
  • प्रतिदिन अमावस्या ही है जहाँ अंधकार देखा | तेरा पूर्ण चन्द्र मुख छिपा न देखा | - भक्ति - 418
  • माँ हर इसका तम , यह तो माहिर बन बैठा | - भाव - 418
  • बन तू रेणु , बजे अब वेणु | - भक्ति की चेतावनी - 418
  • अब मूक हो जा , अब तो सो जा | - भक्ति की चेतावनी - 419
  • जलसा-जल सा था उसके लिए , जिसने प्यार का जलवा देखा था | जलसा नहीं , उसे जलवा आनन्द देता है | विषयों में बहने वाला , दिल बहलानेवाला प्राणी तेरा जलसा तुझे मुबारक | - भाव - 419
  • दुनिया कहती मुझे मान , तू ही बता , तुझे मानूँ या तेरी दुनिया को ? - भक्ति - 419
  • शक्ति दासी है जो उसका व्यवहार जानता है | शक्ति की उपासना , अपने को दास मान बैठता है | - चेतना - 419
  • प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि प्राणी का मुक्त होना सरल नहीं | भक्त की भी प्रकृति है तथा आसक्त की भी | भक्त की कोमलता प्रकृति को भी द्रवीभूत कर देती है , तभी वह पुरुष को पाकर पुरुषत्व प्राप्त कर सका है | - ज्ञान - 419
  • मानव - मान नव - नित्य नवीन | मान अभिमान करना सीखा , अब कुछ नम्र होना सीख । - चेतावनी - 419
  • निश्चित हो , अनिश्चित समझ घबड़ाता है | काल कार्य को प्रधान समझता है | स्वयं ही कर्त्ता , भोक्ता है - घबड़ाता क्यों है ? - ज्ञान की चेतावनी - 419
  • निर्माण हो रहा है तो निर्वाण भी हो रहा है | क्रम चालू | पूरा हुआ - फिर न अधूरा हुआ | - ज्ञान की चेतावनी - 421
  • जगदीश भी गुप्त है तो क्यों प्रदर्शन के लिए व्याकुल ? प्रत्येक क्षण में रण का क्यों आव्हान करता है ? - चेतावनी - 421
  • वरसात में सात वर है ( सप्तलोक ) | जान सका तो तर हो गया और अनजान तरसता गया , तड़फता गया | - ज्ञान - 421
  • कब समय आयेगा जब दृष्टि मात्र से तुम्हारी अनुभूति होगी ? - भक्ति - 421
  • यह जटा नहीं छटा है प्रभु की , जिसने अपने अबोध बालक को बाल बाल बचाया है जग के प्रलोभनों से | - भाव - 421
  • क्या कह दूँ अपना हाल ? मै हूँ - तेरे सवाल का जवाब | - भक्ति की चेतावनी - 421
  • निरोगी - वह जो निराकार , साकार के राग को एक माने | - चेतना - 421
  • महान जब साधारण जन की ओर आता है तो महान कहलाता है | साधारण जन जब महान बन जाता है तो बन नहीं जाता , जन-जन में महान के गुण फैलाता है | - भाव - 431
  • भगवान को किसने बनाया ? भक्त ने | और भक्त को किसने बनाया ? भगवान ने | - भक्ति - 431
  • प्रकृति ने मुख चूमा अपना लिया , पुरुष की ओर घूम कर न देखा | थी न काया , माया से मिली किन्तु पुरुष को देखती तो मुग्ध हो जाती , शान गुमान न रहता | - चेतना - 431
  • कल जब आज की चिन्ता की तो आज ने कहा - अब कल की चिन्ता न कर , नहीं तो इस चिन्ता का अंत नहीं | - चेतावनी - 431
  • नाचते देखा वृत्तियों को , गाते सुना अन्तर्वृत्तियों को | आनन्द ही आनन्द | - ज्ञान की चेतावनी - 431
  • कपूर की तरह जला काया माया को , यही आरती है | - भक्ति की चेतावनी - 431
  • नीचे क्यों ? ऊपर देखें | - भक्ति की चेतावनी - 441
  • एक रंग ऐसा है , जिसमें सभी रंग हैं | किन्तु उसका अपना रंग नहीं | ( स्वच्छ , सफेद ) । - चेतना - 441
  • अरे मान तो अरमान पूरा हो | कर जान पहिचान तो अरमान पूरा हो | नहीं तो ? नहीं और तो कहते कहते आज कुछ न रहा | तो मैं क्या करूँ ? यही 'नहीं तो' की कहानी | - चेतावनी - 441
  • हलचल | हल कर जीवन प्रश्न , नहीं तो यहाँ से चल | यहाँ हलचल है | - ज्ञान की चेतावनी - 441
  • ये फूल मेरे हृदय की कोमलता बतलाते हैं | कोमलता न जान मुझ पर चढ़ाकर प्रसन्न होने वाला ही प्रसन्न हो जाता हैं | मैं ? क्या कहूँ ? - भक्ति - 441
  • तेरे जीवन का तीर ( किनारा ) मैं , रथ मैं , तीर्थ मैं , तुझे तीर्थों से क्या काम ? भ्रम वाले इनकी यात्रा कर भी , भ्रम निवारण न कर सके | - भाव - 441
  • विशाल है तेरे मन्दिर - किन्तु तू कितना विशाल है , यह मन्दिर वाले नहीं जानते | धन्धा है क्षुधा निवृत्ति का | क्षुधा मिटी - खुद आया | खुदा जो है | - भाव - 451
  • बड़े - बड़े ग्रन्थ क्यों ? ग्रन्थकार की मानसिक ग्रन्थी भी इतनी ही विशाल थी | - चेतना - 451
  • इन आँखों को क्या हो गया ? ये तो एक ही में रत हैं , तर है | - भक्ति - 451
  • अभाव की भिक्षा अभाव उत्पन्न करती , किन्तु भाव का प्रभाव अद्भुत है | भूत शिव में अन्तर कहाँ ? हृदय हाथ में अन्तर कहाँ ? एक गति उत्पन्न करता और छिप रहता और एक निमित्त बनता गति का | - ज्ञान की चेतावनी - 451
  • दर्श में भी रस , स्पर्श में भी रस , कर्ष में भी रस , हर्ष में भी रस | पृथ्वी रसा फिर भी नीरस बन घूम रहा है , बलिहारी है | - चेतावनी - 451
  • लिखना , बोलना | लिख कर यदि खिल सके तो लिख | बोल कर यदि भूल सके तो बोल , नहीं तो चुप रहो | - भक्ति की चेतावनी - 451
  • मिलन का आनन्द , मिल न , हिल मिल जा , आनन्द , फिर जाये कहाँ आनन्द ? - भक्ति की चेतावनी - 461
  • याद करने वालों को कौन भुला सकता है ? न नर न नारायण | - चेतावनी - 461
  • जलन भी जल चाहती है किसी हृदय का जो आँखों में समाया हुआ हो | - ज्ञान की चेतावनी - 461
  • एक दिन तेरे मुख से सुना था कि ' वह तू है ' और आज इस मुख से निकल रहा है - वह तू है – सदगुरु वह तू है | जिसने तू मैं का रहस्य समझाया | - भाव - 461
  • यार को देख प्यार भूला | - भक्ति - 461
  • थको मत - कथो , कहो | अपनी कहो – दिल की कहो , दिमाग की कहो , अहंकार की कहो | कहो इतना कहो कि और कहना न रह जाये | - चेतना - 461
  • गुरु गुड़ था और चेला शक्कर | अब भी शंका थी मैं बड़ा़ कि गुरु | गुड़ न होता तो शक्कर बनती कैसे ? - भाव - 471
  • हजम कर सुनी बातें नहीं तो यह दुनिया हजामत बना कर ही छोड़ेगी | - चेतावनी - 471
  • कौवे की काँव-काँव भली क्योंकि ये पक्षी हैं | इनको क्या कहूँ जो दिन रात काँव-काँव कर समय बरबाद करते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 471
  • खिलाड़ी को खिलौना बना दिया | अब खेल कहाँ ? - चेतना - 471
  • कर तलाश नहीं विनाश | - भक्ति की चेतावनी - 471
  • सरकार का बल पाकर निर्बल भी सबल | तुम्हारे प्यार का बल पाऊँ तो सम्राट कहलाऊँ | - भक्ति - 471
  • सोया तो जगा , चिर जागृत को स्वप्न कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 481
  • यह बालिका प्रकृति की छाया है | ऐसा दिखलाती खेल कि बालक देखता ही रह जाता है और यह बालक पुरुष का बाल भी न जान पाया | मोहित हो इशारे पर नाचता है | वाह रे खेल ? - चेतावनी - 481
  • गाड़ी आती तो चलता | डिगने वाले के लिये कहाँ गाड़ी ? - चेतना - 481
  • क्यों कहूँ तुम अज्ञात , तुम अज्ञेय | अज्ञेय होते तो अज्ञेय कहता कौन ? है न ज्ञेय की भावना जो अज्ञेय कहलवा रहा है । - भक्ति - 481
  • इसे कौन समझाए यह अपनी समझ के सामने किसी की भी नहीं सुनता न धर्म की और न कर्म की | दयालु इस पर भी दया कर शायद समझ जाए अपने जीवन का मूल्य | - भाव - 481
  • शुष्क पंक्तियाँ दिल को हरा कैसे करे | शुष्कता , नीरस भाव वहाँ ग्रहण भी शुष्क | परिश्रम की प्रधानता ही रह जाती है | - ज्ञान की चेतावनी - 481
  • जब मैं चला तो गति ने साथ दिया और जब ठहरा तो स्थिति ने | दो महान शक्तियाँ मेरे साथ थीं , फिर भी दुनिया न जान पाई मैं कौन हूँ | - ज्ञान की चेतावनी - 491
  • जगत ने मुझ में अवगुण देखे किन्तु हे दया के समुद्र तू ने हृदय से लगाया अवगुण को गुण में बदला | हृदय विशाल है तेरा | - भाव - 491
  • देकर भी न माँग | माँग बुरी | मिले उसी में कर सबूरी | - चेतावनी - 491
  • तेरे नाम में 'मैं' रमा - यही भजन | - भक्ति - 491
  • कल मैं था , कलम होता , आज मैं नहीं अमर हुआ | - चेतना - 491
  • अवतार का तार खटखटाते हैं - बेतार का तार कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 491
  • भजन तो प्रेम पूर्वक , बल पूर्वक नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 501
  • इच्छा ने सृष्टि बनाई , अब इच्छा से संसार का बन तो पता चले इच्छा अच्छी या बुरी | - चेतावनी - 501
  • यह छोड़ , वह ग्रहण कर , सुनते-सुनते कान पक गए | सीधा रास्ता बता | सीधा हो जा रास्ता ही रास्ता है | - चेतना - 501
  • अंधेरा कहाँ ? दृष्टि पड़ी , प्रकाश ही प्रकाश | - भक्ति - 501
  • घूमकर देख , कौन प्रतीक्षा कर रहा है ? तुम कौन हो जो मेरे पीछे पड़े हो ? तुम्हारा सदगुरु | - भाव - 501
  • आघात प्रत्याघात ने ऐसी अवस्था बनाई नहीं तो यह नन्दन कानन था जहाँ आनन्द ही आनन्द था और है | - ज्ञान की चेतावनी - 501
  • अरे पूर्ण ! अपूर्ण की भावना ही क्यों ? यदि कृपा हो तो मुझे भी थोड़ा - सा स्थान दे देना | - ज्ञान की चेतावनी - 510
  • बन्द कर दाह की कथा तू खुदा का बन्दा है जो खुद राह बताता और खुद आता | - भाव - 510
  • वास , ना अभी वासना | - चेतना - 510
  • प्यार की नजरों ने दुनिया बदल दी | प्यार की ही दुनिया है | - भक्ति - 510
  • यह अंग अनंग के लिये नहीं | संग के लिये , सत्संग के लिये है | - चेतावनी - 510
  • मन को मनाना आसान भी कठिन भी | मन मनन में लगा , शान्त हुआ | कठिन तब , जब विकल हो भ्रमण करे | - भक्ति की चेतावनी - 510
  • भक्ति , मुक्ति नहीं चाहती | सामीप्य चाहती है , जो नाचता रहे , नचाता रहे | - भक्ति की चेतावनी - 511
  • दौलत में दो लत है | वासना बढ़ाना , सर पर सवार होना | - चेतावनी - 511
  • पीछा कर्त्ता , कब छिपा | - चेतना - 511
  • सोचता है करूँ या न करूँ | क्या ? प्यार | प्यार के बिना जीवन दुश्वार | - भक्ति - 511
  • गिन कर देखा , गुण कर देखा , कहाँ दिखलाई दिया | दिया जला , दिया जला किसी ने मन का विकार , अब सर्वत्र तू ही तू था और है | दिया जिला | - भाव - 511
  • पागल ! सब शून्य है - वायु है , पूर्ण तो तू है | - ज्ञान की चेतावनी - 511
  • शांति आनन्द की पूर्व अवस्था | भाव का प्रभाव अपूर्व था | - ज्ञान की चेतावनी - 512
  • आज मैं तुम्हे बतलाता हूँ , मैं किसका हूँ | उसी का जिसने मुझे दिल से चाहा और पाकर और कुछ न चाहा | - भाव - 512
  • अर्गल - कब बगल ? - चेतना - 512
  • प्राणों में प्रणय | रक्त दुग्ध बना | - भक्ति - 512
  • उत्तर में स्वर्ग यदि उत्तर ठीक हो | - चेतावनी - 512
  • शक्ति ( मानसिक ) से भक्ति मुक्ति ? युक्ति का प्रयोग सफल | - भक्ति की चेतावनी - 512
  • उषा , सूर्य का आगमन सूचित करती है - मधुर भाव प्रेम का | - भक्ति की चेतावनी - 513
  • रुष्ट न हो - कष्ट तो है ही जब तक सन्तुष्ट न हो | - चेतावनी - 513
  • पथ पथ्य चाहता है प्यार का | नहीं तो रोगी अनुरागी कब बनेगा ? - भक्ति - 513
  • महत्व पूर्ण क्या है ? पूर्णता में महत्व निहित है | - चेतना - 513
  • सिद्ध देखे , सन्त देखे किन्तु तुझसा न देखा | भाव से ही सृष्टि बदल देता है | तू कौन है ? तेरे प्राणों का साथी | - भाव - 513
  • शून्य कैसे गूँज उठा ? सोया हुआ जाग उठा | - ज्ञान की चेतावनी - 513
  • किसकी आवाज थी ? प्रेम की पुकार थी जिसने शून्य में हलचल मचा दी | - ज्ञान की चेतावनी - 514
  • प्राण पखेरू उड़ जाते हैं तो तू भी क्या अदृश्य हो जायेगा ? नहीं , किसी को पकड़ता नहीं , पकड़ता हूँ किसी को किसी की दया के बल पर तो छोड़ता नहीं | पकड़ने वाला , छोड़ बैठे , यह उसकी इच्छा | - भाव - 514
  • जगत के सम्मुख तुम्हें वरण किया है तुम्हे कैसे भूलूँ | - भक्ति - 514
  • मानसिक रुग्ण - गुण निर्गुण को क्या जाने ? - चेतना - 514
  • जीना चाहता है , जिलाना चाहता है । जीने पर कदम बढ़ा , शायद जिलाने वाला भी कहीं दिखलाई देगा | - चेतावनी - 514
  • झुका खोजता है | खड़ा , चढ़ा | पड़ा , लड़ा | - भक्ति की चेतावनी - 514
  • बोलता , बोलता चला | - भक्ति की चेतावनी - 515
  • ताना ( नाता ) बाना ( बाण , आदत ) से यह शरीर रूपी वस्त्र बना जिसे कबीर ( किसी वीर ) ने ही ज्यों की त्यों रखा | अन्य आये अन्न और वस्त्र की चिन्ता में मर मिटे | - चेतावनी - 515
  • नस-नस नाचती है | नाश का नशा है | - चेतना - 515
  • जिसे दूध में नहलाया और पिलाया वही भूल बैठा ? किन्तु मैं कैसे भूलूँ वह मेरा अंश है , उसी से मेरा वंश है | - भक्ति - 515
  • धोखा न देता हूँ और न खाता हूँ | दुनिया चाहे जो समझे | कृपा पात्र को धोखा कैसे ? खुद ही दे , खुद ही खाये | यहाँ धोखे का काम नहीं , नाम नहीं | - भाव - 515
  • शव शिव हुआ | लाश कैलाश बना जब शिव का भाव आया | - ज्ञान की चेतावनी - 515
  • प्रकाश का कण भी प्रकाश ही फैलाता है | पूर्ण प्रकाश तो पूर्णता का भाव उदय करता है | - ज्ञान की चेतावनी - 516
  • अब भी तेरा मेरा ? तेरा मेरा है तभी तो भजता हूँ तजता हूँ | - भक्ति - 516
  • पूजा पूज्य की या प्रतिमा की | पूज्य पुकारता है अनोखी वाणी से और प्रतिमा स्थूल सौन्दर्य का आकर्षण बनती है | - चेतना - 516
  • “ मेरे साथी “ नहीं- “ मेरा साथी “ | कौन है ? प्रश्न न कर , अनुभव कर प्राणों की व्याकुलता दूर होगी | - भाव - 516
  • वस्त्र मैला क्यों ? धो न सका विचार रूपी साबुन से | सा ( साफ ) बुन ( बुनता ) और रखता तो मैला शायद न होता | - चेतावनी - 516
  • परिछाई ( प्रतिमा प्रेम ) से व्याकुल , छाया तेरी ही थी | श्वान न बन , जल से न डर | - भक्ति की चेतावनी - 516
  • नृत्य की ताल पर बेहाल हो उठा ? अब सम्भाल अपने को , प्रभात हुआ | - चेतावनी - 517
  • तू इष्ट है , अनिष्ट कैसे देख सकता है अपने प्रिय का । - भाव - 517
  • बुलाता है - लजाता है | - चेतना - 517
  • तेरे रंग ने मेरा रंग ही भुला दिया | - भक्ति - 517
  • देख कर मूल्य अंकन करता है | मूल्य चुकाने में यदि मूल धन ही खो डाला तो वस्तु बड़ी महंगी पड़ी | - ज्ञान की चेतावनी - 517
  • चित्त चारों खाना चित्त हो जाये | अहंकार की हार हो तो सत् चित् , आनन्द में गोता लगाये | - भक्ति की चेतावनी - 517
  • अरे ओ उपदेशक ! चुप रह , क्यों बकवाद करता है ? शांति स्वयं को शांति दे शांत होने वाली है | यह भी तो उपदेश ही है | - ज्ञान की चेतावनी - 518
  • समुद्र ने कहा - मेरी गति ही तेरी गति | नदी ने कहा - गति नहीं , स्थिति ही मेरी स्थिति | - भक्ति - 518
  • अंधे का क्या धंधा ? - चेतना - 518
  • कोई मेरे दिल से पूछे कि मैं क्या चाहता हूँ ? सदा (आनन्द ध्वनि ) चाहता हूँ , दया चाहता हूँ | - भाव - 518
  • घर वर को देखने चला तो घर शरीर को ही देखता रहा और वर विषयों की प्रशंसा करने लगा | कन्या कुमारी ही रही , लौट रहा था पश्चाताप को साथ लेकर | - चेतावनी - 518
  • रंग ले रंगीले | प्राणों का प्रिय रंग ले | रग रग में राग रंग ले | फाग में सुहाग यही | - भक्ति की चेतावनी - 518
  • पिता का प्यार पी | माता का मोह पी | पी , ऐसा पी , प्यास न रहे , तलाश न रहे | - भक्ति की चेतावनी - 519
  • आज अपमान करता है अनजान में | जब जानेगा तो आँसुओं से पवित्र हो जायेगा हृदय ( बाहर भीतर ) बाहर वक्षस्थल भीतर कोमल हृदय | - चेतावनी - 519
  • बलवान भाग्य या बलदेव ? भाग्य का विधाता बलदेव | भाग्य था , सौभाग्य था , तभी तो बलदेव के दर्शन हुए | - भाव - 519
  • छुआ और मुआ | - चेतना - 519
  • नजरों में रह , कहीं जमाने की नजर न लग जाय | - भक्ति - 519
  • पाँचों का झगडा पंचों को दे | खुद मुद हो खुदा में समा | न वाह वाह न आह आह | - ज्ञान की चेतावनी - 519
  • याद में साध और स्वाद | - भक्ति - 521
  • भाव का बहाव जानें , तो भाव , अभाव को जानें | - चेतना - 521
  • आज साज सजा | अब कुछ ऐसा राग बजा कि राग द्वेष को भूल उस देश में प्रवेश करे प्राणी जहाँ अनुराग का राग आठो प्रहर बजता रहता है | - भाव - 521
  • विष से अमृत कर दे | विष को अमृत कर ले , शिव बन | जीव भाव है , तब तक विष अमृत | - ज्ञान की चेतावनी - 521
  • अवसर दिये अनेक | किन्तु तू ने सर न झुकाया , उठाया अभिमान से | क्या बार-बार अवसर मिलता है ? - चेतावनी - 521
  • हाथी सा शरीर | चींटी सी चेष्टा | हाथी पर हाथ मार | कर विचार , हो पार | - भक्ति की चेतावनी - 521
  • इतना दुर्बल क्यों बना ? सभी तुझे घबडा़ देते है ? दुर्बल न था वासना ने वह बाँस मारा कि हड्डी पसली बराबर | - चेतावनी - 531
  • पद चूम - मस्त झूम | - भक्ति की चेतावनी - 531
  • एक दीवानी थी और एक दीवाना | दीवानी थी पृथ्वी , दीवाना था प्रभु पुत्र | - भाव - 531
  • तप्त भावों ने उष्ण कर डाला , क्षेत्र को | शांति वाष्प बनी | आनन्द का अभाव प्रतीत हुआ | बाहर खोजने लगा | - चेतना - 531
  • तू मुझे सजा , कि मैं तुझे सजाऊँ ? - भक्ति - 531
  • ध्वनि का धनी | अब कहाँ कमी ? अब तार बेतार से लगा | अब क्यों कहता है तार , उद्धार कर | - ज्ञान की चेतावनी - 531
  • जड़ में गति पैदा कर दी - चेतन था | चेत न हुआ तो क्या चेतना ? - चेतना - 541
  • निन्दक तो आनन्दक है - बड़ाई कहाँ , बुराई ही बड़ाई | - भक्ति - 541
  • प्रसंग से संग हुआ संत का , सत्य का | इसे सौभाग्य कहूँ की विधि विधान ? विधि एक , विधान अनेक | - भाव - 541
  • एक ही स्थिर है , शाश्वत है अन्य चलायमान , चञ्चल और क्षुब्ध | - ज्ञान की चेतावनी - 541
  • समझा मन को ये चंचलता तुझे शोभा नहीं देती | मन न माने तो समझ बेचारी क्या करे ? - चेतावनी - 541
  • विकार और संहार में ही कथा समाप्त और कही भी तो लीला | - भक्ति की चेतावनी - 541
  • सरलता है धोखा नहीं | अति सरल भ्रम की सृष्टि क्यों करें ? - भक्ति की चेतावनी - 551
  • मन को मलीदा न समझ | मल का विवेचन प्रथम सोपान | पान कर अमृत प्रवचन | - चेतावनी - 551
  • दुनिया तू मक्खी | मैं झक्खी | तू चिन्ता के द्वारा खून चूसने में लगी है और मै ज्ञान , ध्यान की बाते बघारने में लगा हूँ | विजय तेरी होती है , मेरी कौन सुनता है ? - भाव - 551
  • ग्रन्थ तो रचा , अब ग्रन्थी प्रेम की हो तो आनंद आये | - ज्ञान की चेतावनी - 551
  • इस माला का क्या करूँ ? स्वयं को वर | माला गले में ही रहे | - चेतना - 551
  • बिन्दु का विराट रूप सिन्धु | भक्त का विराट रूप भगवान | - भक्ति - 551
  • अपूर्ण सम्पूर्ण चाहता है आनन्द भाव | बाधक मन , साधक मन | पूर्ण क्यों अपूर्ण बन बैठा ? - ज्ञान की चेतावनी - 561
  • मुझे तो कुछ कहना था , तुम्हारी बातें कहीं तो शास्त्र बन गया | - भक्ति - 561
  • देव - दे कुछ ऐसी भावना की तेरा ही बन कर रहूँ | रहूँ तेरे चरणों में , दिल दिमाग में तेरी तस्वीर , तेरे जैसे विचार रहे | - भाव - 561
  • ग्रहण में ही सुख दुःख माना | सभी तो मान्यता है | - चेतना - 561
  • भीत क्यों ? भीतर तेरा मीत पुकार रहा है | सुन और गुन | - चेतावनी - 561
  • दिल से देख खिल उठेगा विश्व | प्रेम पराग मोह लेगा संसार को | - भक्ति की चेतावनी - 561
  • मन मलीन तो मन लीन कैसे हो ? - भक्ति की चेतावनी - 571
  • नब्ज बन्द | लब्ज बन्द | सब्ज बाग यहीं रह गया | - चेतावनी - 571
  • सत्य को क्यों उस्तरे की धार कहते हैं ? सत्य पर चलना कैसा समाना है ? धार काटती नहीं , पार करती है विचारों के सागर से | - ज्ञान की चेतावनी - 571
  • कलम ली नहीं , कलम दी उसी ने और कहा उदास क्यों ? गति ही स्थिति बनेगी | - चेतना - 571
  • सार्थक कहते - कहते थक चली वाणी - यह वाणी कब सार्थक होगी ? वाणी होगी सार्थक थक मत | हिम्मत न हार , हार कर थक जायेगी यह दुनिया और गूँजती रहेगी तेरी वाणी | - भाव - 571
  • सत्य की आवाज इन तक पहुँच न जाय - पहले ही ग्रंथ , प्रार्थना के रूप में चिल्लाते हैं | युधिष्ठिर का अर्ध्द सत्य भी द्रोणाचार्य के कानों में कब पड़ा , मारा ही न गया | - भक्ति - 571
  • मृत के लिए अमृत ? यही तो दया | - भक्ति - 581
  • हाँ कहूँ तो अर्द्धांग , ना कहूँ तो अंधकार | पूर्ण में हाँ ना कहाँ ? - चेतना - 581
  • मुझे देख मैं महा मंडलेश्वर साधु हूँ , मुझे देख मैं विश्व महा कवि , मैं प्रसिद्ध चित्रकार , मैं क्या कहूँ की मैं क्या हूँ - मैं तो तेरा ही हूँ | - भाव - 581
  • मन का दुःख जब तन पर आया तो पाप कहने लगा | कभी मन शांत हुआ ? यदि नहीं तो दुःख भी होगा , पाप भी होगा | - ज्ञान की चेतावनी - 581
  • याद भली भी , बुरी भी | एक याद दिल तड़फाये , एक याद प्रिय से मिलाये | - चेतावनी - 581
  • प्राणों में नव प्राण जागृत जब वाणी प्रवाहित हुई | - भक्ति की चेतावनी - 581
  • करूणावश सिद्धि का अभाव न ले | शांति बरसा कि दुःख दरिद्र का भाव न रहे | - भक्ति की चेतावनी - 591
  • प्रति मुहूर्त की धड़कन बेचैन करती है दिल को | क्यों ? मिला नहीं , जिसके लिए धड़कन थी | - चेतावनी - 591
  • सती का पति कौन ? सत्य | और यह जिसे समाज पति कहता है ? शरीर का साथी है , प्राणों का नहीं | - भाव - 591
  • अपराध यही की आशा पूर्ण न हुई | पूर्ण की आशा भी पूर्ण | यदि मान बैठा अपूर्ण तो घट खाली ही रहेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 591
  • तुम्हारा अभिमान मुझसे सहा नहीं जाता और तुम्हारा वियोग भी | रूठो नहीं , हालत पर तरस खाओ | - भक्ति - 591
  • पूर्ण में अपूर्ण और पूर्ण दोनों | स्थिति हुई , पूर्णता ही पूर्णता है | - चेतना - 591
  • तेल की एक बूंद ने जल में रंग बिरंगी दुनिया दिखलाई | - चेतना - 601
  • देखने वाले की पूर्व अवस्था श्रोता की थी | कर्त्तव्य देखेगा कि सुनता ही रहेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 601
  • मन अन्दर तो मन्दिर | नहीं - नाच रहा मन बन्दर | - भक्ति - 601
  • दिया है दिल जिसकी कद्र नहीं | लिया है वह भाव जो भद्र नहीं | - चेतावनी - 601
  • अरे भाग्यवान भगवान बन कि दृष्टि-सृष्टि का आनंद आये | - भक्ति की चेतावनी - 601
  • किसी ने कहा - यह तन शैतान है | किसी ने कहा - यह मन परेशान करता है | सोच कौन बाधक है और कौन साधक ? बातों में न आ , खुद देख | जब तू मेरा तो पाप पुण्य भी मेरा | - भक्ति की चेतावनी - 610
  • प्यार वाले से प्यार क्यों नहीं लेता ? घृणा क्यों , अविश्वास क्यों ? समझ शान्ति नहीं पा सकेगा | - चेतावनी - 610
  • स्मृति से दर्श के लिये व्याकुल | फिर स्पर्श के लिये छटपटाने लगा | अब स्मरण कर किसमें रमण करना है , स्थूल में या सूक्ष्म में ? - चेतना - 610
  • एक भूल ने शिव से जीव बनाया , फिर भूला तो चेतन से जड़ ही हो जायेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 610
  • अँधेर देर के गीत लोग गाते है | शाम सबेरे तेरे गीत गाते तो जान पाते कि कैसा अदभुत खेल है | - भक्ति - 610
  • रट कर याद किया संसार का व्यवहार | तेरा प्यार तो भुला देता है व्यवहार | - भक्ति - 611
  • बन ठन के चली माया | अरी पगली दुनिया तो यों ही भ्रम में पडी है | तेरा बन ठन तो और भी कहर बरसायेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 611
  • भज कर क्या लूँगा ? तज कर क्या पाऊँगा ? दिल से पूछ | भजा तो आया मजा | तजा तो हुआ मन का राजा | - चेतना - 611
  • एक बात मान | किसी को मान | प्यार कर लोग उसे भक्ति कहेंगे | तेरा प्यार का संसार जगमगा उठेगा | - चेतावनी - 611
  • घर झाड़ा तो बाहर ही घर बना | छोटा घर बड़ा बना | मैं विराट तो तू क्षुद्र कैसे ? - भक्ति की चेतावनी - 611
  • प्रतीक्षा किसे सताती है जो योग में ही अंत समझता हो | अनन्त की प्रतीक्षा और योग अनन्त | - भक्ति की चेतावनी - 612
  • मिट्टी में सोना खोजा , सागर में मोती | कभी दिल भी खोजा ? देखता रहा , सुख दुःख का खेल | दिल में राहत मिलती यदि दिलदार को दिल में खोजता | - चेतावनी - 612
  • एक पंक्ति में कह | एक पंक्ति में रह | - चेतना - 612
  • एक और बढ़ा जा रहा है आकाश की ओर | दूसरी ओर गिरा जा रहा है वस्तुओं की ओर | ऐसा क्यों ? जीवन पहाड़ी मार्ग है | - ज्ञान की चेतावनी - 612
  • भाषा की परिभाषा | प्रेम की परिभाषा कहाँ ? कहने वाला ही पागल | - भक्ति - 612
  • दोष तुम्हारा या मेरा | अपराध तुम्हारा या मेरा | प्रेम में दोष अपराध को स्थान कहाँ ? - भक्ति - 613
  • मुँह रंगा भी बांग देता है | मुर्गा है , काल खा जायेगा | जगायेगा किसे जो स्वयं काल का कौर है | - ज्ञान की चेतावनी - 613
  • भाव आये | एक ने कहा - मैं तेरा काल हूँ | दूसरे ने कहा - मैं तेरा जाल हूँ | तीसरे ने कहा - मैं तेरा माल हूँ | चौथे ने कहा - मैं तेरी ढाल हूँ | काल , जाल , माल आफत | ढाल रखवाली करे | - चेतना - 613
  • मुक्त गगन , मुक्त वायु , फिर प्राणी क्यों बद्ध ? प्राणी प्रण भूल बैठा , बद्धता विचारों की | आज भी मुक्त यदि अनुभव करे | - चेतावनी - 613
  • मानव तन में वियोग माना तो मानव तन व्याकुल हुआ | संयोग तो सम योग से होता है | - भक्ति की चेतावनी - 613
  • कल्पना के घोड़े दौड़ाने वाला - चुप क्यों होता ? वह तो गाता गया , चिल्लाता गया | कोई सुने या न सुने | - भक्ति की चेतावनी - 614
  • नील गगन में पंछी उड़ते मनमाना सुख पाते | तू क्यों उदास ? मन ने न माना सुख , फिर दुःख ही साथी बना | . - चेतावनी - 614
  • साथी का संग चाहिये | मन का रंग चाहिये | पीने को भंग चाहिये | लड़ने को जंग चाहिये किन्तु रह गया दंग जब स्वार्थ का खेल देखा | - चेतना - 614
  • प्रकाश ही यदि अभिमान बन जाये तो शांति कहाँ ? - ज्ञान की चेतावनी - 614
  • कहते हैं तुमने राधा के चरणों में अपना व्यक्तित्व न्यौछावर कर दिया | इसे क्या कहें प्रेम या समर्पण ? - भक्ति - 614
  • आज भी जान न पाया - प्रेम बड़ा की प्रेमी | ऐसा भ्रम क्यों ? प्रेम की छाया जिस पर पड़ी , प्रेमी हो गया | - भक्ति - 615
  • दम घुटता है सीमा में | महान अपने को प्रकृति वश क्षुद्र समझ बैठे तो शांति कहाँ ? - ज्ञान की चेतावनी - 615
  • समझाने आया तो समझ में आया | समझ थी , फिर भी नासमझ बना घूमता था | - चेतना - 615
  • जल कर शीतल , श्वेत हुआ किन्तु कालिमा न मिटा सका , क्या सार्थकता रही जीवन की ? भूल करते हो , मैं जला अन्य के लिए | क्यों इसमें सार्थकता नहीं ? - चेतावनी - 615
  • प्रीती में प्रीतम बसता , फिर क्यों तरसता है ? - भक्ति की चेतावनी - 615
  • सूत्र नहीं ये पुष्प हैं , जो सूत्र में बिंधे हैं | भ्रमर मन अघाता नहीं इन से | - भक्ति की चेतावनी - 616
  • पर से प्रीती , स्वयं को भूला , वाह रे तेरे खेल ? - चेतावनी - 616
  • असंग का संग न किया | रंग बदरंग हो गया | - चेतना - 616
  • तुमको माने तो दुनिया के ताने सुने | न माने तो मन घबड़ाये | अब क्या हो ? - भक्ति - 616
  • रूप के पुजारी ! कल्पना छोड़ | स्वरुप को देख , विश्व की सम्पूर्णता तुझमें निवास कर रही है | - ज्ञान की चेतावनी - 616
  • कल्पना का आंशिक रूप , पत्थर मिट्टी को मिलाकर भवन मूर्ति को दिया , लोग प्रशंसा करने लगे | यदि तेरी कल्पना को कल्पना के सहारे भी समझ पाये तो उस आनन्द का क्या कहना ? - ज्ञान की चेतावनी - 617
  • लहरों के साथ जीवन नौका चली | ( इसे ) कूल किनारा मिलेगा या चक्कर काटती ही रहेगी | - भक्ति - 617
  • दुनिया बसाई आनन्द के लिये न कि पाप पुण्य के लिये | अबोध चिल्लाता है | बुद्ध - शुद्ध बुद्ध आनन्द वितरण करता | - चेतना - 617
  • यन्त्र तो आज मन्त्र तन्त्र बन रहा है | सन्त्रस्त संसार को शान्ति कहाँ ? यन्त्र शरीर , मन्त्र प्रिय का नाम | फिर निर्भय ही निर्भय है | - चेतावनी - 617
  • किसने कहा कि बन्धन कैसे छूटे ? दिल की पकड़ सब बन्धन ढीले ही नहीं कर देती , प्रेम बन्धन में बाँध भी देती है | - भक्ति की चेतावनी - 617
  • ज्ञान , भक्ति के गीत कैसे ? ‘ मिलन ‘ के प्रकृति गीत गाती | सुनो , आनन्द की वर्षा हो रही है | - भक्ति की चेतावनी - 618
  • प्राणी व्याकुल तू कि मैं ? मैं व्याकुल , क्योंकि तू समझ न पाया | तेरा हाल तू ही जानता है | - चेतावनी - 618
  • जिसे कुछ दिया वही गुब्बारा बन बैठा | यह नहीं जानता कि यह हवा का खेल है | हवा नहीं , गुब्बारा गुब्बारा नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 618
  • मेरी परिभाषा मैं जानता हूँ | त्याग तप वाले ऋषी कहलाये | बच्चे भक्त | अन्य अन्न की बातें करते हैं | - चेतना - 618
  • शांत और अशांत लहरें क्या जानें की अवलम्बित की क्या दशा होती है ? - भक्ति - 618
  • चार ने प्रशंसा की आठ ने निन्दा | तुमने कहा दोनों से बचो | मन व्याकुल था | - भक्ति - 619
  • स्वतंत्र कब ? जब ‘ स्व ‘ तन्त्र को जानें और मानें | - चेतना - 619
  • कैसा सृष्टि क्रम है पहले रोओ फिर सोओ | स्वस्थ होता तो सोता , रोता क्यों ? - ज्ञान की चेतावनी - 619
  • अग्नि तुझे बुलाये - पतंगे सँभल , जल न जाये तेरी काया माया | - चेतावनी - 619
  • भय न कर , बाधा मन की | मन मिला , दिल खिला | - भक्ति की चेतावनी - 619
  • धर्म एक मान्यता है | एक को माने , सब धर्मों का समन्वय हुआ | - भक्ति की चेतावनी - 621
  • गंगा का अवतरण हुआ | तुझे तो आकाश पाताल को पवित्र करना है वाणी से | - चेतावनी - 621
  • शरीर की जलन ने शीतलता को अपनाया | अभी मन की जलन का खेल देख , उष्णता शीतलता में बदले और शीतलता उष्णता में | यही मन के खेल हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 621
  • दर्द के बाद आया | दर्द के बाद चला | दर्द यहीं रहा , मैं भी चला - आनन्द आनन्द | - चेतना - 621
  • ध्वनि आनन्दमयी | प्रिय की ध्वनि आनन्द आनन्द | - भक्ति - 621
  • अभिनय करते-करते - एक दिन यथार्थ वैसा ही बन गया यह भी साधना ही थी | - भक्ति - 631
  • वह स्पर्श किस काम का जो पवित्र को भी अपवित्र बनाये | - चेतना - 631
  • सूर्य ने कहा - उपासना कर बुद्धि दूँगा | चन्द्र ने कहा - ऐसा शीतल मन दूँगा कि तेरा जीवन सफल | संध्या ने कहा - जब तक मिलन न हो , आवागमन से मुक्त न हो सकेगा | मन मिलन का इच्छुक था | - ज्ञान की चेतावनी - 631
  • अंधी श्रद्धा , अंधा विश्वास ? ओ आँख वाले देख , आज अंधे का चमत्कार देख | अंधे ने वे आँखे पाई , जो आँख वाला न पा सका | - चेतावनी - 631
  • दाता भिखारी ? प्यार ऐसा ही है | - भक्ति की चेतावनी - 631
  • गई इज्जत - मैं मरा | ज़रा सोच - गई इज्जत मैं मरा | - भक्ति की चेतावनी - 641
  • दिल द्वार पर भक्त है | दिलदार भक्त है , प्रेम पाहुना भक्त है , दिल के तख़्त पर भक्त है | अब भी वख्त है | दिल यदि सख्त है तो क्यों बहाता रक्त है ? - चेतावनी - 641
  • उठ शव , आज उत्सव है | चिर निद्रा शयन नहीं , समाधी नहीं , बरबादी है | - ज्ञान की चेतावनी - 641
  • वायु की बातें प्रलाप कहलाती हैं , आलाप नहीं | - भक्ति - 641
  • उपकारी की ऐसी अवस्था ? पीसा गया चक्की में , जलाया गया आग में , फिर भी अंग अंग में व्याप्त हो गया | ( अन्न ) रस की सृष्टि की | - चेतना - 641
  • ज्ञान के अभिमानी पति ने कहा - काम , क्रोध को शत्रु मानों या मित्र , एक ही बात है | संत के पुजारी ने कहा - फिर क्यों वेद पुराण साधु आदि इन्हें बुरा कहते हैं ? - चेतना - 651
  • भय दुनिया का या प्रिय का ? दुनिया रूठे , प्रिय रूठा तो जग झूठा | - भक्ति - 651
  • खेलने के लिये भेजा था तो अब दिल खोलकर खेलने दे | शमन , दमन के गीत तू पहले भी सुना सकता था | बुरा क्यों मानता है ? दिल दिमाग बचा कर खेल | - ज्ञान की चेतावनी - 651
  • अभिमान करके देखा ? मान भी न रहा , गति कहाँ , दुर्गति ही मिली | अब भी समझ | - चेतावनी - 651
  • युगों तक बातें सुनी , फल ? बातें बनाने लगा | स्थिति तो तब न होती जब केवल बातें न होतीं | - भक्ति की चेतावनी - 651
  • कौतुकी सृष्टि में कुछ सिद्धियाँ देखी , फूल कर कुप्पा हो गया | जानता नहीं ? यहाँ कौतुक ही कौतुक है | - भक्ति की चेतावनी - 661
  • दोष गुण क्यों देखता है ? कुछ दोष है तभी तो आया है | गुण , सगुण निर्गुण में | - चेतावनी - 661
  • आँख में है साख | - भक्ति - 661
  • मन मानें तो मान | नहीं तो कैसा मान , कैसा अभिमान ? - चेतना - 661
  • सर्वत्र ही स्व है यही सर्वस्व है | विराट सम्राट अन्यत्र तो अभाव का प्रभाव फैल रहा है | - ज्ञान की चेतावनी - 661
  • भव में भिक्षुक , भाग्यवान , भक्त , भगवान की कोई जाति नहीं | फिर यह शोरगुल कैसा ? - चेतना - 671
  • तेरी दुनिया के प्राणी बेचैन क्यों ? बेचैनी उनकी नहीं , मिथ्या व्यवहार कष्टप्रद है | - ज्ञान की चेतावनी - 671
  • कष्ट में पड़ा प्राणी , कष्ट की बातें करता है | तुम्हारी बातें कब करता है | - भक्ति - 671
  • सुगन्ध में सना फिर भी दुर्गन्ध का उपासक | दूर हो गन्ध से दुर्गन्ध से | - चेतावनी - 671
  • बातें ही प्रिय हैं | अवस्था होती तो बातें न होतीं , आनन्द ही आनन्द होता | - भक्ति की चेतावनी - 671
  • कमा नहीं पाता कामना को तो क्या कमाया ? - भक्ति की चेतावनी - 681
  • रथ पर थर - थर काँप रहा था | क्यों ? वाहक का पता नहीं | लक्ष्य का पता नहीं | कम्पन था बेचैनी का | - चेतावनी - 681
  • रटना क्यों ? रसना की रचना हुई रटने के लिये , रस लेने के लिये | - ज्ञान की चेतावनी - 681
  • भाव स्वछन्द | तम और मत में तेरी पहचान कृपा ही करवाती है | - भक्ति - 681
  • मद तो तब न होता जब तू मेरा होता ? अब कैसा मद , जहाँ पद पद पर भय ? - चेतना - 681
  • भैरव से भी भयानक भय रव् है | अभय नाम प्रभु का जो भव भय से मुक्त करता है | - ज्ञान की चेतावनी - 691
  • धरा ने धारा अनेक रूप तो आधार भूल बैठी | अधीर हो प्राणी चिल्ला उठा - अधर अधर इधर इधर | - चेतना - 691
  • विद्वानों ने विद्या खोजी , धनियों ने धन , प्रेमियों ने प्रेम और भक्तों ने भक्ति , किन्तु तुमने क्या खोजा ? केवल दुःख , खोज निरर्थक , जीवन निरर्थक | - चेतावनी - 691
  • जन्म मरण शरीर का | तू तो मेरा है | तेरा जन्म मरण कैसा ? कार्य वश आया | आज वियोग असह्य| - भक्ति - 691
  • देखता है , क्या ? अभी दिल नहीं भरा ? भूल बैठेगा रास्ता | फिर ? फिर ये धर्मवाले , बाँधेंगे कण्ठी में , माला में , जाप में | - भक्ति की चेतावनी - 691
  • मिल न आज मिलन घड़ी , शुभ घड़ी | - भक्ति की चेतावनी - 701
  • हो न हार , हो , न हार | तुम हो न , हार कैसी ? यही होन हार | - भक्ति - 701
  • समुद्र के तट पर आकर भी तटस्थ ? अवगाहन के आनन्द से वंचित ही रहा | - चेतावनी - 701
  • मृत्यु तू भी बड़ी भयभीत करने वाली मूर्ति है | मृत को अमृत पिलाने वाला प्रभु क्या करे जब मृत्यु ही मृत्यु की पुकार कानों में गूँज रही है | - ज्ञान की चेतावनी - 701
  • अंतर देखनेवाला भी अंतर देखेगा तो अंतर का अंत कहाँ ? अंत प्रेम में , जहाँ अन्तर नहीं , डूब कर ही तरना है | - चेतना - 701
  • बुद्धिवालो ने भगवान बनाया भी बिगाड़ा भी | दिल-वालों ने तो उसे दिल से चाहा | न बनाया न बिगाड़ा | - चेतना - 710
  • दंग रह गया माया का खेल देख कर , तंग आ गया दुनिया से , जंग विचारों का और संग में कौन ? ज्ञान नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 710
  • तम ही उत्तम तो पुरुषोत्तम की वार्ता ही व्यर्थ | अर्थ का भी अर्थ जानता तो सार्थक होता जीवन | - चेतावनी - 710
  • आज तैने दिल की कली खिलाई , सर्वत्र तेरा ही दर्शन है | - भक्ति - 710
  • प्रार्थना - प्रथम में ना कहूँ तो प्रार्थना प्रारम्भ | ऐसा क्यों ? प्रेम के लिये या अर्थ के लिये - यह प्रार्थना | - भक्ति की चेतावनी - 710
  • पाप की कथा कह कर समय बरबाद न कर | यदि कथा से ही प्रेम - तो प्रेम की कह | भले मानुष कह कर क्या पायेगा ? कर कि जीवन ही बदल जाये | - भक्ति की चेतावनी - 711
  • मन्दिर की ओर चला | चारों दिशा में तेरा धाम | मैं न नीचे न ऊपर | - भक्ति - 711
  • काया क्षीण की किसके लिए ? मन नीरस किया किसके लिए ? काम शांत होगा ? शांत ? शांत तब होगा जब शान्ताकारं मिले , इन्हें साधना समझ भटकते रहो | - चेतावनी - 711
  • प्राणी क्षुद्र वाणी अशुद्ध | प्राणी महान , वाणी प्रधान युगों तक | - ज्ञान की चेतावनी - 711
  • आज चोरों की कथा सुनी आश्रम में | छः चोर तो पहले से ही मानते आये | अब क्या इनकी भी वृद्धि हुई है ? - चेतना - 711
  • आश्रम में चोर बसते हैं , कोई दिल चोर , कोई धन चोर | चुराते हैं और माँ को दिखलाते हैं | माँ हँसती है | बच्चों के खेल ही तो हैं | - चेतना - 712
  • किसे उपदेश देगा ? देश को पहचान | उपदेश सफल | - ज्ञान की चेतावनी - 712
  • भ्रमण करने आया था रमण में लगा | चरण पकड़ कर कह न सका मैं तेरा हूँ | - चेतावनी - 712
  • प्रभो ! आनन्द का दान किसे मिला ? जो आनन्द के लिये आया और आनन्द में ही समाया | - भक्ति - 712
  • पौंडीचेरी में ऐसा कमल खिला कि प्रेम चेरी हो गई | पौंड की चेरी तो कैसी पौंडी चेरी ? - भक्ति की चेतावनी - 712
  • बेचैन को चैन कहाँ ? गले की चेन ने ही बाँध रखा है , फिर दिल की चेन तो खींचनेवाला ही जानें | - भक्ति की चेतावनी - 713
  • तुम मेरा न हार ग्रहण करते हो न भार | अब क्या करूँ ? प्रश्न उत्तर दोनों समान | - भक्ति - 713
  • ग्रास पर ग्रास फिर भी उदास ? तेरी क्षुधा कब शांत | - चेतावनी - 713
  • प्यार तुच्छ नहीं , व्यवहार तुच्छ नहीं , तुच्छ की भावना ही तुच्छ | - ज्ञान की चेतावनी - 713
  • माँ का बच्चा बचा | माँ का बच्चा सच्चा | सत्य की भी माँ होगी न ? नहीं तो आया कहाँ से ? - चेतना - 713
  • सोच समझ कर लिख | शोक गत हुआ , समझ हैरान कि क्या लिखूँ ? - चेतना - 714
  • रंग विरंगे देखे दृश्य तृप्ति कहाँ ? जहाँ तृप्ति थी वहीं समाप्ति थी | - ज्ञान की चेतावनी - 714
  • सोना , खोना और रोना में जीवन देखा | अब क्या होना ? अब रोना और सदा के लिए सोना ही अवशेष रहा | अब शेष अवशेष | - चेतावनी - 714
  • कहा कृष्ण से रथ चलाओ | कहा कृष्ण ने सारथी तो बनाया , स्वार्थी न बन जाओ | - भक्ति की चेतावनी - 714
  • रज दे तेरे चरणों की , धीरज बंधे | - भक्ति - 714
  • तंग आकर कहा - अब संग कब होगा ? सत्संग कब होगा ? - भक्ति - 715
  • प्रेमी देखे , प्रेमिकायें देखीं | प्रेम न पाया आनन में , हृद कानन में | कैसे प्रेमी ? प्रेम ही जिनका जीवन मरण है | वे ही प्रेम में रमण करते हैं | - भक्ति की चेतावनी - 715
  • चक्र गति है | आगे बढ़ना ही उसका काम | आराम से क्या काम ? फिर बेचैनी क्यों ? अनजान देश मेहमान दो दिन का | - चेतावनी - 715
  • दुनिया रंग रंगीली जब रोने से मुक्त हो | रंग तेरे हृदय में , रंग मंच तेरा हृदय , अभिनय तेरे मनोभाव , अब क्रन्दन कैसा ? - ज्ञान की चेतावनी - 715
  • खता हुई कि लिखता ही रहा | लेखा और जोखा तो लिखना सार्थक | - चेतना - 715
  • जहाँ गया , वहाँ थी प्रेम की , आनन्द की और भावों का समुद्र लहरा रहा था | - चेतना - 716
  • कुन्दन के लिये क्रन्दन , मदन सदन के लिये बन्धन फिर मुक्त कब ? मुक्ति कहाँ , उन्मुक्त था जब इन से उन से मुक्त होता | - ज्ञान की चेतावनी - 716
  • वायु का गोला नाभी में , हृदय में | गोला छूटा , पिण्ड छूटा | मौत कह कर भयभीत क्यों ? - चेतावनी - 716
  • प्रेम तुझ में , प्रेम मुझ में | जगा प्रेम समुद्र कि सीमा न रहे | पाँचों ( समुद्र ) एक में ही रम जायँ | - भक्ति की चेतावनी - 716
  • रात की रानी खिली रात में | दिल मणि ने खिलाया कमल | तुम्हारा भान , मान , ज्ञान अनादि काल से प्रस्फुटित कर रहा है भक्त हृदय को | - भक्ति - 716
  • कब और अब में झगड़ा था | अब कहता था कब की बात छोड़ अब , अभी अब प्रत्यक्ष हो कि शान्ति मिले | - भक्ति - 717
  • गम भीड़ पडी़ तो गंभीर हो गया | भाग्य को कोसना क्यों ? भाग्य जागे , प्रभु आगे , उद्यम आगे | दम रहते उद्यम कर , मिलेगा , जो मिलने वाला है , मिलाने वाला है | - चेतावनी - 717
  • युग कहता है यज्ञ कर , योग कर युगल भावना का | विज्ञ संकल्प विकल्प का समन्वय कर आनंद उपभोग करते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 717
  • पय सा मीठा पैसा | पैसा शांति न दे सका तो कैसा पैसा ? - चेतना - 717
  • सजा कर लाया है दिल ? फूल तो प्रकृति ने ही सजाये | हाथ की सफाई से कहीं दिल खिलता है ? - भक्ति की चेतावनी - 717
  • कहता था मैं तेरा हूँ | अब कहता है मैं मेरा हूँ | स्वार्थी ! तो तू स्वार्थ के लिये आया था , परमार्थ के लिये नहीं ? अब चलते चलाते क्यों पश्चाताप ? - भक्ति की चेतावनी - 718
  • रे मन रमण कर , नमन कर | न मन तो क्यों आया ? - चेतना - 718
  • आज की समस्या कल भी थी | सम विषम का फल मुख्य नहीं | मुख्य मोक्ष है , जो तेरे समीप भी , दूर भी | - ज्ञान की चेतावनी - 718
  • सृष्टि कर्ता ने सृष्टि बनाई , मैं भी कुछ बनाऊँ | बनाना बुरा नहीं , फँस जाना बुरा | बनायेगा क्या ? तू भी अपने दिल के हौसले पूरे अधूरे कर गुजर | - चेतावनी - 718
  • भेद का वेद रहा कहाँ जब अन्तःकरण में प्रियतम की छवि अंकित हुई | - भक्ति - 718
  • (घूँघट) जब तक घूँघट था घट था , घूम-घूम कर घट में प्रवेश करता था किन्तु घूँघट खुला घट में ही प्रियतम को पाया | - भक्ति - 719
  • ममता समता में बदल जाती तो अनेक जन्म ही न लेने पड़ते | आज बेचैन ? कल क्यों न सोचा ? - चेतावनी - 719
  • राहत है राह में , यदि राह सच्ची हो | कयामत है इन आँखों में जहाँ विषयों का विष हो | - ज्ञान की चेतावनी - 719
  • भ्रमर तितली की होड़ थी | भ्रमर गूँज रहा था | तितली शांत रसपान में लगी थी | - चेतना - 719
  • पत्थर पर न सो | पत्र पर न सो | यह तो मेरा प्रथम और अन्तिम शयन स्थान है | ( पत्थर - मूर्ती , पत्र - कमल पत्र - बाल मुकुन्द ) - भक्ति की चेतावनी - 719
  • अनोखी वही जो देखी नहीं , सुनी नहीं , कल्पना में आई नहीं | आज देख दिल को , कैसा अनोखा बैठा है , जिसे तू भूले वह तब भी तुझे याद करता , प्यार करता , क्योंकि उसका प्यार अनोखा , काम अनोखा | - भक्ति की चेतावनी - 721
  • भ्रमर ने तितली से कहा - रूपवती तो शांत नहीं होगी , चंचलता ही धन होता है उनका | तितली ने कहा - यह भी अनोखा खेल है कि काले कलूटे भी चिल्ला कर कहना चाहते हैं कि हम भी रसपान करते हैं | - चेतना - 721
  • जीर्ण शीर्ण भावनाएँ प्रकाश का विकास कब कर सकीं ? भस्मी भीमकाय बनीं , प्रकाश का दम घुट रहा है | - ज्ञान की चेतावनी - 721
  • जीवन की घड़ी जब चली तो धड़कन होने लगी | अरे भाई , धड़कन ही जीवन है | - चेतावनी - 721
  • प्यार के रंग में साड़ी रंगी - भूल गई कौन सा रंग था ? - भक्ति - 721
  • निष्कर्मा बन | कर्ता ने प्रेम पाठ पढ़ाया , कर्म , अकर्म , निष्कर्म का पाठ भुलाया | प्रेम ही निष्कर्म , धर्म का मर्म | - चेतावनी - 731
  • नाम ले कर काम बनाने वाले तो बहुत देखे | नाम पर मरने वाले का नाम कैसे भुलाया जाय | - भक्ति - 731
  • प्यार की भी परीक्षा हुई पृथ्वी काँप उठी | आज वह प्यार कहाँ अदृश्य हो गया ? - ज्ञान की चेतावनी - 731
  • राम मरा नहीं , आज भी अमर है भक्त के लिये | कृष्ण का आकर्षण गया कहाँ ? आज भी बातें नचा देती हैं मधुर कल्पना को | - चेतना - 731
  • खुशामद मनुष्य की नहीं | खुश हो तो आमद हो आनन्द की | - भक्ति की चेतावनी - 731
  • मेहरी कहता है ? मैं हरि | मैं मेहरी उनकी जो हरि को जानें , हरि को मानें | - भक्ति की चेतावनी - 741
  • यह कैसा खेल है ? अंगुली पकड़ते-पकड़ते करने लगा अंगुली | - चेतना - 741
  • मिथ्या किसे मानूँ , जगत को , भगत को या अपने को ? मिथ्या है मिथ्याचरण वालों के लिए | सत्यानुरागी , सत्य और अनुराग में ही रहता है | मिथ्या सत्य के झगडे में नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 741
  • पल सफल जहाँ अमरता है | पल विफल जहाँ मरता है (विषयों पर ) | - चेतावनी - 741
  • रुला कर हँसाने में क्या मिला ? हँस कर उड़ा देता | अब रो कर पिघला दिया जन्म जन्मान्तर का अभाव | - भक्ति - 741
  • लता लिपटी , वृक्ष घबड़ाया | तुम विराट वट हो , अनेक शाखा प्रशाखा फैले , लिपटे किन्तु तुम प्रसन्न शांत | उव्दिग्नता कैसे | - भक्ति - 751
  • क्यों उन्हें देखा जो भोग की अग्नि में जल रहे हैं ? योग की अग्नि प्रज्वलित होती तो भोग की ज्वाला शान्त होती | - चेतावनी - 751
  • प्रकृति के अनुसार आकृति तो ठीक किन्तु विकृति क्यों ? प्रकृति स्वयं परिवर्त्तनशील , इसीलिये परिवर्त्तन से निष्कृति नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 751
  • किसने कहा पुरुष नहीं बदलते - बदलते हैं | वे पुरुष नहीं , सत पुरुष नहीं , प्रकृति के दास हैं स्वामी नहीं | - चेतना - 751
  • कल की बात आज न रही ( नर ही तो है ) न रही न रही तो आज की बात कल रहेगी ? यह कैसे हो ? - भक्ति की चेतावनी - 751
  • पागल सा बैठा है , पाकर या खोकर ( दिल ) ? - भक्ति की चेतावनी - 761
  • खेल कर खो दी आयु | कैसा खेल था जिसमें खो दिया सब कुछ और पाया नहीं कुछ भी | - चेतना - 761
  • चर्म का भाव दूर राधा का दर्शन | कृष्ण रंग तेरी नसों में | लाल रक्त नहीं , मांगलिक आनन्द चिन्ह है . खोज , सभी रंग तेरी नसों में है , फिर भी बेचैन , यही आश्चर्य है | - ज्ञान की चेतावनी - 761
  • सिर सलामत रहता यदि सलाम करता परवरदिगार को | कुछ कलाम गरूर के थे , मगरूर के थे , धक्का खाया पछताया | - चेतावनी - 761
  • विद्या के बल पर जगत जीता | प्रेम के बल ? प्रेम केवल - केवल प्रेम | प्रेम के बल भगवान पाया | - भक्ति - 761
  • समझ न पाया प्राणी स्तुति में निन्दा करता है | जिसे साथी समझा वही साथ नहीं देता , बातें बनाता है | तुम तो प्राणों के साथी हो फिर साथ दो कि सब बातें साफ हो | - भक्ति - 771
  • जब जब हुई कमाई | कहता रहा कम आई , कम आई | देखी न भलाई , न बुराई | अब अन्तिम काल कमाई क्या काम आई ? - चेतावनी - 771
  • पुस्तक पुरुष तब कब ले जाती ? प्रकृति के ही गीत गाती , मन को रिझाती | पुरुषत्व प्रकृति विजय में है | - ज्ञान की चेतावनी - 771
  • झाङू तेरे पैर पखारूँ । तैने घर साफ किया , मूर्खों को मार्ग दिखलाया | ( झाङू पड़ी होश में आया ) - चेतना - 771
  • प्यार क्या दिखाने की वस्तु है ? वह तो छिपाये छिपता नहीं , कोई करके देखे | मजनू का नाम भी आज मजनू बना देता है जहाँ हाय लैला ही महावाक्य था | लय पर आ या संगीतमय जीवन के लिये लय ला | मजनू है ही दिल | - भक्ति की चेतावनी - 771
  • कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें समझ पाना समझ से परे है किन्तु हार कब मानी , बार बार आता है और जाता है , प्रश्न का उत्तर आज भी प्रश्न ही है | - भक्ति की चेतावनी - 781
  • किरणों ने कहा - हम तुम्हें हराती कहाँ हैं रंग डालती हैं प्यार में | - चेतना - 781
  • सूखी मिट्टी कीचड़ बनी | जल और मिट्टी दोनों ही पवित्र , किन्तु यह कैसा रस है जिसने पवित्र को भी कीचड़ बनाया | - ज्ञान की चेतावनी - 781
  • अविश्वास - अशान्ति का कारण , लोभ - मोह का जनक , काम - क्रोध का उत्तेजक , ईर्ष्या - मात्सर्य का आंशिक सहायक है | - चेतावनी - 781
  • पत्र अर्पित किया तो भाव पूर्ण पत्र समझा | पुष्प देखते ही खिल उठा | फल के लिये , जीवन सफल हो , भक्त का , निश्चय किया और जल पाकर कहा आज मेरा हृदय शीतल हुआ | कैसा दयालु है भक्तों का भगवान | - भक्ति - 781
  • सब ने रौंदा कोई कीमत नहीं | किसी ने चरण -स्पर्श किया , मोतियों से महँगी धूलि | - भक्ति - 791
  • प्यार भी झूठा है तो अन्धकार ही अन्धकार है | प्यार झूठा नहीं , करने वाला झूठा तो प्यार भी बदनाम | - चेतावनी - 791
  • ब्रह्म निराकार नहीं , माया आवेष्टित | आवेष्टन महान , जग सका न पहचान | कहने लगा , ब्रह्म निराकार | - ज्ञान की चेतावनी - 791
  • कैसा तांत्रिक ? जिसका हृद्तंत्र बज न उठा | कमल खिलाये कल्पना के | स्वतंत्र को न जाना तो भेदन कैसा ? भेद न जान पाया तो भेदन क्या काम आया ? - चेतना - 791
  • अब मिलना दूर , जब मीलों दूर | मिलो - न हिलो न डुलो | - भक्ति की चेतावनी - 791
  • सज जस ( यश ) पायेगा | नहीं तो जस करनी तस भरनी | तस सत बना जब बाहरी , भीतरी बना | - भक्ति की चेतावनी - 801
  • झंकार ? कब बेकार | अनंत लहर - अनंत मेहर | - चेतना - 801
  • श्वास प्रश्वास जीवन कहलाया | जड़ चेतन की सृष्टि की किन्तु इसका उद्‌गम इसका लय , आज भी समस्या बना हुआ है | - ज्ञान की चेतावनी - 801
  • दूध भी था , दही भी , मथनी न थी | मक्खन का लाभ न उठा सका | भगवान था , भक्त भी , मनन न था , मन न था | - चेतावनी - 801
  • ज्योति जो थी वह है वह तेरी थी | दर्शक बना तेरे भक्त की ओर देख रहा था | - भक्ति - 801
  • कभी सोचता भी हूँ तो समझ नहीं पाता कि सोचता हूँ , कि भूलता हूँ ? क्या कहूँ ? - भक्ति - 810
  • कृत यदि कृतघ्न हो जाए तो कर्ता का क्या दोष ? भोगे कृतघ्न , भागेगा कहाँ ? कर्ता सर्वव्यापी है | - चेतावनी - 810
  • सुन्दरता खोजता है ? श्याम सुन्दर क्यों नहीं खोजता ? श्याम में भी सुन्दरता बुराई में भी भलाई निहित है | - ज्ञान की चेतावनी - 810
  • धड़कन तेरी थी , मैं समझता था कि मेरी है | भूल मेरी , अनन्त गति का ही खेल था | - चेतना - 810
  • भक्तों पर बेरहम | कमला - चंचल बना देंगे ये भक्त फिर पाद सेवा भी करेगी तो भी उपेक्षित ही रहेगी भक्तों से | - भक्ति की चेतावनी - 810
  • संगीत कहाँ , संगति कहाँ , सदगति कहाँ ? बेचैनी थी दिल की फिर प्रसन्नता का प्रश्न कहाँ ? - चेतना - 811
  • दुनिया , दुःख और दूसरा | स्मरण , सुख और स्वरूप | ‘ द ‘ और ‘ स ‘ का झगड़ा है , जहाँ दसों इन्द्रियाँ व्याकुल हो जाती है मन की विमुखता या कृपा के कारण | - भक्ति की चेतावनी - 811
  • अभिनेता पात्र है , सृष्टिकर्त्ता संचालक , अभिनय - पात्र के कार्य संचालक , सफल अभिनेता को संचालक बना देता है | यही जीवन अभिनय है | - ज्ञान की चेतावनी - 811
  • सर्वव्यापी की सन्तान पापी ? सन्तान ने कहा - खा , पी | अरे कहाँ है सर्वव्यापी ? अब क्यों न होगा , सन्तापी , विलापी , पापी | - चेतावनी - 811
  • सब ने स्थान बनाया , आश्रम बनाया और तेरा ? मेरा स्थान तुझमें है और आश्रय तेरा | अब तू ही बता कहाँ खोजूँ दुनियाबी स्थान आश्रम ? - भक्ति - 811
  • कोई सुने या न सुने तू तो सुनता है न | फिर बहरों तक आवाज कब पहुँची ? - भक्ति - 812
  • मोह ने कर्तव्यच्युत किया , वासना ने दास बनाया इन्द्रियों का | अब त्राण कहाँ , अब प्राण कहाँ ? - चेतावनी - 812
  • नृत्य संगीत में गति है , ताल है सम है | सम सफल , श्रम सफल | दर्शक ताली पीटे या सिर , नृत्य होता ही रहेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 812
  • पत्थर में भगवान आज भी खोज रहा है | पागल ! मानव तन धारी भगवान को पहिचान शांति मिलेगी | - भक्ति की चेतावनी - 812
  • कहा किसी ने - धन खोजता है , शांति खोजता है तो क्या भगवन खोजता है ? मन ने कहा मन खोजता हूँ - वह मिल जाये तो झंझट ही न रहे | - चेतना - 812
  • ये पेड़ , ये पौधे , ये मनुष्य , ये प्राणी क्या एक ही ने बनाये ? यदि हाँ तो वह अवश्य ही अनोखा है | - चेतना - 813
  • भूल किससे नहीं हुई ? हनुमान से हुई , तुलसी से हुई , रत्नाकर से हुई | होने में आश्चर्य नहीं - न पहिचानने में भूल और आश्चर्य है | - भक्ति की चेतावनी - 813
  • प्यार को खोजने चला - वासना मिली | भगवान को खोजने चला , साधना मिली | मैं को खोजने चला - कुछ न मिला | - ज्ञान की चेतावनी - 813
  • हद हो गई , हद में कहाँ तक रहूँ ? आज हद देह को दहन करती है | हद बेहद में बदल कि बद न रहे , हद न रहे | - भक्ति - 813
  • धूलि को भी समझ न पाया तो क्या पाया ? उड़ाता रहा धूलि , व्यर्थ हुआ जन्म | छूता , तो पाता दिव्य भाव | - चेतावनी - 813
  • फल्गु का प्रवाह बालू के नीचे-नीचे | नीचे ऊँचे प्रवाह तथा वाह वाह में न खिला | खिला मेरा दिल कि मैं तेरा हो जाऊँ | जाऊँ क्या तुझ ही में समाऊँ | सम हो जाऊँ तो न जाऊँ और न आऊँ | - भक्ति - 814
  • शत्रु हैं विचार , मित्र हैं विचार फिर माया और ब्रह्म क्या है ? न शत्रु न मित्र | केवल विचार | - ज्ञान की चेतावनी - 814
  • नयनाभिराम कौन ? अभी राम , अभी काम | अभी धाम अभी दाम | कभी तो सोचो - सब यहीं धरा रह जायेगा , जब कूच करेगा बनजारा | - चेतावनी - 814
  • उपकार न मान | यह तो मान कि कोई अज्ञात उपकारी भी है | - भक्ति की चेतावनी - 814
  • मर शब्द भय प्रद और रम प्रिय क्यों ? प्रिय में रमण तो प्रिय होगा ही और मर तो घृणा , वियोग का सूचक है , प्रिय कैसे हो ? - चेतना - 814
  • दृष्टि दे कि तेरी सूक्ष्म सृष्टि देख सकूँ | स्थूल तो भूल का कारण बना | - चेतना - 815
  • किस किस को मानूँ और झुकूँ | प्रश्न क्यों ? दिल से पूछ , शांत हो , उत्तर भी मिलेगा | - भक्ति की चेतावनी - 815
  • भ्रमण में रमण करने लगा तो भ्रम उत्पन्न हुआ कि भ्रमण है या रमण है ? भ्रम होना स्वाभाविक है किन्तु रमण में तो रम जाता है , गम भूल जाता है | - ज्ञान की चेतावनी - 815
  • बन जा , नहीं तो वन जा | कण-कण में मन को न रमा | नहीं तो कही का न रहेगा | - चेतावनी - 815
  • ये शब्द कभी तो बह निकलते हैं और कभी बहना दूर कहना भी नहीं चाहते राम कथा | - भक्ति - 815
  • प्यास तो क्षणिक शांत भी हो जाती है किन्तु आस तो लगी रहती है दर्शन की , स्पर्शन की | - भक्ति - 816
  • क्षमा मानव तन धारण के लिये | पशुवत् जन्म कर्म फल सहते सहते बीता | - चेतावनी - 816
  • प्राकृतिक सौन्दर्य उपभोग के लिये है या योग के लिये ? भोग रोग का कारण बना और योग ने योग्य बनाया , सुन्दरता का रहस्य समझाया | - ज्ञान की चेतावनी - 816
  • ऐसे वेश में आ , आवेश में आ कि लोग वेश आवेश भूल जायें | - भक्ति की चेतावनी - 816
  • पत्तियों ने कहा - पति को देख , पत रहे | - चेतना - 816
  • दे सुन कर भक्त घबड़ाया | ले सुन प्रसन्न हुआ | यह भक्त है ? कैसे कहूँ ? - चेतना - 817
  • शरीर थका तो बदल डाल यदि कुछ कर गुजरने की इच्छा है | मन की थकान बुरी | विचारों की संजीवनी सुँघा | लक्ष्य लक्ष्मण मूर्छित है | - भक्ति की चेतावनी - 817
  • बाहरी सुन्दरता ही जब इतनी आकर्षक है फिर भीतरी ? भीतरी तो वह तरी है जो भवसागर ही नहीं रहने देती | - ज्ञान की चेतावनी - 817
  • प्राण में रण है जीवन का , व्रण है पूर्व संचित कर्मो का , भ्रम है जीव , शिव का , क्रम है जन्म-मरण का | - चेतावनी - 817
  • बिना गरजे बरसता है बड़ा दानी है | यहाँ तो गरजते हैं शब्दों में और बरसते कहाँ ? तरसते हैं प्रेम वर्षण के लिये | - भक्ति - 817
  • माता ने मात दी ममता में | पिता ने प्यार दिया कर्त्तव्य में | मैं ममत्व और कर्त्तव्य के बोझ से दबा जा रहा हूँ , परम पिता रक्षा कर | - भक्ति - 818
  • अंग्रेजी का एक शब्द है Enjoy ! In यदि Joy अर्थात् आनन्द मनाता या करता तो ठीक था Out में ही जिन्दगी से Out हो गया | - चेतावनी - 818
  • सम है , पूर्ण है तो सम्पूर्ण है | आदि नहीं अंत नहीं जो अनंत है | आदि है तो व्याधि है , इत्यादि है | अनंत का अंत कैसा ? - ज्ञान की चेतावनी - 818
  • भाव हनुमान है कि राम ? भाव सीता है जो वियोग में छटपटा रही है प्रिय के | - भक्ति की चेतावनी - 818
  • पाप के भय से पुण्य किया , लोग प्रशंसा कर रहे थे | मर्म कुछ और था , धर्म तो नाम मात्र | - चेतना - 818
  • लेखनी कलम बनी | कलम किया अज्ञान , ज्ञान के झंझटों को | - चेतना - 819
  • किसने तुमको योग सिखाया ? किसने तुमको भोग सिखाया ? वासना ने | योग के बिना भोग कैसा ? वासना कष्टदायिनी | योग का भोग निराला है , अलग है | - भक्ति की चेतावनी - 819
  • अक्षर नहीं जानता , वर्ण नहीं जानता , माला नहीं जानता फिर भी कहता है मैं विद्वान हूँ | तू विद्यमान है क्या यह भी जानता है ? शायद नहीं | फिर अभिमान क्यों ? - ज्ञान की चेतावनी - 819
  • नादान , तुझे होश कब होगा ? देख तेरे साथी चल बसे | बस कर बहुत हुआ | चल , बसना है उस दुनिया में जहाँ प्राणों का मीत है | न रीति है और न नीति है | - चेतावनी - 819
  • जो मोह में था , मद में था , वह भी मुहम्मद बन गया | पैगम्बर बन गया , यह तेरी कृपा है | - भक्ति - 819
  • ईसा ? ऐसा क्या था कि तेरा पुत्र कहलाया , जग का पाप भार उठाया , यह भी तेरी कृपा ही है | - भक्ति - 821
  • अरे शैतान अब तो मान | जा रही है जान , छोड़ अपना अभिमान | कहाँ रही शान , जब दुनिया ने दुरदुराया | - चेतावनी - 821
  • बनी और बिगड़ी | बनी उसकी जिसने बनाने वाले को जाना और माना और बिगड़ी ? बिगड़ी उसकी जिसने न जानते हुए खुद को खुदा माना | - ज्ञान की चेतावनी - 821
  • कुछ भाव कहलाता है और कुछ अभाव | बुरा भला कैसा ? - चेतना - 821
  • दिला ( धन , मान , भाव ) | पहले दिल तो मिला , हृदय तो खिला | फिर खुद ही चिल्ला उठेगा , मिला अब मिला | - भक्ति की चेतावनी - 821
  • याद करने वाला ही नामी को नचाता है | प्रेम का अनोखा प्रभाव था | - भक्ति की चेतावनी - 831
  • कैसा साकार कैसा निराकार ? प्रेम नीरस नहीं | निराकार में रस घोला कि साकार हो गया | - चेतना - 831
  • प्रवेश किया धन में , विद्या में , बल में , प्रतिष्ठा मिली | प्रतिष्ठा विष्ठा नहीं , यदि सन्मार्ग में बाधक न हो | - ज्ञान की चेतावनी - 831
  • खो जी ( जीवन , दिल ) तो खोजी बने | यहाँ तो हाँ जी , हाँ जी , जी हाँ , जी हाँ कहते ही दिन बीत रहे है | - चेतावनी - 831
  • बुद्धि प्रिय है , मान्य है तो मन नहीं | प्राणों की व्याकुलता कब शान्त हुई ? जब प्राण प्रिय मिला | प्राण प्रिय कौन था-जिसे मन ने चाहा , दिल खो कर | - भक्ति - 831
  • जीवन की अंतिम घड़ियों में किसे पुकारूँ ? जिसे जीवन अर्पण किया | - भक्ति - 841
  • यह चक्की है ( दुनिया ) यह झक्की है ( मनुष्य ) | बात पक्की है , यह झक्की एक दिन चक्की में पिस कर चला जाएगा किन्तु जाने के पहले - रोयेगा और सोयेगा दुःख की नींद में | - चेतावनी - 841
  • तीर्थ में तीर न देखा जहाँ से लौट कर आना नहीं होता और वह तीर भी न देखा जो संशय विनाशक है | न देखा रथ जिस पर दसों इन्द्रियाँ मनोयोग पूर्वक शांत हो जाती है तो क्या तीर्थाटन किया ? ( दर्शन किया ? ) - ज्ञान की चेतावनी - 841
  • संस्कार ने संसार में एक संसार बसाया | लोग पाप पुण्य खोजने लगे | - चेतना - 841
  • तुलसी को नहीं जानता ? सूर को नहीं पहचानता ? कबीर की साखी तो सुनी होगी ? मीरा की झाँकी तो देखी होगी ? तू कहाँ ? मैं ? मैं कह दूँ सब में हूँ किसी में नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 841
  • जग में भी आया मग भी बहुत देखे , ज्योति कहाँ ? जल प्रेम में ज्योति जगमगा उठे | - भक्ति की चेतावनी - 851
  • बुद्धि पर लोग हँसते हैं | बुद्धि दी ही नहीं , हँसने दे | दिया है दिल , जहाँ हँसने रोने का ही खेल है | - चेतना - 851
  • साधना घटी आडम्बर आया , प्रेम घटा पाखंड आया | कामना घटी साधना आई , रीति नीति घटी प्रीती आई | - ज्ञान की चेतावनी - 851
  • चलते-चलते ऋषि मुनि कह गये - हम तो चले किन्तु यदि तुम हमारे अनुभव से लाभ उठाओगे तो तुम्हें भी जीवित रहने का ढंग आ जायगा और हमें भी सन्तोष होगा | - चेतावनी - 851
  • जिसका पिता जगन्नाथ हो , गुरु बलदेव हो वह तो आनन्दी ही होगा | अनाथो का नाथ जगन्नाथ , बलहीन का देव - बलदेव | आनन्द उसका जन्म सिद्ध अधिकार | - भक्ति - 851
  • झुक कर सलाम करूँ तो बन्दा कहलाऊँ | समझ कर ध्यान करूँ तो अंधा कहलाऊँ | फिर तू ही बता क्या करूँ क्या न करूँ | - भक्ति - 861
  • तू घबड़ानेवाला जीव है , घर आनेवाला जीव नहीं | भोगेगा नहीं तो क्या करेगा ? घर का सुख भूल बैठा | - चेतावनी - 861
  • अवशेष नहीं , अब शेष कर , प्रवेश अन्य शरीर में प्राण छटपटाते ही रहेंगे | - ज्ञान की चेतावनी - 861
  • नदियाँ शान्त हुई ? जब समुद्र ने आश्रय दिया | चित्त वृत्तियाँ लीन हुई | कब ? जब प्रिय मिला , प्रेम मिला | - भक्ति की चेतावनी - 861
  • ध्वनि का खेल अनोखा | कुछ परिचित कुछ अपरिचित | फिर भी प्रभाव छोड़ गई | - चेतना - 861
  • धन का ध्यान प्रति मुहूर्त - प्रीती धन के ध्यान का अभ्यास , हे भगवान | - चेतना - 871
  • हो गया नहीं , होकर रहा | उसने कब वेद पढ़ा , कब शास्त्र अवलोकन किया ? दिल देखा और दिल दिया | - भक्ति की चेतावनी - 871
  • यह धूलि कहाँ थी ? पृथ्वी पर | यह मैल कहाँ था ? पृथ्वी पर | यह पृथ्वी कहाँ थी ? जल में , मन में | जल न रहा , मल दिखलाई दिया | जलन मन मैल का कारण बनी | - ज्ञान की चेतावनी - 871
  • संग कर सत्य का कि संकोच हटे | निरर्थक भाव घटे ( कम होना ) | - चेतावनी - 871
  • सौगात - गात रहते मुझे सौ गातों से भी सौगात प्रिय है क्योंकि यह प्रिय की सौगात है | - भक्ति - 871
  • है हिम्मत तो छुड़ा मेरा हाथ | नहीं , तो चलूँ तेरे साथ | स्वर्ग , नरक मैं क्या जानूँ ? - भक्ति - 881
  • किसे विज्ञ कहा जाये जब अज्ञों की तरह विकार युक्त कार्य किये जा रहे हैं | अविकारी कौन ? जो अविकारी को जाने और मानें | - ज्ञान की चेतावनी - 881
  • उत्कर्ष देख कर कर्ष क्यों करता है ? तू ही बता , कारण कौन ? तू या मैं ? - भक्ति की चेतावनी - 881
  • कहा प्रेम कर तो वासना का पुजारी बन बैठा | प्रेम बदनाम , क्यों ? वासना को प्रेम जो कहते हैं | - चेतना - 881
  • जगत को जीता , जीवित ही जीता | कैसे ? जग में जीत हार न देखी | - चेतना - 891
  • ताजा जाता रहा , बासी , वासी बन गया | अब आकर्षण कहाँ ? सत्य न ताजा न बासी , सदा सर्वत्र वासी , अब क्यों उदासी ? - ज्ञान की चेतावनी - 891
  • प्रवचन में भी प्रवंचन ? फिर कल्याण कैसे हो श्रोता का वक्ता का | - भक्ति की चेतावनी - 891
  • तुम हारे जब तुम हमारे हुए | हम हारे जब हम तुम्हारे हुए | हम तुम हारे | हम तुम्हारे | - भक्ति - 891
  • थकता नहीं लिखने से ? कमल थकता नहीं खिलने से | - भक्ति - 901
  • कसा ही नहीं , उसके पूर्व ही कसाई बन बैठा ( खंडन मंडन करने लगा ) वाणी के वाण चलाने लगा | परिणाम ? कुछ भी नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 901
  • समीप कौन ? जो अपना हो | दूर कौन ? जो केवल सपना हो | - चेतना - 901
  • क्रोध से पकड़ा , घृणा से छोड़ा | प्रेम से पकड़ा , मर मिटा उसके नाम पर | छोड़ना कैसा ? - भक्ति की चेतावनी - 901
  • कामिनी कंचन ने काया को माया का रूप दिखलाया | संत ने समझा और समझाया , इनका उपयोग और दुरूपयोग | - चेतना - 910
  • स्वर्ण जैसी शांति , रजत जैसा धर्माचरण आज पुस्तकों के पन्नों में आकर अपना मर्म विलिन कर रहा है | साधु साधन की बातें कहते हैं शांति तो संत ही देते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 910
  • प्रेम में राम भी पागल था , सीता भी | फिर इस पागलपन को क्यों प्रोत्साहन देते हैं , जागतिक , धार्मिक लोग ? - भक्ति की चेतावनी - 910
  • कहाँ तक रहूँ इस कब्र में ? जहाँ तेरा दीदार नहीं - करने को प्यार नहीं , यार नहीं , आँखें चार नहीं | - भक्ति - 910
  • आज जब याद किया तो तेरी याद आई कहने लगी - तुझे क्या चाहिये ? मैंने कहा - दया चाहिये | हँस कर कहने लगी - अरे पागल दया न होती तो तू याद कैसे करता ? - भक्ति - 911
  • वस्त्र यदि कुरूप को सुन्दर नहीं बना सकते तो ये वाह्य कर्म काण्ड हृदय को सुन्दर बना सकेंगे ? - भक्ति की चेतावनी - 911
  • भजन ही वजन है जिसके लिए , वह पाप पुण्य की कथा क्यों करता है ? दिल का वजन कम हुआ जब भजन प्रारंभ हुआ | - ज्ञान की चेतावनी - 911
  • दुरूपयोग ने दूर किया योग से | अब गति दुर्गति बनी | संत ने दूर को समीप अति समीप कर अपने को अपने में मिलाया , वाह रे संत | - चेतना - 911
  • घर सूना | बाहर ही विचार विचरण करते हैं | कौन घर बताये और प्रवेश की विधि बताये | केवल संत | - चेतना - 912
  • कुछ बोल , बोल कर क्या करूँ , राग द्वेष की गाँठे तो खुलीं नहीं | श्रोता की गाँठें अधिक दृढ होंगी | - ज्ञान की चेतावनी - 912
  • भजन - जन जन में ‘ भ ‘ भगवान को देख यही तेरा भजन | - भक्ति की चेतावनी - 912
  • नारायण बैकुंठ में गया | लक्ष्मी पैर दबाने के लिये गई | रह गया मैं | पुकारूँ नारायण को सुनता नहीं | पुकारूँ लक्ष्मी को तो आती नहीं | प्रिय के समीप बैठी खो बैठी अपने को | - भक्ति - 912
  • गालियाँ दी प्यार के पहले , अपराध | प्यार में गालियाँ फूल बन गईं | वाह रे प्यार का रहस्य | - भक्ति - 913
  • कलियाँ कब खिलीं ? जब हृदय खिला , प्रभु मिला | - भक्ति की चेतावनी - 913
  • सरकार बदनाम क्यों ? कर्मचारियों के कारण | धर्म बदनाम क्यों ? इन धर्माचार्यों के कारण | मैं बदनाम क्यों ? अभिमान के कारण | - ज्ञान की चेतावनी - 913
  • प्रिय ने प्यारे को प्यार से मिलाया दुनिया मौत कहने लगी | - चेतना - 913
  • जलाने वाले दफनाने वाले , शरीर को लटकाने वाले लटकते रह गए कर्म बन्धन में | प्यार का बन्धन मुक्त करता है - कर्म से , धर्म से | फिर बन्धन कहाँ ? - चेतना - 914
  • जो खुद को नहीं पहिचानता वह खुदा को क्या पहचानेगा ? खुद में खुदा तो उसके लिए और भी मुश्किल | खुदी बुरी - खुदा कब हुआ तुझ से जुदा | - ज्ञान की चेतावनी - 914
  • क्यों चिन्ता ? जब चित्त सत् चित्त आनन्द ही में मिलने वाला है | - भक्ति की चेतावनी - 914
  • आज समझौता हो जाय | समझो तो मैं भी नारायण का अंग | गालियाँ नारायण को पड़ीं | प्यार में बोलता नहीं | मैं क्यों खुश होने लगी ? प्यार तो नारायण से न है | - भक्ति - 914
  • कामना मुझे काम ना तू दूसरा घर देख | मेरे लिये एक ही घर है | जहाँ रहता मेरा वर है , ईश्वर है | क्यों नहीं कहते " ई तो वर है " | - भक्ति - 915
  • जायेगा कहाँ ? सर्वव्यापी का क्या निमन्त्रण मिला है ? - भक्ति की चेतावनी - 915
  • यह अग्नि कब बुझी जब बुझी तो प्राणान्त हुआ ( जठराग्नि ) | यह अग्नि कब बुझी ? यह बुझी नहीं , इसने तो कर्मो का अन्त किया | ( ज्ञानाग्नि ) और यह अग्नि ? ( कामाग्नि ) यह तो बढ़ती ही गई शरीरांत हुआ इसका अन्त न हुआ | - ज्ञान की चेतावनी - 915
  • शरीर शांत हुआ और मन ? मन ने एक न माना , फिर चक्कर काटता आ पहुँचा | - चेतना - 915
  • कौन किसका साथी ? जब सभी ताक में बैठे शिकार के | - चेतना - 916
  • क्षणिक वृष्टि सन्तुष्टि कर न सकी भूमि की | क्षणिक उपदेश सन्देह मिटा न सका भ्रमित मनुष्य का | फिर शांति तो कवि कल्पना है | हाँ , वाणी यदि बीजमंत्रदायक हो तो प्राणी पुलकित हो सन्देह क्यों , देह भी धारण न करे | - ज्ञान की चेतावनी - 916
  • जिसने प्रभु को भी न जाना , न पहिचाना वह दास , उदास रहे तो आश्चर्य क्यों ? - भक्ति की चेतावनी - 916
  • खींचातानी में कहीं भाव आते हैं ? जायँ देखें कहाँ जाते हैं | - भक्ति - 916
  • अंत में संत और शांति ने अपनाया तो कहीं पार पाया | किसका ? भगवान का , माया का | संत ही भगवान है - शांति ही माया पाश से मुक्त करती है | - भक्ति - 917
  • हल का बना हलका हुआ , गम्भीरता क्यों ? - भक्ति की चेतावनी - 917
  • जहाँ विभेद है , वहाँ वेद कहाँ ? वेद समन्वयकारी , विभेद भ्रान्तिकारी | नीति वेद का अंश मात्र , अनीति विभेद भेद की सहायिका | समन्वय तो लक्ष्यच्यूत होना नहीं , पूर्णता का सहायक है | - ज्ञान की चेतावनी - 917
  • व्याकुल दुनिया देखी | चिन्ता का राज्य देखा | शांति ? शांति की बातें ही बातें सुनी | - चेतना - 917
  • क्यों ग़मगीन ? नहीं तल्लीन तो ग़मगीन | गम दूर , सुगम शांति | - चेतना - 918
  • मानव की पीड़ा को मानव न समझे तो दानव क्यों समझने लगा ? रहे देवता वे तो स्तुति के पात्र हैं सृष्टि चली आ रही है | दृष्टि अब भी अति अल्प को है | - ज्ञान की चेतावनी - 918
  • सन्तोष चाहता है ? सन्त का दर्शन कर , दोष न खोज , सन्तोष तेरा धन है | - भक्ति की चेतावनी - 918
  • सीमा तू मां सी है फिर बाँधती क्यों है ? मुक्त कर बन्धन , असीम हो , विचरण करने दे | - भक्ति - 918
  • ध्यान आकृष्ट करने के लिये तेरी मूर्तियाँ सजी , प्रसाद लगे , बड़े-बड़े मन्दिर बने किन्तु तू ध्यान आया अति अल्प के जो तुझे देखते थे मूर्त्तियों को नहीं | - भक्ति - 919
  • धन और धन्य के लिए सब बेचैन | धन प्राणधन | धन्य जीवन | - भक्ति की चेतावनी - 919
  • मनुष्य में जब सर्व प्रथम समझ आई तो “ मैं “ “ मैं “ करने लगा | जब समझ पूर्ण से विकसित हुई तो “ सोऽहं “ कहने लगा किन्तु कहना कुछ और अर्थ रखता है और अनुभव कुछ और | - ज्ञान की चेतावनी - 919
  • लिखता रहा छपा कहाँ ? छपा दिलों पर जो प्रभु के प्यारे हैं | छिपा प्रभु दिल पर छपा , लिखना सफल | - चेतना - 919
  • कौन सुनता है सभी तो अपमान करते हैं | अच्छा है , यदि सुनेंगे तो अपमान मान में शायद बदल जाये | - चेतना - 921
  • आवश्यकता है ऐसे व्यक्तियों की जो निर्भ्रान्त हो किन्तु भ्रान्ति ही क्रान्ति की प्रेरक है | वह क्रांति शांति के लिए भी हो सकती है उद्भ्रान्ति के लिए भी किन्तु निर्भ्रान्त तो शांत होना है | - ज्ञान की चेतावनी - 921
  • यह उद्यान उसका दान है | आया है तो कुछ लाभ उठा | पश्चाताप क्यों ? प्रेम अपना | यह अपना है | पराया नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 921
  • कैसा प्रण था जिसे भूल बैठा , अब याद करता है ? प्रण भूलूँ तो प्राण छटपटाये | प्रण प्राण से बढ़ कर है | - भक्ति - 921
  • पायल की आवाज ने घायल किया मन को | नटनागर तेरा नृत्य ही देखता रहूँ तो साधना सफल | - भक्ति - 931
  • क्षीण ज्योति , विराट विश्व | कहीं-कहीं प्रकाश | कहीं-कहीं विकास | अन्यत्र घोर सत्यानाश | ये जुगनूं स्वयं जलते है ये किसे प्रकाश देंगे ? - ज्ञान की चेतावनी - 931
  • वृत्ति ने प्रवृत्ति चाही | निवृत्ति शायद इसलिये कठिन है | - चेतना - 931
  • चंचल न बना मन को | नहीं तो सृष्टि का अन्त है मन का कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 931
  • दो अक्षर का मेल हो जाये और ‘ न ‘ न रहे तो ज्ञानी | अज्ञात का स्पर्श हो और युक्त हो जाये तो मुक्त और भक्त | - ज्ञान की चेतावनी - 941
  • अपना , यदि नहीं , तो अपमान न कर | मन व्याकुल है | तेरा मेरा कहना बेकार | - भक्ति की चेतावनी - 941
  • हवा में उड़ता है ? उड़ता नहीं , उडाता हूँ सुख को , दुःख को | जब हवा ही हवा है और हुआ ही हुआ है फिर सुख क्या और दुःख क्यों ? - चेतना - 941
  • बेहाल था जब कर्म की गति देखी | निहाल हो गया जब कर्म में भी तुमको पाया | - भक्ति - 941
  • रक्षा बन्धन | रक्षा कर बन्धन में मैं बँधा - तू बँधा | यदि तेरी मेरी रक्षा चाहता है तो बन्धन को वन्दन में बदल | - भक्ति - 951
  • भक्ति , ज्ञान , प्रेम की त्रिधारा में स्नान किया कि त्रिलोक से मुक्त हुआ | - भक्ति की चेतावनी - 951
  • कंगाल भी गाल बजाता है , दुःख की कथा कहता है | यदि वह जान पाता प्राणधन को तो कंगाली सदा के लिये विदा होती | - चेतना - 951
  • व्योम में सोम भी है रवि भी | रवि पहले सोम पश्चात् , अभिमान पहले शांति की किरण पश्चात् | - ज्ञान की चेतावनी - 951
  • मौत एक बार किन्तु यह दुनिया सौत तो बार-बार डराती , पाप पुण्य का भय दिखाती | प्रिय का मिलन कैसे हो ? मौत सौत की एक न सुन | दिल मेरा तो मौत कहाँ , सौत की चाल कहाँ ? - भक्ति की चेतावनी - 961
  • मैं रूठा हूँ या वह , यह तू क्या जाने ? मनाने वाला आये तो फिर तेरी सुनेगा ही कौन ? जब तक नहीं आता तू भी कह सुन ले , धर्म के नाम पर , शास्त्र के नाम पर | - चेतना - 961
  • स्वर्णयुग का स्वर्णकार कौन था ? स्व वर्ण को जानने वाला | आज स्वर्ण के उपासक अनेक युग के नहीं | क्यों ? वर्ण व्यवस्था तो है , जानकारी नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 961
  • नाच उठी मीरा | कृष्ण का दिल नाचने लगा | प्रकाश में वह मीरा के साथ नाच न सका | यही हूक थी दिल में | - भक्ति - 961
  • भक्त कहता है - तू ने क्या किया कि मैं विमुख हो गया संसार से | भगवान कहता है कि तू ने क्या किया कि मुझे सम्मुख होना पड़ा संसार के | - भक्ति - 971
  • गीता का भगवान , गीता में भगवान , गीता ही भगवान | यदि रीति जाने , प्रीति जाने , नीति जाने | - ज्ञान की चेतावनी - 971
  • आखिर मिट्टी पर सोना है , इन बातों से क्या होना है ? सोना है , मिट्टी में सोना है , मिट्टी पर सोना है किन्तु इन बातों से क्या होना है ? किसी का होना है नहीं तो यह सोना भी मिट्टी ही होना है | - भक्ति की चेतावनी - 971
  • कुछ मिले साथी जो अभाव के गीत गाते | दोष उनका नहीं | हवा ही ऐसी है जो भाव को न जान अभाव की पुजारिन बनी है | - चेतना - 971
  • भजन में सज्जन मस्त | दुर्जन तो दूर ही से चिल्ला उठे , भजन नहीं ढोंग है | - चेतना - 981
  • अटक थी नहीं , भटक थी | भटक दूर अटक दूर | - भक्ति की चेतावनी - 981
  • माया को दोषी ठहरा कर कर्त्तव्य विमुख न हो सकेगा मनुष्य | कामिनी , कांचन तुझे रिझा न सकेंगे | तू अमर का पुत्र है | रूप को पहचान | ऐसी बातों पर ध्यान न दे , जो तुझे पापी , भोगी कह तेरा आत्म-सम्मान विलुप्त करना चाहती हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 981
  • दुनिया क्या जानेगी ? मैं तो तुझे जानता हूँ | - भक्ति - 981
  • अनोखी भेंट थी अज्ञात की | कहा - अज्ञेय न कहो , मैं सदा साथ हूँ प्रिय के अप्रिय के | - भक्ति - 991
  • तरसता क्यों है ? क्या करे ? न तर है और न रस है | केवल तरसता है उनके लिये , जो न तर हैं और न जिनमें रस है | - ज्ञान की चेतावनी - 991
  • दृश्य अदृश्य जगत उसके लिये जिसने प्रिय को जाना | सर्वव्यापी के लिए दृश्य अदृश्य कैसा ? - भक्ति की चेतावनी - 991
  • जब जब संतों की वाणी गृहस्थ ने सुनी , मनमाना अर्थ लगाया | मन माने तो मान , नहीं तो कैसी जान कैसी पहिचान | - चेतना - 991
  • प्यार न दिखलाने का और न कथा कहानी का | फिर लोग क्यों कथा कहते और उसका दम भरते ? - चेतना - 1000
  • हृदय हीन का भी हृदय कोमल था आज कठोर क्यों हो गया | वियोग के क्रोध में | करुणा की वर्षा कर शायद कठोर कोमल हो जाये | - भक्ति - 1000
  • गुण अवगुण कौन समझ पाया ? यह केवल धारणा है , जिसने मनुष्य को भ्रम में डाल रखा है | - ज्ञान की चेतावनी - 1000
  • क्या अभिशाप के लिए विश्व की रचना हुई ? मन बुद्धि के प्रवंचन में न आ , प्रवचन सुन | संसार सोने का , सार है पीने का | - भक्ति की चेतावनी - 1000
  • संसार को कोस कर साधु कहलाये तो व्यर्थ ही संसार में आये | खेल के लिए बना , मेल के लिए बना , उसे जेल क्यों समझा ? - भक्ति की चेतावनी - 1001
  • अनित्य और नित्य में कौन विजयी ? नित्य | क्यों ? नीयत ठीक | - ज्ञान की चेतावनी - 1001
  • तुम सा दिल मिलता तो क्या तुम मेरे न होते ? दिल तो दिया किन्तु कृपा न की | यह एक यंत्र है जो बजते-बजते टूट जायेगा | अच्छी बात है | - भक्ति - 1001
  • कवि प्रकृति का उपासक | दार्शनिक देखता ही रहा , कहता ही रहा किन्तु वाह रे अध्यात्मवादी , एक की न सुनी , खोकर ही अपने को पाया | - चेतना - 1001
  • अहंकारी भी तेरे ही हैं न खुद शांत हो पाते न तुझे चैन लेने देते | - चेतना - 1002
  • यह बात ठीक है कि मनुष्य कर्त्ता को भूल बैठा , तभी तो अनेक कष्टों ने उसे घेर रखा है , अन्यथा अमर के पुत्र का यह हाल न होता | - ज्ञान की चेतावनी - 1002
  • तेरा भाव ? खरीद दार जाने | मैं कहने योग्य भी नहीं | - भक्ति - 1002
  • बात मान , लात न मार उसको जिसके अभाव में जीवन ही भार | भार की मार खाई | अब प्यार का वार देख | कहीं मोह को प्यार न समझ बैठना | - भक्ति की चेतावनी - 1002
  • आज का साज बाज बड़ा सुन्दर | कल विकल होगा यदि आज यों ही बीतेगा | - भक्ति की चेतावनी - 1003
  • बुलबुले बुलबुल बने , पानी , प्राणी और समुद्र गरजता रहा | मछलियाँ , मगरमच्छ साथ ही में थे | प्राणों की आकुलता मछलियाँ , क्रोध आदि दुष्ट भाव मगरमच्छ , किन्तु मनुष्य ने समुद्र के आनन्द गरजन को न अपना , संसार को ही भवसागर कह भयभीत होने लगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1003
  • किसे माला पहनायेगा ? प्रिय को | क्या मिलेगा ? प्यार | अब भूख क्यों ? नहीं तो जीवन कैसा ? - भक्ति - 1003
  • विचार प्रिय हो संसार को तेरे | किन्तु उन्हें गैरों से कब फुरसत | परिणाम , वे गम से कब खाली ? न मिलन हुआ न शांत , वाह रे खेल | - चेतना - 1003
  • बनाने वाले ने असार कुछ भी न बनाया | व्यवहार न जाने तो संसार भी असार | - चेतना - 1004
  • तेरे सभी काम दुनिया से अनोखे तभी तो लोग तेरी निन्दा स्तुति करते हैं | अनोखा तो वह है जो मेरे हृदय में बसा है | - भक्ति - 1004
  • मनुष्य के हृदय का परिवर्तन किस ओर जा रहा है ? इसे विनाश कहा जाये या विकास | काश , इसे मनुष्य समझ पाता | - ज्ञान की चेतावनी - 1004
  • जीवन था प्यार के लिए | जीव शोक में डूबा , हर्ष में नाचा | जीवन वृथा , प्यार न कर सका भगवान को , भक्त को | - भक्ति की चेतावनी - 1004
  • पत्थर में भगवान की कल्पना ने ही शायद दिल पत्थर का बनाया | प्राणी छटपटाये , पत्थर घी से नहलाया जाये ? कैसा सुन्दर खेल है | - भक्ति की चेतावनी - 1005
  • तेरी भक्ती तेरा योग दिखलाई ही नहीं देता , कैसा तेरा योग है ? दिखलाने के लिए भक्ती योग नहीं यह तो प्राणों का आधार है | - भक्ति - 1005
  • केवल शरीर ही नहीं , मन भी थक चला इस चला चली से | क्या यों ही आवागमन होता रहेगा ? नहीं , शांति के उपासक शांताकारम् को पाते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 1005
  • पागल न था जिसने सार के लिये संसार बसाया | फिर साधु संत ऐसा क्यों कहते हैं | परिपाटी है | असार ही है तो भी तुझे तो सार ही ग्रहण करना है | - चेतना - 1005
  • क्यों निन्दा करूँ तेरी , सृष्टि की ? गलती मेरी | गालियाँ दूँ संसार को यह कहाँ का न्याय है ? - चेतना - 1006
  • पत्थर पुजवा कर क्या मिला पुजारी ? मन मंदिर तो यो ही नष्ट भ्रष्ट सा रहा | - भक्ति की चेतावनी - 1006
  • असहाय क्यों समझता है ? ऐसी हाय हाय ही क्या है ? - ज्ञान की चेतावनी - 1006
  • चिल्ला कर गा सब सुनें | सुनने वाला सुने चिल्लाना किसे दिखाना है ? - भक्ति - 1006
  • किसने तुझे पकड़ा ? माया ने मोह ने | झूठ , दिल ने , मन ने | मनमानी करता आया , दीवानी में दिल बहलाता आया | कहता है संसार धोखे की टट्टी है | - भक्ति की चेतावनी - 1007
  • क्या और क्यों दो संयुक्त अक्षर | इनकी समस्या हल जब युक्त हुआ , संयुक्त हुआ महान से | - ज्ञान की चेतावनी - 1007
  • कुछ दिखला | क्या बाजीगर हूँ ? खिलौना हूँ किसी के हाथ का जिसे देखने वाले की संख्या अति अल्प | - भक्ति - 1007
  • हृदय की गति बेतार के तार के साथ | तार टूटा , वीणा बेकार | चाहे हो दुःख अपार | - चेतना - 1007
  • सुख सब का था किन्तु अधिकों ने सुख को ही दुःख माना | दुःख के गीत गाते ही चल बसे | - चेतना - 1008
  • सगुण , निर्गुण तो गुण हैं | गुणातीत भावना है जिसके लक्षण कहे सुने नहीं जाते | - भक्ति - 1008
  • नभ कहता है भन भन करना छोड़ , नहीं तो यह मन तुझे कभी भी शांत न होने देगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1008
  • बालक रुदन करते हैं , मां विलाप करती है | किसके लिए ? तेरे लिये ? नहीं , मेरा मुझ में समाये , जहाँ आनन्द ही आनन्द है | - भक्ति की चेतावनी - 1008
  • भूख नींद कहाँ गई ? अर्थ की अर्थी पर | तेरी भूख नींद कहाँ गई ? प्रिय की याद में | - भक्ति - 1009
  • शिव की नगरी में भूत ? नहीं पूत है , वह पूत है जो शिव का है | - भक्ति की चेतावनी - 1009
  • वे दो थे और दो हैं | पहले चार वेद के नाम से प्रसिद्ध हुए फिर छः शास्त्र और अट्ठारह पुराण तक पहुँचे फिर तो अनेक ग्रन्थ रच गए , उनकी निन्दा स्तुति में | वे दो सोचें किन्तु यहाँ तो निन्दा स्तुति का चक्र आज भी चल रहा है | - चेतना - 1009
  • ऐसा और कैसा , कहाँ से आ पड़ा यह पैसा ? पैसा प्रधान तो ऐसा भी कैसा भी | ऐसा पैसा कमाओ कि दुनिया कहे कि यह कैसा आदमी है कि पैसे की परवाह नहीं करता | - ज्ञान की चेतावनी - 1009
  • सिर धुनना नहीं , रूई धुनना | विचारों की ऐसी रूई धुनो कि राई भी पहाड़ भी धुन धुना कर एक हो जायें | - ज्ञान की चेतावनी - 1010
  • ये झंझट , यह विवाद क्यों ? मुझे भूल बैठे - और क्या कहूँ ? - चेतना - 1010
  • वास्तव में वास तब है और निरर्थक है | - भक्ति - 1010
  • कहते हैं भगवान के भक्त को कष्ट नहीं होता ? फिर भक्त क्यों छटपटाते हैं अर्थाभाव में ? अर्थ की दुनिया प्यार की दुनिया से भिन्न | समझ का फेर है | अँधेर भी नहीं , देर भी नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 1010
  • तुझसे न माँगूँ तो किसके द्वार जाऊँ ? घर में पैठ , माँग पूरी , यदि दिल में सबूरी | - भक्ति की चेतावनी - 1011
  • थक गया मैं , तुम न थके नित नये प्रेमी मिले | - भक्ति - 1011
  • मच्छर और मक्खी का स्वभाव पाया मनुष्य ने | कहीं काटता है , कहीं चाटता है | - चेतना - 1011
  • कर्मकाण्डी ने बालकाण्ड से लंकाकाण्ड तक पढ़ा , किन्तु कर्म की पिपासा को शांत न कर सका | क्यों ? लंका जली , शंका न जली | - ज्ञान की चेतावनी - 1011
  • बने या न बने , कर्मकांडी को तो कुछ करना ही है | कर कर देख शांति कहाँ ? कर्म का मर्म क्यों नहीं समझता ? - ज्ञान की चेतावनी - 1012
  • भ्रांत वृत्तियाँ जब रूप ग्रहण करने की इच्छुक हुईं तो मिट्टी और आकाश को एक बनाने वाला मनुष्य उपस्थित हुआ | आज भी मनुष्य भ्रांत और क्लान्त क्यों ? उसने कर्ता को न जाना और न माना , पाप पुण्य की खोज ही उसका धर्म कर्म था | - चेतना - 1012
  • तुम्हें अमर किया इन प्रेमियों ने | - भक्ति - 1012
  • प्यार को किसने देखा | जिसने अपनाया प्यार को , प्रभु को | - भक्ति की चेतावनी - 1012
  • लिखकर थका , पढ़कर पराजित | जीत तेरे हाथ में तो हाय क्यों मेरे दिल में ? - भक्ति की चेतावनी - 1013
  • दुनिया मरी तुम न मरे , प्रेम पुजारी जो ठहरे | - भक्ति - 1013
  • अरे प्राणी ! यह वाणी ही एक दिन दुनिया के व्रण से तुझे मुक्त करेगी | - ज्ञान की चेतावनी - 1013
  • तुम पापी , तुम क्रोधी , कामी , लोभी कहने वाले आये | ऐसे भी आये जिन्होंने मौखिक सच्चिदानन्द कहा मनुष्य को किन्तु उस अवस्था का भान तो हृदय दान करने वाला ही करा सका जिसे लोग संत कहने लगे | - चेतना - 1013
  • विचारों का कुहासा फैला | एक हँसा एक घबड़ाया | - चेतना - 1014
  • कितना समझाया मन को कि तू ज़रा शांत हो जा , प्रशांत महासागर की तरह कि विचारों की लहर तुझे उद्वेलित न कर सके , किन्तु न सुनना चाहता है और न मानना | अब क्या हो ? - ज्ञान की चेतावनी - 1014
  • गीत और गीता ज्ञानियों के लिए , ध्यानियों के लिये . तुम्हारा तुम्हें पा कर धन्य | - भक्ति - 1014
  • हाय नहीं - है यह यही जो तेरे तन मन का दुःख दूर करेगा | पहचानता क्यों नहीं ? - भक्ति की चेतावनी - 1014
  • पत्थर में निवास ? कहाँ गया तेरा विश्वास ? मैं पत्थर नहीं , कोमल हूँ , कमल हूँ , न तू खिलता है और न मुझे हृदय में बसाता है , केवल बातों में ही दिल बहलाता है तो मैं पत्थर ही भला | - भक्ति की चेतावनी - 1015
  • मरने वाला कौन ? मनुष्य | अमर कौन ? तू , तेरा प्रेमी | - भक्ति - 1015
  • स्वयं ही यम बना हुआ है विचारों के कारण तो दुनिया दुःख पूर्ण होगी ही | स्व में यम , नियम , निदिध्यासन तक नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1015
  • जो क्षण भर के लिये शांत नहीं हो पाता था वह सदा के लिये शांत हो गया | शांत हुआ है शरीर , मन कहाँ शांत हुआ ? - चेतना - 1015
  • व्यापारी का कैसा दर्शन ? दो रोटी दो वस्त्र ही जब अदृश्य भगवान है | तब तो यह दर्शन भी महान है | - चेतना - 1016
  • कष्ट तन का , कष्ट मन का | तन के कष्ट से मन का कष्ट अधिक | मन न माने ( कष्ट ) तो तन चिल्ला कर रह जायेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1016
  • तेरी चर्चा बड़ी महँगी . तू बड़ा तेरी चर्चा महँगी | - भक्ति - 1016
  • भय यदि दुनिया का है तो किनारे बैठ | अभय हो दिल दुनिया को देख | - भक्ति की चेतावनी - 1016
  • फूल खिलता है उसे भय कैसा ? भक्त भगवान पर रीझता है उसे भय कैसा ? यदि है , तो अलभ्य कभी सुगम न होगा | - भक्ति की चेतावनी - 1017
  • बल दे कि अभिमान रहित हो कर कुछ गुण गान कर सकूँ तेरा | तू मौन क्यों है ? स्वीकृति समझूँ ? - भक्ति - 1017
  • मन को भ्रमर कहना भ्रम में पड़ना है | भ्रमर तो रस पान करता है और यह मन निरर्थक चक्कर लगाता , दुःख सुख का कारण बनता है | - ज्ञान की चेतावनी - 1017
  • एक धागे ने कागज को पृथ्वी से आकाश में उड़ा रखा है | इतना ही जीवन है | जीव को मुक्त , बद्ध करने के लिये ये ग्रन्थ क्यों ? ग्रंथी क्यों ? ( धागा -वायु , कागज - शरीर ) - चेतना - 1017
  • प्रकृति प्रति मुहूर्त रहस्य उदघाटन को प्रस्तुत किन्तु यहाँ किसे परवाह है | यह तो पर से वाह सुनने के लिये व्याकुल ही रहता है | - चेतना - 1018
  • मनुष्य दुविधा में फँस गया | प्रकृति को प्रधान माने या पुरुष को ? प्रथम प्रकृति या पुरुष ? प्रथम पुरुष | तो पुरुष को मानता क्यों नहीं ? प्रकृति मनुष्य को लिपटाये रखती है | - ज्ञान की चेतावनी - 1018
  • जग भी था मग भी था ज्योति भी थी | तुम भी थे , मैं भी था , फिर ज्योति क्यों न जली ? तू मेरे लिये कब जला ? - भक्ति - 1018
  • झूठी प्रशंसा ने यदि दिल की कोमल पंखुड़ियों को कुचल डाला तो हूक से बेचैन रहेगा | यहाँ कुचलने वाले ही देखे गये , प्रसन्न अति अल्प . - भक्ति की चेतावनी - 1018
  • जिसने पाया अपने को खो कर पाया | मिट्टी के बर्तन को भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है , फिर तू क्यों भयभीत ? - भक्ति की चेतावनी - 1019
  • यार तेरा हथियार ? प्यार | - भक्ति - 1019
  • प्रसन्न रहना भी नहीं आता तो इस भव नाट्यशाला में क्यों आया ? तू दर्शक है या अभिनेता ? दर्शक है तो प्रसन्न हो जायेगा और अभिनेता है तो कर्त्तव्य बन्धन में बँध जायेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1019
  • मेरा इरादा बुरादा होता जा रहा है | दोष किसे दूँ ? - चेतना - 1019
  • धन और धर्म का युद्ध चला आ रहा है , कभी धर्म पराजित और कभी धन | - चेतना - 1020
  • कान मिले हैं तान सुनने के लिए आनन्द लहर की | शान , गुमान के लिए न तरस | रस ग्रहण किया तो जीवन सफल अन्यथा आवागमन तो लगा हुआ ही है | - ज्ञान की चेतावनी - 1020
  • आभास दे या वास दे , प्रवास में कहाँ सुख ? - भक्ति - 1020
  • श्रद्धा बड़ी या प्रेम ? वासना की बात निरर्थक | - भक्ति की चेतावनी - 1020
  • दूध में जल मिला कीमत बढी , किन्तु जल को बड़ी महँगी कीमत चुकानी पडी | स्वयं जला दूध को जलने न दिया | - भक्ति की चेतावनी - 1021
  • स्मृति मृत्तिका में मिल गई जब मिट्टी में खेलने लगा . मृत्तिका मूर्ति में बदल गई जब तुम्हारी स्मृति पुनः जागृत हुई | - भक्ति - 1021
  • काम में भी लगन , राम में भी लगन | लगन नहीं तो मगन कैसे होगा प्राणी | प्राण बेचैनी का नाम नहीं , बेचैनी तो कार्य की पूर्ति के लिये है यदि लगन का अभाव है | - ज्ञान की चेतावनी - 1021
  • धर्म भी एक धन है जिसकी कीमत करने वाले ही करते हैं | प्रेम भी एक योग है जिसे जानने वाले ही जानते हैं | न कर्म प्रेम न धर्म प्रेम | प्रेम तो स्वयं परमात्मा है | वासना की बात निराली | - चेतना - 1021
  • ये भोले प्राणी चतुर होने का दावा करते और दावानल में जलते रहते हैं | चतुर तो तब होते जब जलते नहीं , छटपटाते नहीं | - चेतना - 1022
  • सुख दुःख को बराबर मनुष्य कर न सका जब तक कि मनुष्य प्यार को अपना न सका | प्यार में कष्ट नहीं , वासना कष्ट दायक | - ज्ञान की चेतावनी - 1022
  • आई ऋतुएँ तुम्हारे स्वागत के लिये , बदलती गई तुम्हारे आनन्द के लिये फिर भी शिकायत ? धन्य हो तुम | - भक्ति - 1022
  • आदर्श की बातें प्रिय किन्तु अवस्था में परिवर्त्तन कब सम्भव , जब तक प्राप्ति के लिये न मर मिटे | - भक्ति की चेतावनी - 1022
  • उमंग की अवस्था निराली - अंग अंग में जोश - प्रेम में कहाँ रहता है होश ? - भक्ति की चेतावनी - 1023
  • सुख दुःख किसने माना ? मन ने . मन को किसने माना ? मैं ने | मैं को किसने माना ? मैं क्या बताऊँ ? तुम्हीं जानो | - भक्ति - 1023
  • चरण स्पर्श किया धरा ने , धन्य हो गई | मस्तक स्पर्श किया नभ ने , प्रसन्न हो गया | तू विराट , अपने रूप को पहचान | न तू क्षुद्र है और न तू शूद्र | महान की सन्तान , महान | - ज्ञान की चेतावनी - 1023
  • दोष किसे कर्म को या भ्रम को ? भ्रम यह था कि मर्म को न जान केवल कर्म के गीत गाता | - चेतना - 1023
  • यदि दीपक ने निमन्त्रण नहीं दिया पतंगों को तो वे आये क्यों ? रूप शिखा ने उनको बेचैन किया | विषयों की भी वही बात है | घात पर घात है | - चेतना - 1024
  • प्रकृति की शांति भंग करने वाला यह कौन ? मानव | न मानता है और न नमन करता है कर्त्ता को , केवल हाय रोटी , हाय रोटी कह कर चिल्लाता है | प्रकृति विक्षुब्ध | - ज्ञान की चेतावनी - 1024
  • समीप रह कर जिसने सताया वह कौन है ? तुम | - भक्ति - 1024
  • मर्यादा ने केवल निर्वाह किया भावनाओं का किन्तु प्रेम के प्रवाह ने असीम ही बना दिया व्यक्तित्व को | - भक्ति की चेतावनी - 1024
  • आज भी पृथ्वी विकलता से काँप उठती है | मिलन का वियोग असह्य | - भक्ति की चेतावनी - 1025
  • करता है और डरता भी है यह कैसा व्यवहार ? डर मत चलता चल | भय कैसा ? - ज्ञान की चेतावनी - 1025
  • अब छिपे रहो , जब पकड़ पाउँगा तो तुम-तुम न रह सकोगे - मेरे ही कहलाओगे | - भक्ति - 1025
  • प्रकृति ने ऐसी प्रकृति बनाई कि कर्ता को ही भूल बैठा | इसका सुधार ? सुधा पान कर , आत्मा को पहचाने तो समझ पाये कि ये प्रकृति के खेल हैं | - चेतना - 1025
  • अमर बातें मरती नहीं | ओठों की शोभा बढ़ाती , ओठों से ओठों पर जातीं , दिल बहलातीं , दिल में बस जातीं , तभी तो अमर हो जातीं | - चेतना - 1026
  • संस्कृति और संस्कार की बातें , बातें ही है | संस्कृति और संस्कार बदलते देखे गये हैं | बदलता नहीं है एक , जो सर्वव्यापी है | - ज्ञान की चेतावनी - 1026
  • भूकम्प यदाकदा किन्तु हृद कम्प प्रति मुहूर्त | नहीं तो निष्प्राण हो जड़ बन जायगा | यह कम्पन प्रभु मिलन के लिए तो मंगलमय अन्यथा निष्प्राण ही है | - भक्ति की चेतावनी - 1026
  • एकान्त में भी कांत न मिला | अशांत ( मन ) कैसे शांत हो | - भक्ति - 1026
  • लेनदेन में दिल का स्थान कहाँ ? बुद्धि प्रधान | किन्तु समर्पण अद्भुत है | - भक्ति की चेतावनी - 1027
  • श्रवण में भी शांति है मनन में भी यदि मनुष्य अपनी अशांति को भूले | - ज्ञान की चेतावनी - 1027
  • ध्वनि गूँज रही है क्रन्दन की | इसमें भी प्रणय की झंकार है | अजब सूझ है | - चेतना - 1027
  • वेदों में सुना तू देव है | लीला में देखा तू वेद है , वैद्य है प्रेम रोग का | - भक्ति - 1027
  • कवि कभी कभी तेरी झाँकी का वर्णन करते हैं शब्दों में | भक्त तो आँखों में देखता है अरुपी का रूप | - भक्ति - 1028
  • किस ओर देखूँ कि मन को कष्ट न हो ? मन को पूछ तुझे कष्ट क्यों है ? मन का कष्ट भी मन ही जाने | कष्ट कहीं है नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1028
  • देखना मेरा काम और तड़फना दिल का | मन कभी मगन , कभी बेचैन | खेल ही तो था , समझ न सकी सत्य मिथ्या को ( आँखें ) | - चेतना - 1028
  • धर्म - नियम बंधन में सीमित फिर प्रेम का स्थान कहाँ ? प्रेम बिना झूठा है संसार | - भक्ति की चेतावनी - 1028
  • मां ने प्यार पुत्र के रूप में देखा , पिता ने कर्त्तव्य के रूप में | आज भी प्यार की जीत है - कर्त्तव्य तो बंधन का हेतु बना | - भक्ति की चेतावनी - 1029
  • यह चमत्कार शांति का ? अद्भुत | पाने वाले ही पाते हैं | - चेतना - 1029
  • चिन्ता अग्नि , चिन्तन शीतल जल | जल पिला चिन्ता को कि चिन्ता शांत हो | - ज्ञान की चेतावनी - 1029
  • ऐसा दिल दे की मिल जाये और खिल जाये , तुम्हारे रूप में और प्रेम सागर में | - भक्ति - 1029
  • कथा ही कथा थी जब तक संत ने सत्य का रूप न दिखलाया | - भक्ति - 1030
  • तुम कौन हो जो बिजली की तरह चमकती हुई अदृश्य हो जाती हो ? आशा | और तुम कौन हो जो महा अंधकार पूर्ण रात्रि की तरह भयभीत करती हो ? निराशा | - ज्ञान की चेतावनी - 1030
  • यह अमृत की वर्षा किनके लिए ? जो मृत्यु पर विजय पाना चाहते हैं | - चेतना - 1030
  • वासना की अग्नि जलती रही , उसी को प्रकाश माना | प्रेम तो वह जल है जो वासना की गंध को भी बदल डालता है | - भक्ति की चेतावनी - 1030
  • कवि चिर यौवन का अभिलाषी | भक्त चिर मिलन का | भला बुरा कहना बेकार | - भक्ति की चेतावनी - 1031
  • मिट्टी में फूल खिलते हैं यह वही लोक है | पाप पुण्य की धारणा ने इसका रूप ही बदल दिया | - ज्ञान की चेतावनी - 1031
  • मक्खी और झक्की बेचैन | कितना भिनभिनाये ? आखिर शांति तो रस पान में है | - चेतना - 1031
  • मां आश्चर्यचकित , पिता पुलकित , आज अबोध बालक मां मां पुकार रहा था | - भक्ति - 1031
  • तैने क्या किया तेरे लिये सत्य संत के रूप में आया ? क्या कहूँ सत्य ही जानता है | - भक्ति - 1032
  • मेरे कान गुनहगार | मैंने तो पाप पुण्य की कथा सुनी | प्रेम की कथा भी वासना ही जगाती रही | किसे दोष दूँ ? - चेतना - 1032
  • संकेत कर , हे प्रकृति कि तू प्रधान या पुरुष ? पुरुष ही पुरुष को पहचानता है | - ज्ञान की चेतावनी - 1032
  • पल भर का अनुभव जीवन की सार्थकता है | - भक्ति की चेतावनी - 1032
  • प्रेम भी , भय भी | दूध में कीचड़ अनुचित | - भक्ति की चेतावनी - 1033
  • फूल मुरझाया | क्यों ? समर्पण न हुआ जिसके लिए आया था | भ्रमरों ने रस पान किया | मुरझाना ही शायद अंतिम कार्य था | - चेतना - 1033
  • तुम छिपे , अंधकार आया , ये तारे , चन्द्र , सूर्य भी कहीं दिल के अंधकार को दूर कर सकेंगे ? - भक्ति - 1033
  • अन्नपूर्णा ने केवल अन्न ही नहीं दिया तन की रक्षा के लिए मन को भी भाव दिया | एक स्थूल था दूसरा सूक्ष्म | ( अन्न ) - ज्ञान की चेतावनी - 1033
  • जब बादल बरसा तो जल भूमि पर आया | लोगों ने कहा गंदा जल है | भूमि के लोग कब समझ पाये कि जलती हुई भूमि बादल से न देखी गई | - चेतना - 1034
  • जल के व्याकुल प्राणी ! जल ही तेरी गति , भक्ति मुक्ति स्थान है , फिर आकुल क्यों ? - भक्ति की चेतावनी - 1034
  • तुम ही तम में जा छिपे तो हम जी कर क्या करेंगे ? - भक्ति - 1034
  • सत्य की चाह होती तो सच्चा होता | झूठ और सच के झूले ने भ्रम पैदा किया | - ज्ञान की चेतावनी - 1034
  • जलते हुए दीपक को देखकर कहा - यह जलता क्यों है ? अरे ! यह जलेगा नहीं तो प्रकाश कैसे फैलायेगा | - भक्ति की चेतावनी - 1035
  • निम्न कोटि के प्राणी सदा व्याकुल रहे , न प्रेम समझा न वासना | - चेतना - 1035
  • स्वतः कार्य हो रहे हैं फिर अनुकूलता प्रतिकूलता क्यों प्रतीत होती है ? यह मन की निर्भरता है जिसे साधारण जन जान नहीं पाते | - ज्ञान की चेतावनी - 1035
  • प्रेम की प्रशंसा करूँ या निन्दा ? जिसने भगवान को भी भिक्षुक बनाया | - भक्ति - 1035
  • क्या कहकर तुम्हें पुकारूँ ? सभी तो मिथ्या | झूठे लोगों ने तो तेरा नाम ही बदनाम किया | - भक्ति - 1036
  • संतों की नगरी शांत | हुल्लड़ वाले घबड़ाये | न रूप न नाम | यह कैसा राम ? - चेतना - 1036
  • प्रेम को बुरी निगाह से न देख , तू ही लज्जित होगा | - भक्ति की चेतावनी - 1036
  • अपने को पहचानना ही अद्वैत भाव है | सत्य और मिथ्या तो बुद्धि का चमत्कार है | - ज्ञान की चेतावनी - 1036
  • पत रखेगा , तप कर मिलने के लिये | क्या मेल अच्छा नहीं ? प्रिय का खेल अच्छा नहीं ? - भक्ति की चेतावनी - 1037
  • कामना - काम में ही छिप रही - राम न खोजा | काम में ही आराम फिर राम का क्या काम ? - चेतना - 1037
  • क्यों प्यार दिया और क्यों मोह ? जब दोनों ही विकल करते हैं - भगवान के लिए , मनुष्य के लिए , वस्तु के लिए | - भक्ति - 1037
  • वेद पढ़े , सवंदे न हुआ तो विद्या , बुद्धि का ही विलास मात्र है | - ज्ञान की चेतावनी - 1037
  • जब जब याद किया माया ही फैलाई | क्या मिला तुझे ? - भक्ति - 1038
  • चन्द्र मेरा , सूर्य मेरा कह कर स्वार्थी न बन | चन्द्र सूर्य ही नहीं , सम्पूर्ण विश्व सब का | अनुभव कर आनन्द पायेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1038
  • एक छोर पर जीव एक छोर पर शिव | विचारों के लक्कड़ का खेल | कभी जीव ऊपर कभी शिव | - चेतना - 1038
  • प्राणों की बाँसुरी बजाने के पूर्व , हृदय को रसपूर्ण कर ले अन्यथा बाँस की बाँसुरी में कहाँ चमत्कार | - भक्ति की चेतावनी - 1038
  • मोर पंख वाले ने कहा - रमो विश्व प्रेम में | उड़ो कल्पना में जितना मोर उड़ता है | नूपुर की ध्वनी से संसार को आनन्दमय बनाओ तो तुम्हीं कृष्ण | - भक्ति की चेतावनी - 1039
  • सुन कर गुण , श्रवण मनन स्वतः होगा | शब्द सरलता का साथी है , गूढ़ता का नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1039
  • इच्छा शक्ति प्रबल - जगत बनाया उसीमें समाया फिर भी पार न पाया | - चेतना - 1039
  • पीना क्या , तेरे बिना जीना क्या ? - भक्ति - 1039
  • किसी का दिल चुराया , किसी का धन | किसी को किसी काम का न रखा | क्या यही तेरा प्यार है ? - भक्ति - 1040
  • निराकार का खेल तो विचारों का है | साकार का खेल तो और भी अद्भुत | इतने रूप , कि भ्रमित हो गया | - चेतना - 1040
  • अनपढ़ तो अज्ञ नहीं | पढ़ कर भी जान न पाया अपने को , प्रभु को वही अज्ञ | - ज्ञान की चेतावनी - 1040
  • प्राणों में मिलन की तड़पन नहीं तो क्या भक्ति करेगा ? पत्र पुष्प से प्रसन्न होने वाला वह भगवान नहीं | वह तो चाहता है तेरे हृदय में मधुर स्थान | तब कहीं प्राणों को शांति | - भक्ति की चेतावनी - 1040
  • प्राणों में तडपन का भान | अब प्रसन्न तेरा भगवान | - भक्ति की चेतावनी - 1041
  • बीज का रूप देखा ? जीव का खेल देखा ? बीज फिर भी समझा जा सकता है किन्तु जीव को समझना जीव का काम नहीं | - चेतना - 1041
  • माया है तो यहीं रह , मुझे तो तेरे पति से मिलना है | - भक्ति - 1041
  • कंचन और कंचनी , कंचन और कामिनी में क्या अंतर | अंत तक तर होने नहीं देती इनकी भावना | कामिनी लुभाती और कंचनी नचाती | - ज्ञान की चेतावनी - 1041
  • कुछ क्षण तो ऐसे दे की पलक में झलक हो मन पर , तन पर तेरे रूप की | - भक्ति - 1042
  • कैसी प्रकृति बनाई , प्राणी प्रकृतस्थ न हो पाया | - चेतना - 1042
  • गाता है रिझाने के लिये | स्वयं तो प्रसन्न हो जा | तेरी प्रसन्नता ही उसकी प्रसन्नता है | - भक्ति की चेतावनी - 1042
  • सत्य की परछाई का नाम संसार | फिर यह मिथ्या कैसे ? व्यवहार यदि सत्य के लिये हो | - ज्ञान की चेतावनी - 1042
  • गीता - जीवन यों ही बीता | पढ़ता ही रहा | दिल में क्या रहा , दिल ही जाने़ं | - ज्ञान की चेतावनी - 1043
  • श्वेत में श्याम बसा आँखों में , फिर भी पहचान नहीं | लालिमा लाल की है , तुझे ज्ञान नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 1043
  • परिवर्तन उनके लिए जो पर के शुभ विचार का वर्तन अपनाये | नहीं तो पट परिवर्तन है | रूप बदले , नृत्य वही | - चेतना - 1043
  • तन की शोभा मन जब शांत | मन की शोभा तुम हो कान्त और तुम्हारी शोभा ? तुम हो और मुझे मैं का पता न हो | - भक्ति - 1043
  • शांत ही रहकर क्या करूँ , जब मन खेल चाहता है विचारों का | विचार भी खेल ही है | तन शांत होने के पूर्व मन शांत हो जाता तो फिर तन न धारण करना पड़ता | - भक्ति - 1044
  • संसार की जलन को शांत करने के लिये शिव ने गंगा धारण की मस्तक पर | दुनिया ने न गंगा की महिमा जानी और न शिव की | वाह री दुनिया - बहरी दुनिया - वह रही दुनिया | बह रही दुनिया पाप पुण्य के प्रवाह में | - ज्ञान की चेतावनी - 1044
  • प्रकृति ने मानव प्रकृति को ऐसा मोहित किया कि अपनी कृति भूल , विकृति का खेल देखने लगा | - चेतना - 1044
  • रंग में रंग जमा , जब दिल रँगा प्यार में | - भक्ति की चेतावनी - 1044
  • जगत पति का पता था , पत्ता-पत्ता में किन्तु पढ़ता रहा शुष्क पंक्तियाँ जिनका ज्ञान , मान , अभिमान करता रहा | - भक्ति की चेतावनी - 1045
  • यहाँ हाय-हाय की जरूरत नहीं , वाह-वाह की है | गम गलत हो जायेगा फिर मजा , मजा ही पायेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1045
  • दिल लगाना आसान | दिल में बसाना कठिन | - चेतना - 1045
  • कभी दिया , कभी छीना , यह कैसी छीना झपटी है ? दिया है तो मन को क्यों चंचल किया ? - भक्ति - 1045
  • संत के द्वारा शांति तथा अवतारी के द्वारा शक्ति , सत्य प्रसारित करता है उसे भक्त कहो या भगवान | - ज्ञान की चेतावनी - 1046
  • द्विज दो बार संध्या के रूप में , मुसलमान पाँच बार नमाज के रूप में तुझे स्मरण करते हैं | अरे पागल मन तू क्यों बार-बार उसे याद करता है ? क्या करूँ रहा नहीं जाता | - भक्ति - 1046
  • जिसे ईमान न आये , उसे क्यों सुनाये ? - चेतना - 1046
  • आशा जब छलने लगी तो निराशा ने कहा - मैं तेरा त्याग नहीं करती | अरे ! आशा निराशा के चक्कर में न पड़ , कष्ट ही कष्ट है | - भक्ति की चेतावनी - 1046
  • उत्तेजना प्रेम नहीं , वासना नहीं , उत्तेजना क्षणिक मानसिक तरंग , परिणाम भला हो या बुरा | - भक्ति की चेतावनी - 1047
  • जला कर भी शांत न हो पाई दुनिया फिर भी याद करती है | यह प्रेम है या घृणा ? - चेतना - 1047
  • आज सजे साज | अब साजन आये , संत जन आये | - भक्ति - 1047
  • स्थूल का स्वाद ही कुछ ऐसा होता है कि वह उसे सूक्ष्म की ओर ताकने ही नहीं देता और देता है - यह नहीं - वह नहीं - सन्तोष शान्ति दुर्लभ | - ज्ञान की चेतावनी - 1047
  • ध्वनी गूँजी प्रिय की | रोम रोम पुलकित हुआ | - भक्ति - 1048
  • ऐसी सृष्टि ही क्यों रची , जो धर्मात्माओं की दृष्टि से पाप पुण्य से न बची ? दर्शन होता , भ्रम दूर होता | - चेतना - 1048
  • उत्तेजित भाव वह ज्वार है जो डुबो देता है किनारे पर खड़े हुए को | भाटा आया व्यक्ति हताश | यही क्रम चला आ रहा है | - भक्ति की चेतावनी - 1048
  • क्षण भंगूर | अक्षय होना चाहता है तो अविनाशी का भाव ले अन्यथा यहाँ आना जाना बेकार | - ज्ञान की चेतावनी - 1048
  • प्रेम कहो या वासना यह तो उत्तेजित भाव है | स्थिर रहे तो स्थिति बने | - भक्ति की चेतावनी - 1049
  • यह धर्म है या संस्कार जिसके लिए मनुष्य बेचैन होता है ? धर्म के लिए यदा कदा | - चेतना - 1049
  • हीरा भी पत्थर ही था और तू भी पत्थर ही | भक्त ने बतलाया तू भगवान और हीरा कीमती | - भक्ति - 1049
  • इस तेरह ने अनेक को मार्ग दिखलाया | गुरु नानक भी इसी के चक्कर में आए थे | तेवर बदलती है दुनिया | तेरह कहता है तीन तेरह न हो , मिल कर कुछ मिलेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1049
  • यह कौन सी इच्छा है जो मिटाये नहीं मिटती ? प्यार की | विकृत प्राणी के संहार की , माता के दुलार की , पिता के प्रेम व्यवहार की , संसार के अनोखे प्रचार की , अभिलाषा के संचार की , आचार की , विचार की , भौतिक वाद के प्रसार की , निरर्थक अहंकार की , शुभ समाचार की | - ज्ञान की चेतावनी - 1050
  • कमल और धान को खिला हुआ देख मन कहने लगा - कुछ मुख को चाहिये और कुछ दिल को | मुख में तुम्हारा नाम , दिल में तुम्हारा धाम , चाहे सुबह हो चाहे शाम | - भक्ति - 1050
  • प्रत्येक क्षण के हवन में तेरा योग ? योग कहाँ , मैं तो भोग की आशा में ही जलता आया | हवन करते हाथ जलता यही देखा | - चेतना - 1050
  • क्षणिक भावना कभी-कभी अग्नि का काम करती है | अनेक संस्कार भस्मीभूत | - भक्ति की चेतावनी - 1050
  • बादल बरस रहे थे , प्रकृति प्रसन्न हो रही थी | आज उसके पुत्र प्रतिदान में रत थे | संग्रह महान किन्तु प्रतिदान तो जीवन की सार्थकता है | - भक्ति की चेतावनी - 1051
  • शांत प्रकृति अशांत मन | कैसी विडम्बना है | प्रकृति भीतर की न थी | अशान्त होता ही | - ज्ञान की चेतावनी - 1051
  • आज तू चला तो दुनिया तुझे सजाना चाहती है | अब तक कहाँ थी दुनिया ? गालियाँ देती थी , निन्दा करते-करते थकती न थी | - चेतना - 1051
  • हृदय की धड़कन ने कहा - धर कण प्रिय के चरण रज की | आनन्द ही आनन्द है | - भक्ति - 1051
  • दीपक बुझने के पूर्व प्यास बुझा वासना की , प्रेम की | नहीं तो जलती रहेगी वासना | देह , गेह , मिथ्या नेह | - भक्ति - 1052
  • मौज कर , जिसे मौखिक कहने वाले अधिक , करने वाले अति अल्प | करने वाला कोई और है इसे जान , फिर मौज ही मौज है | - ज्ञान की चेतावनी - 1052
  • शादी हुई निकटतम सम्बन्धियों ने गम मनाया क्यों ? धर्म पिता ने धन न दिया | शांति रूपी वधु तो दी | - चेतना - 1052
  • पीया नहीं , पिया पिया चिल्लाने लगा , कहाँ शान्ति ? - भक्ति की चेतावनी - 1052
  • प्रथम पी फिर पिया कह | यों ही पिया पिया से कहाँ तृषा शान्ति ? - भक्ति की चेतावनी - 1053
  • दोष दुनिया का नहीं , दुनिया वालों का है जो हाय-हाय में , वाह-वाह में - नाथ को पहचानते ही नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1053
  • कली को देखकर पश्चाताप क्यों ? कली खिलेगी फिर पश्चाताप न रहेगा | कली खिलेगी बेकली से | - चेतना - 1053
  • प्रेम की पगडण्डी पर न चल | दंड देगी दुनिया - दण्डी बना देगा प्रेम | - भक्ति - 1053
  • चितचोर , रचो ऐसा लोक जो अलौकिक हो भाव का , प्रीति का , अदभुत रीति का कि भूल जाऊँ भूल को , शूल को , स्थूल को , फूल को | - भक्ति - 1054
  • दुनिया के विचारों की फौज तेरी मौज को क्या जानें ? फौज कटेगी , मौज आनन्द करेगी | - चेतना - 1054
  • पाया प्राणों में , खोया श्वासों में प्रिय को , जीवन को | - भक्ति की चेतावनी - 1054
  • मनुष्य मौन रह कर बोलता है | आँख बंद करके भी देखता है | कम आश्चर्य नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1054
  • प्यार का कोई वेद नहीं , शास्त्र नहीं | नहीं को हाँ में बदलने वाला प्यार ही है | - भक्ति की चेतावनी - 1055
  • वाक् शक्ति नहीं वायु शक्ति | वायु अग्नि को प्रज्वलित करती तथा वाणी का रूप धारण कर प्रवाहित होती | चाहे हित हो या अनहित | - ज्ञान की चेतावनी - 1055
  • जब हुई छँटाईं तो उसकी याद आई | अब ? भूल बैठा सब | - चेतना - 1055
  • सँभाला , फिर भी हो गया मतवाला कैसा आकर्षण है तेरी वाणी का | - भक्ति - 1055
  • चाव चाहिये और भाव चाहिये | अभाव , प्रभाव का चक्कर क्यों ? - भक्ति - 1056
  • व्यक्त हुआ भाव , दिल में था चाव | दुनिया देखने लगी हाव भाव | फिर कहा - न सुना | क्यों ? दिल में टीस उठती है | - चेतना - 1056
  • मूर्ती पर आवरण है स्थूल द्रव्य का | आवरण है विचारों का , मनुष्य के दिल दिमाग पर | बेचैन होगा ही | - ज्ञान की चेतावनी - 1056
  • प्यार को क्यों बदनाम करती है दुनिया ? सह नहीं सकती , खुद करे तो जानें कि प्यार कैसा होता है ? - भक्ति की चेतावनी - 1056
  • संसार का सुख वैभव न्योछावर किया प्यार के लिए | त्याग किया नहीं,। हो गया जब प्यार किया। - भक्ति की चेतावनी - 1057
  • नष्ट होता है स्थूल , सूक्ष्म तो सक्षम है , नाशवान नहीं फिर चिन्ता क्यों ? मन आदत से लाचार | - ज्ञान की चेतावनी - 1057
  • मरूँ या तरुँ ? भूमि ही भूमि है | जल का कहीं निशान नहीं | - चेतना - 1057
  • नील गगन में , श्याम सागर में मेरा श्याम कहाँ , राम कहाँ ? पागल , गर्दन झुका , देख दिल के आइने में , बाहर क्यों ? - भक्ति - 1057
  • मीठा दर्द क्यों ? प्रिय की अनुभूति प्राणों में नवीन स्पन्दन करती हैं | - भक्ति - 1058
  • आचार्य - आश्चर्य क्या है ? आशा ही आश्चर्य | प्रति मुहूर्त जहाँ परिवर्तन , वहाँ जो हो जाये वही अच्छा है | - चेतना - 1058
  • वासना का भूखा कब प्यार कर सका ? वासना जलाती | प्यार की लता लहलहाती आँसुओं को पाकर | - भक्ति की चेतावनी - 1058
  • मोह ने चिन्ता दी और मोहन ने शांति | चिन्ता को चिन्हता नहीं प्राणी | - ज्ञान की चेतावनी - 1058
  • तुझे अपने दिल सागर के दो मोती अर्पित करने पड़ेंगे प्यार के लिए | संसार आँसू कह कर उपेक्षा करेगा किन्तु तेरा - - - उसे पाकर निहाल हो जाएगा | - भक्ति की चेतावनी - 1059
  • अब तक जलता रहा , मरता रहा चिंता में । आज बदल गया दिल । जल्ता है प्राणों के स्वामी के लिए और मरता है उसके बच्चों की रक्षा के लिए ( बच्चे भक्त , प्राणों का स्वामी प्रभु ) । - भक्ति - 1059
  • भोग के दीवाने | संत ही शांति का उपभोग करते हैं | अन्य प्राणी अन्त करते हैं जीवन का यों ही | - चेतना - 1059
  • आह और वाह ही दुःख सुख का रूप धारण करते हैं | कुछ सोच विचार ने चिन्ता को जन्म दिया | - ज्ञान की चेतावनी - 1059
  • ज्ञान ध्यान की बातें ? ज्ञान का भान भी होता तो प्रिय के प्यार से वंचित होता | और ध्यान तो करता नहीं , रहता है कि मैं किसी का हूँ | - भक्ति - 1060
  • क्या मैंने चाहा , क्या मैंने पाया ? उदर पूर्त्ति तो पुनः उदर तक पहुँचायेगी और क्या काम आयेगी ? - चेतना - 1060
  • दिल से प्यार किया दिलदार को | दिल खो न बैठा , किसी का हो न बैठा | - भक्ति की चेतावनी - 1060
  • श्रृंगार स्थूल का , विहार और संहार भी स्थूल का | सूक्ष्म , विचारों का विनोद वहाँ संहार कहाँ ? - ज्ञान की चेतावनी - 1060
  • तन से मुक्त हुआ प्राणी किन्तु मन से मुक्त यदि न हो सका तो पुनः तन धारण करने को वाध्य | मन से यदि मुक्त होता तो तन न धारण करना पड़ता | - ज्ञान की चेतावनी - 1061
  • तेरा धर्म क्या ? प्यार | और कर्म ? प्यार | और भाषा ? वह भी प्यार | तैं ने पाया है , जग का सार | - भक्ति की चेतावनी - 1061
  • अभ्यास और अध्यास सुनती और देखती आई दुनिया | कहाँ शांति ? शांति है जहाँ संधि है विचारों की , जहाँ आराधना है प्रेम की | जहाँ ज्ञान है स्वयं का , जहाँ भान है रूप का भाव का | - चेतना - 1061
  • नसें सन गईं प्यार में | अब बातों का वार किस पर करे ? - भक्ति - 1061
  • जलने वाले मिले , जलाने वाले मिले | मिलाने वाले प्यास बुझाने वाले , तुम्हीं मिले | - भक्ति - 1062
  • देख इस दुनिया की ओर जो हाय-हाय में लगी है | देख , उस दुनिया की ओर जहाँ हाय-हाय नहीं , वाह-वाह नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1062
  • आँखें क्या देखती है ? देखती नहीं , खोज रही हैं प्यार को । प्यार प्रिय क्यों ? प्रिय का प्यार ही तो असार को सार बनाता है । - भक्ति की चेतावनी - 1062
  • आस है तो पास है | नहीं तो पाश ( फंदा ) है | - चेतना - 1062
  • मनुष्य ने भगवान को ललकारा और पुकारा | भगवान हँस रहा था | - चेतना - 1063
  • कोमल पद भी इस हृदय मल को दूर न कर सके तो दोष किसका ? न कमल का , न पद का । कमल की कोमलता न अपनाई और पद को हृदय से न लगाया । - भक्ति की चेतावनी - 1063
  • देखे नजारे ( तुम्हारे ) कहा दिल में न जा रे , तड़पेंगे प्राण बेचारे | सँभाले न सँभलेंगे भाव हमारे | हाथ मलता है | मिलाता क्यों नहीं ? ( हाथ ) - भक्ति - 1063
  • गति की ओर न देख - जीवन की ओर देख | यह गति शील है | दुर्गति के लिए जीवन नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1063
  • सत्य अनुभव चाहता है मानव के द्वारा | अनुभव हीन के लिए सभी सत्य , सभी मिथ्या | - ज्ञान की चेतावनी - 1064
  • जब तक देखा नहीं , तभी तक अजब , गजब । नहीं जी , अजब अनोखा , गजब में तो अक्ल हैरान । - भक्ति की चेतावनी - 1064
  • दिल और दिमाग के झगड़े में विजयी होता है दिल और कहीं - कहीं दिमाग दबा पाता है दिल के भावों को | - चेतना - 1064
  • मैं प्रतीक्षा करता हूँ तू परीक्षा लेता है | सौदा कैसे पटे ? - भक्ति - 1064
  • संकीर्णता - संग नहीं करने देती संत का | नित्य कर्म न भक्ति है और न श्रद्धा विशेष | ये कर्म तो होते रहते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 1065
  • प्रिय तो कहते हो किन्तु क्या प्यार पाया ? जब भुला न सके अहं को , रिझा न सके स्वयं को । - भक्ति की चेतावनी - 1065
  • कोयले को हीरा किसने बनाया ? उसके व्यवहार ने | हीरे को कोयला किसने बनाया ? उसके व्यवहार ने | - चेतना - 1065
  • छोटी सी बात थी | निकल पड़ा था भ्रमण के लिए | आज घर लौटना कठिन हो रहा है | किससे पूछूँ , सभी तो पापी कह कर पुकारते हैं - मुझे | - भक्ति - 1065
  • बसाया था प्रेम के लिए , तभी तो प्रेम से ही बस में होता है | पाप पुण्य न जाने कहाँ से टपक पड़े | - भक्ति - 1066
  • ज्ञान कैसा , अभिमान कैसा ? शांत हो तो भ्रांति मिटे | - ज्ञान की चेतावनी - 1066
  • क्यों प्यार को लजाते हो जब वासना से ही मुक्त न हो पाये ? - भक्ति की चेतावनी - 1066
  • बसाई थी बस में रखने के लिए किन्तु सदा कहती रही - बस आई | - चेतना - 1066
  • तेरी दृष्टि में मेरी सृष्टि समाई , भगवन ! तेरी दृष्टि में मेरी सृष्टि समाई प्यारे ( भक्त )| - भक्ति - 1067
  • प्रेम को किसने देखा , किसने पाया ? जब ज्ञानी बना , भक्त बना | - भक्ति की चेतावनी - 1067
  • गम कम , यदि सम विषम का भाव न रहे | - ज्ञान की चेतावनी - 1067
  • अभिलाषा और आशा ने मेरा तमाशा बना डाला | किसे दोष दूँ ? दिल में बसने वाला ही यदि दिल दुखाए तो खैर कहाँ ? - चेतना - 1067
  • देख इन बच्चों को जो तुझे भूल , रोटियों के लिए ईमान बेचते हैं | तेरे बच्चे और रोटियों के लिए तरसे ? क्या करूँ , इन्हें ईमान नहीं कि मैं भी उनका कोई हूँ | - चेतना - 1068
  • शांत चिड़िया गाती - अशांत फुदकती | यही अवस्था मन की है | - ज्ञान की चेतावनी - 1068
  • काम पर दुनिया नाचे | दाम पर दुनिया नाचे | तू नाम पर राम के नाम पर नाचा | अब दुनिया तेरी , तू दुनिया का , चाहे नचा , चाहे बचा | - भक्ति - 1068
  • मैंने प्रिय के लिये पद गाए | विद्वानों ने व्याख्या की कर्म , भक्ति , ज्ञान की | मेरे गीत गीता बन गए | भक्त के लिए न गाए थे | - भक्ति की चेतावनी - 1068
  • प्यार के लिये झुका | भक्तों ने कहा - राधा के चरणों में कृष्ण किन्तु राधा का दिल किसने देखा ? वह मुझी में समा गई , मेरे हृदय की ज्योति थी | - भक्ति की चेतावनी - 1069
  • अजब और गजब में कौन बड़ा ? अजब देख कर चकित हुआ प्राणी और गजब तो भयभीत करता रहा | - ज्ञान की चेतावनी - 1069
  • अबोध , अज्ञानी प्राणी कह कर संसार ने लगाया काम में | अब काम ही राम बन बैठा , आराम कहाँ ? - भक्ति - 1069
  • कहाँ चला आया , जहाँ अपना कोई नहीं | अपना , सब अपने हैं , नहीं तो सभी सपने हैं | - चेतना - 1069
  • क्रोधी देखे शोधी देखे | विरोधी देखे , हमदर्द भी देखे किन्तु कम | ऐसा क्यों ? - चेतना - 1070
  • नर बना बानर बना | नचाती रही कामना , भावना | आज नारायण की कृपा से नर नारायण मिला | कामना शांत , भावना भाव में समाई | - भक्ति - 1070
  • गुण जब गुण में समा रहे हैं तो मनुष्य पाप पुण्य के लिए क्यों परेशान ? मनुष्य ने अपनी नासमझ , समझ को ही प्रधानता दी | - ज्ञान की चेतावनी - 1070
  • कंस भी मेरा ही अंश था | लोग कहते है मैंने उसका वध किया वध नहीं किया उसको भी अपनाया क्योंकि वह भी मेरा था | - भक्ति की चेतावनी - 1070
  • भक्त सताये जाते वाणी से , कायिक दण्ड से | सत्य को सताने वाला कौन ? यह भी भ्रम ही है | - भक्ति की चेतावनी - 1071
  • रोटी वाले से यह न कहो कि रोटी के अतिरिक्त भी कुछ है | प्रथम वे ध्यान ही न देंगे और यदि सुन भी लेंगे तो वे क्या ध्यान भी देंगे ? स्वयं अनुभव करो कि रोटी प्रधान या शांति | - ज्ञान की चेतावनी - 1071
  • सत्य की संतान संत | आन सत्य रखता है | अन्य प्राणी तो यों ही आते और जाते हैं | - भक्ति - 1071
  • दर्शन का अपूर्व आभास , स्मृति पटल चमत्कृत हो उठा | - चेतना - 1071
  • तेजस्विता का सौन्दर्य आज देखा | अवस्था अनुपम थी , दर्शक देखता ही रह गया प्रति क्षण अद्भुत परिवर्तन | - चेतना - 1072
  • संत ही सत्य का नर रूप है | अन्य तो निराकार साकार की कथा ही सुनाते आये | - भक्ति - 1072
  • प्रति हिंसा क्यों ? हिंसा ने रास्ता दिखलाया किन्तु प्रेम ने समर्पण की ओर क्या इशारा न किया ? किया होगा , सूक्ष्म भाव की ओर मनुष्य बहुत कम ध्यान देता है | - ज्ञान की चेतावनी - 1072
  • मेरे बालक का बाल भी बाँका न कर सकेगी दुनिया | यह दण्ड उन्ही के लिये पश्चाताप बन जाता है | - भक्ति की चेतावनी - 1072
  • सूखी दुनिया को सुखी बना | यह तेरे बायें हाथ का खेल है | कोई आये भी तो | - भक्ति की चेतावनी - 1073
  • पुस्तकों ने पुश्त दर पुश्त मनुष्य को आदर्श की बातें ही कही - शांति का मार्ग तो संत ने दिखलाया | - ज्ञान की चेतावनी - 1073
  • चली मौत , चली उत्पत्ति की चक्की पीसे गए प्राणी | वाह रे संत , तैंने पहचानी गति | शांत किया परिश्रान्त प्राणी को | - भक्ति - 1073
  • सुप्त सौंदर्य , गुप्त आत्मानुभूति , अनेक को भ्रम में डाल देती है | - चेतना - 1073
  • राम मरा नहीं , आराम कर रहा है अपने प्यारों के हृदय में | कृष्ण गया नहीं , अब भी बाँसुरी बज रही है गोकुल में . - चेतना - 1074
  • संत करे अंत | चक्कर को , दुनिया के मक्कर को | वाह रे संत | - भक्ति - 1074
  • बीज देखता है , भूमि जल और किसान को भी , किन्तु उस महाशक्ति को नहीं जो इन चारों के परिश्रम को सफल बनाती है | - ज्ञान की चेतावनी - 1074
  • प्रेम में व्याकुलता क्यों ? अभी पहिचाना नहीं कि तू ही प्रेमी तू ही प्रेमिका | - भक्ति की चेतावनी - 1074
  • मिल कर शान्त | नहीं , मिल कर भान ही न रहा शान्त , अशान्त का | - भक्ति की चेतावनी - 1075
  • मनुष्य का जीवन मिर्चा की तरह गला घोंट सकता है तो धूप बत्ती की तरह सुख भी दे सकता है | जैसी वृत्ती वैसी ही कृति | - ज्ञान की चेतावनी - 1075
  • कल धूल बरसाता था आज फूल | धूल फूल में बदल गई | हाँ भाई , धूल वाला फूल में बदल गया | - भक्ति - 1075
  • बच्चों को मिठाइयाँ दो | रोना बंद भी करे | ये कभी धर्म के नाम पर , कभी कर्म के नाम पर रोते हैं | रोना बंद मिठाई उनकी | - चेतना - 1075
  • क्या प्यार इतना महान है ? महान का प्यार महान | महान के लिए प्यार महान | - चेतना - 1076
  • आनन्द ! दुनिया अंधी क्यों ? आँखें न हुई , आँखें न मिली , प्रभु से प्यार से | - भक्ति - 1076
  • तीन वाले चार हो जा चतुर्भुज हो जा | तीन की वीण न बजा , चार हो जा कि चारो दिशाओं से आनन्द - आनन्द की ध्वनि गूँजती रहे | - ज्ञान की चेतावनी - 1076
  • बेचैनी और मुक्ति के लिए छटपटाहट क्या एक ही वस्तु है ? आंशिक ठीक हो कथन , किन्तु मुक्ति की व्याकुलता अति दुष्प्राप्य | बेचैनी का क्या कहना सर्वत्र ही राज्य है उसका | - भक्ति की चेतावनी - 1076
  • बेचैनी जीवन है शरीर की | किन्तु सम भाव की क्रिया चैन का कारण बनती है | मन की बेचैनी अज्ञानता , जिसका निराकारण मन हो सकता है या किसी की कृपा | - भक्ति की चेतावनी - 1077
  • तार तम में लगा , निस्तार कैसे हो ? तारतम्य निश्चय पर नहीं पहुँचाता | - ज्ञान की चेतावनी - 1077
  • आनन्द ! यह दुनिया प्यासी क्यों ? पास वाले को न जाना , न माना | और न बुझाई आग विषयों की - विष की | - भक्ति - 1077
  • पत्थर में प्राण प्रतिष्ठा की वह भी देव प्रतिमा कहलाई फिर शरीर का ऐसा हाल क्यों ? पत्थर कुछ चाहता नहीं | शरीर , चाहता है शरीर इसीलिए गंदा | - चेतना - 1077
  • हर तीन मिनट में एक वाणी , यह तेरी मेहरबानी | हर तीन गुणों का खेल , यह मेरी वाणी | - चेतना - 1078
  • आनन्द तू मगन क्यों ? लगन है , इसीलिये मगन | - भक्ति - 1078
  • कैसा झमेला है ? यहाँ यम का मेला है यह मृत्यु लोक है | - ज्ञान की चेतावनी - 1078
  • प्रेम इतना आकर्षक क्यों ? प्रेम प्राण है सृष्टि का , सृष्टिकर्त्ता का | - भक्ति की चेतावनी - 1078
  • प्रकृति का विनोद मानव के लिए रहस्य | अन्दाज कभी ठीक कभी गलत , चला जा रहा है मानव अपनी राह | युग के युग बीते किन्तु रहस्य बना ही रहा | - ज्ञान की चेतावनी - 1079
  • अणु ने महान को छिपा रखा है हृदय में | अणु महान का सृजनकर्त्ता है | आवरण हटा | अणु ही महान | - भक्ति की चेतावनी - 1079
  • रुला कर देता है प्यार या प्यार में रुलाता है , तू ही जाने | - भक्ति - 1079
  • आज देखा चढ़ना दम फुलाता है और उतरना आराम दिलाता है | शायद इसी आराम ने विषयों का मार्ग सरल बनाया | - चेतना - 1079
  • अनुभूति ने भूत की कुंठित भावना को प्रस्फुटित किया | संकोच बोलने न देता था क्या कहूँ - क्यों कहूँ ? - चेतना - 1080
  • अंग में आ रे , समा रे | नहीं तो ये विचारों के अंगारे जला डालेंगे तन को , मन को | - भक्ति - 1080
  • न कोई दुष्ट है और न कोई शिष्ट | अपनी प्रकृति के अनुसार काम करते और दुष्ट और शिष्ट कहलाते | मनुष्य समझ क्यों नहीं पाता कि यह सब प्रकृति का खेल है | कुछ समझे तो क्षमा का भाव आये यदि प्रकृति सहायक हो | - ज्ञान की चेतावनी - 1080
  • उत्साह अकर्मण्य को भी कर्म निष्ट बनाता किन्तु सम्भव तभी जब लक्ष्य सम्मुख हो | - भक्ति की चेतावनी - 1080
  • स्वार्थ और अहंकार - अहंकार के लिए ही स्वार्थ प्रधान | स्वार्थ मनुष्य की हीन वृत्तियों का पोषक | अहंकार निरर्थक मनुष्य को फुलाता , फिर गिराता अन्य लोगों की नजर से | - ज्ञान की चेतावनी - 1081
  • दिखला पाना आसान नहीं | दिखलाना और पाना यह तो अपूर्ण भाव है | - भक्ति की चेतावनी - 1081
  • बसन्त ने रंग दिखलाया | बस , अंत होने के पूर्व एक बार अंग-अंग में तेरा रंग समाये | तभी बसन्त आया | - भक्ति - 1081
  • फूल तो गजब के खिले , सुगंध कहाँ ? मनुष्य तो अजब देखे प्राण कहाँ ? ये दिखावटी है , ये बनावटी है | - चेतना - 1081
  • भाषा हमारा प्राण है , तमाशा हमारा प्राण है | - चेतना - 1082
  • मेरी दुनिया छोटी सी बड़ी सी | कैसे ? जब मैं रहता है , जब तुम आते हो | - भक्ति - 1082
  • संकोच न कर | विशालता व्याकुल हो रही है | - भक्ति की चेतावनी - 1082
  • मनुष्य के मन की जागृति न हुई ( ज्ञान ) तो उसने तन की शुद्धि को ही सब कुछ समझा ( कर्मकाण्ड ) | मन कैसे शान्त हो ? - ज्ञान की चेतावनी - 1082
  • इन धर्म वालों का स्वर्ग कितना लम्बा चौड़ा है ? वहाँ बसन्त कहाँ ? बस अन्त है उसका जिसे ये लोग पुण्य कहते हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 1083
  • विराट को छिपा रहा है पाप पुण्य के आवरण में बेचैनी कब दूर होगी ? - भक्ति की चेतावनी - 1083
  • सारथी आज साथी बन , जीवन में मधुरता आये | - भक्ति - 1083
  • यों ही चली आ रही है दुनिया | न देखने की न समझने की | - चेतना - 1083
  • मीठी - मीठी याद | मीठी - मीठी खाज | याद दिल की , खाज शरीर की | - चेतना - 1084
  • कमजोर का साथी कौन ? बलदेव | - भक्ति - 1084
  • दिल बदलना चाहता है तो किसी ऐसे को बसा जो तेरा दिल ही बदल दे | - भक्ति की चेतावनी - 1084
  • मैं को खा विचारों से , न दुनिया मक्खी तुझे सतायेगी और न तू झक्की बना रहेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1084
  • सुनता हूँ बार-बार मैं न रहूँ , तू तू न रहे | है हिम्मत खुदी को मिटाने की ? तेरी हस्ती न रहेगी | यह तो उन्ही से बनेगा , जो सती यती हैं | कहना आसान | जब चढ़ेगा सान पर ज्ञान , अभिमान न रहेगा | - ज्ञान की चेतावनी - 1085
  • सृष्टि को पाप पुण्य में समझा , प्यार को वासना तेरा मेरा समझौता कैसा ? - भक्ति की चेतावनी - 1085
  • अपनाता कहाँ ? तू तो सताता है | बताता नहीं कि कौन मेरा त्राता है , भ्राता है , माता है ? - भक्ति - 1085
  • तू मेहमान है कि हैवान है ? तुझसे डरती है दुनिया | हूँ तो मेहमान चन्द दिनों का , नासमझी ने हैवान समझा | - चेतना - 1085
  • बीमार को न मार | अरे मार ! यह तो यों ही किसी का मारा हुआ है | - चेतना - 1086
  • गोविन्द ! आज तुम बेचैन क्यों ? बेचैनी भक्त के लिए , मैं शांत | - भक्ति - 1086
  • अनेक तरंगें एक के लिए | अनेक धर्म एक के लिए फिर विवाद क्यों ? वाद क्यों ? - भक्ति की चेतावनी - 1086
  • जिन लोगों ने अनुभव किया है , उनका कहना है या जिन्होंने कल्पना की , उनका कहना है कि भगवान है | अनुमान करने वालों का अनुमान सही भी हो सकता है और गलत भी , किन्तु अनुभव तो गलत नहीं | - ज्ञान की चेतावनी - 1086
  • अनुभव और अनुमान में “ अनु “ है , जिसका अर्थ है ‘ पीछे ‘ | भव में आया फिर जान पाया कि भगवान है और ‘ अनुमान ‘ तो ‘ मानना ‘ नहीं , अन्दाज लगाना है , यह शब्द का अन्तर आज भी बना है | - ज्ञान की चेतावनी - 1087
  • प्रेम का ढंग ही निराला | कोई त्याग करता , कोई अपनाता प्यार के लिए | कैसा आश्चर्य ? - भक्ति की चेतावनी - 1087
  • प्रिय को कैसे बुलाऊँ ? प्रिय को कैसे भुलाऊँ ? प्रिय को कैसे रुलाऊँ वह मेरा प्रिय है | - भक्ति - 1087
  • कब्र ने कहा - सब्र कर वह दिन करीब है जिस दिन तू मेरा मेहमान बनेगा | पगली ! मैं तेरे लिये नहीं आया जिसका मेहमान हूँ वह मेहरवान है | - चेतना - 1087
  • चिनगारी ने ढेर को जला दिया फिर भी विश्वास नहीं कि प्रेम की चिंगारी पाप-पुण्य के भाव को ही बदल देती है | - चेतना - 1088
  • यह लालिमा मेहंदी की या रक्त की ? नहीं हृदय की , भक्त ( के हृदय ) की | - भक्ति - 1088
  • मन्दिर है तो मन लगा प्यार में , दर दर न भटक | मस्जिद है तो मत जिद्द कर | गिरजा है तो गिर चरण कमलों में | जा अब आनन्द ही आनन्द है | - भक्ति की चेतावनी - 1088
  • अनुभव की क्या आवश्यकता है ? भव में क्यों आया , यदि अनुभव की जरूरत महसूस नहीं करता ? आहार , निद्रा , भय , मैथुन क्या इसका भी मनुष्य ने अनुभव किया था - ये तो जन्मजात हैं | - ज्ञान की चेतावनी - 1088
  • क्यों मिथ्या शब्दों का प्रयोग करता है जब भाव ही नहीं , हृदय में चाव ही नहीं | - भक्ति की चेतावनी - 1089
  • भाव की बातें कर | भाव में कैसे आयेगा ? जब अनुभव ही नहीं होगा कि कोई है , जो सर्वव्यापी है | - ज्ञान की चेतावनी - 1089
  • गुलाब की कोमलता , सुगंध अति सुखदाई | भक्त हृदय की करुणा प्रभु मन भाई | - भक्ति - 1089